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उनके घर का खर्चा वैसे ही बड़ी तंगी मे चल रहा था.. उपर से माँ की बीमारी ने भी काफ़ी पैसे ख़त्म कर दिए..
और साथ ही साथ दीवाली भी आने वाली थी..सिर्फ़ दस दिन बाद..ऐसी हालत मे काजल बस यही सोच रही थी की कैसे चलेगी ये जिंदगी..
पर उसे नही पता था की आने वाली दीवाली उसके लिए क्या-2 सर्प्राइज़ लाने वाली है..
काजल के हॉस्पिटल पहुँचते ही केशव फ़ौरन वहाँ से निकल गया...इतनी जल्दी मचाते हुए काजल ने उसे पहली बार देखा था..
रात के समय हॉस्पिटल मे किसी के भी रहने की मनाही थी..वैसे भी देखभाल के लिए नर्सेस रहती ही थी..इसलिए काजल भी घर आ जाती थी..
घर पहुंचकर उसने अपना लोवर और एक हल्की सी टी शर्ट पहनी और खाना बनाने मे लग गयी..वो रात के समय अपने अंडरगार्मेंट्स भी उतार देती थी..यही नीयम था उसका रोज का..10 बजे तक केशव भी आ जाता था और दोनों मिलकर खाना खाते थे...सुबह वो ऑफीस निकल जाती और केशव नहा धोकर हॉस्पिटल के लिए...पिछले दो महीने से यही नीयम चल रहा था..
पर आज 11 बजने को हो रहे थे और केशव का कहीं पता नही था...काजल को भी काफ़ी भूख लगी थी..उसने उसका नंबर कई बार ट्राइ किया पर हर बार वो काट देता...आख़िर मे जाकर जब उसने फोन उठाया तो सिर्फ़ इतना कहकर फोन रख दिया की 'दीदी , दस मिनिट मे आया बस...'
दस मिनिट के बाद जब केशव आया तो वो काफ़ी खुश लग रहा था...पर काजल के गुस्से वाले चेहरे को देखकर वो सहम सा गया और चुपचाप अपने कमरे मे जाकर चेंज करने लगा..और कपड़े बदल कर नीचे आया.
काजल : "ये हो क्या रहा है आजकल...ये जानते हुए भी की माँ हॉस्पिटल में है, तुम इतनी रात को मुझे अकेला छोड़कर बाहर रहते हो..आख़िर गये कहाँ थे..और मेरा फोन क्यो काट रहे थे..''
केशव : "वो...मैं ...जुआ खेलने गया था...''
वैसे तो जुआ खेलना उसका हमेशा का काम था, पर माँ हॉस्पिटल में है, ऐसी हालत मे भी वो जुआ खेलने से बाज नही आ रहा, ये काजल से बर्दाश्त नही हुआ..उसके मुँह मे जो भी आया, वो उसे कहती चली गयी..काफ़ी भला-बुरा सुनने के बाद अचानक केशव ने अपनी जेब से 500 के लगभग 20-30 नोट निकाल कर उसके सामने रख दिए..
और उन्हे देखते ही काजल की ज़ुबान पर एकदम से ताला सा लग गया..
केशव (मुस्कुराते हुए) : "ये जीते है मैने..दीदी, आपको पता है ना दीवाली आने वाली है...और इसी टाइम ऐसी बड़ी-2 गेम्स चलती है...और जब आप फोन पर फोन कर रहे थे,मेरी एक बड़ी सी गेम फंसी हुई थी...इसलिए फोन काट रहा था..और जैसे ही ये पैसे जीता, मैं वहाँ से निकल आया..''
इतने पैसे एकसाथ देखकर काजल हैरान थी...वो महीना भागा-दौड़ी करके सिर्फ़ 15000 कमाती थी...और उसके भाई ने लगभग उससे दुगने पैसे कुछ ही घंटो मे लाकर उसके सामने रख दिए थे..
वो जुए को हमेशा से बुरा मानती थी...पर उनके जो हालात थे, उसमे पैसे अगर जुआ खेलकर भी आए, तो उसे उसमे कोई प्राब्लम नज़र नही आ रही थी..
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केशव ने अपना सिर उपर उठाया और बोला : "नही दीदी, आप ऐसा क्यो सोच रही है...ये दीवाली के दिन है, इन दिनों में जुए से जीते गये पैसे मेहनत किए हुए पैसों से कम थोड़े ही होते हैं...और आप कैसे कह सकती है की इसमे मेहनत नही है, इसमे बहुत दिमाग़ लगता है..और दिमाग़ लगाकर कमाई हुई रकम भी तो मेहनत से कमाए हुए पैसो के बराबर हुई ना..''
काजल के पास उसकी बात का कोई जवाब नही था..उसके दोनो हाथों मे केशव का चेहरा था..जो उसकी दोनो छातियों के बीच से झाँकता हुआ उसकी तरफ देख रहा था..इतने करीब से और इतने प्यार से तो उसने आज तक नही देखा था अपने भाई को...उसने नीचे झुककर उसके माथे को चूम लिया और बोली : "ठीक है...पर मुझसे वादा कर, दीवाली के बाद तू ये जुआ नही खेलेगा..सिर्फ़ इन्ही दिनों के लिए खेल ले बस...और अपनी लिमिट मे रहकर..और बाद मे कोई अच्छा सा काम करके मेरी घर चलाने मे मदद करेगा..''
केशव : "ठीक है दीदी...अब जल्दी से खाना लगाओ...बड़ी भूख लगी है मुझे..''
और फिर हंसते हुए काजल उसके लिए खाना परोसने लगी..
खाना खाते हुए अचानक काजल ने कहा : "तुम रम्मी खेलते हो या पत्ते पर पत्ता ..''
केशव खाना खाते-2 अचानक रुक गया और ज़ोर-2 से हँसने लगा , और बोला : "हा हा हा, दीदी आप भी ना, ये बच्चों वाले खेल तो घर पर खेले जाते हैं..''
काजल ने भी ये बात इसलिए कही थी क्योंकि वो खुद अपने भाई के साथ बचपन मे यही खेल खेलती थी..और कई बार क्या, हमेशा ही केशव को उसमें हरा देती थी..
केशव : "हम लोग खेलते हैं, तीन पत्ती ..यानी फ्लेश ''
काजल : "ये कैसे होता है....''
केशव : "उम्म्म.....आप ऐसा करो...खाना खाने के बाद में आपके रूम मे आता हू...वहीं दिखाता हूँ की ये कैसे होता है..''
काजल भी खुश हो गयी....वैसे भी खाना खाने के बाद वो रात को 12 बजे तक जागती रहती थी...ऐसे मे अपने भाई के साथ कुछ वक़्त गुजारने की बात सुनकर वो काफ़ी खुश हुई..और उसने खुशी-2 हाँ कर दी.
किचन समेटने के बाद वो अपने कमरे मे गयी, जहाँ पहले से ही केशव अपने हाथ मे ताश की गड्डी लेकर उसका इंतजार कर रहा था.
आने से पहले काजल अपना मुँह अच्छी तरह फेस वॉश से धोकर आई थी...ये काम वो रोज रात को करती थी...अपने चेहरे को चमका कर रखती थी वो हमेशा..इसलिए जब वो केशव के पास पहुँची तो उसका चेहरा ऐसे चमक रहा था जैसे वो अभी नहा धोकर आई है..
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असल मे वो दुनिया के सामने तो भोली भाली बनकर रहती थी...पर अपनी जिंदगी मे वो एक नंबर की ठरकी थी..वो होती है ना घुन्नी टाइप की लड़कियाँ , जो अपने आप को दुनिया की नज़रों से छुपा कर रखती है...पर अंदर से बड़ी चालू होती है...ठीक वैसी ही थी काजल भी..उसने आज तक कभी भी सेक्स नही किया था..पर सेक्स से जुड़ी बाते उसे हमेशा उत्तेजित करती थी..कॉलेज / कॉलेज में भी वो लड़को से दूर रहती थी..पर रोज रात को उन्ही लड़को के बारे मे सोच-सोचकर फिंगरिंग किया करती थी...ये उसका अभी तक का नीयम था, इसलिए उसे सोते-2 रोज 12 बज जाते थे...अपने मोबाइल पर वी चेट पर चेटिंग करना..फेक नाम से एफ बी पर अकाउंट भी बनाया हुआ था उसने और उसमें वो लड़को से रोज रात को चेटिंग करती थी...अपने मोबाइल से अपनी चूत की और मुम्मों की पिक्स उन्हे भेजकर उत्तेजित भी करती थी...पर किसी से फोन पर बात नही करती थी और ना ही किसी के सामने खुलकर आती थी..यानी अपना चेहरा हमेशा छुपा कर ही रखती थी..
और जब केशव ने ये बात बोली तो अपनी आदत से मजबूर उसकी नज़रें उसके लंड वाली जगह पर चली ही गयी...
और फिर ना जाने क्या सोचकर उसने अपनी नज़रें घुमा ली...पर उनमे आ चुका गुलाबीपन केशव से छुपा न रह सका..
केशव : "क्या हुआ दीदी...आप एकदम से चुप सी क्यों हो गयी...''
काजल : "बस...ऐसे ही...उम्म्म्म एक बात पूछू तुझसे केशव...''
केशव : "हाँ दीदी...पूछो...''
काजल : "मैं तुझे कैसी लगती हू...''
केशव : "आप....मतलब...आप तो अच्छी ही हो दीदी...इसमे पूछने वाली क्या बात है...''
काजल : "अरे नही बुद्धू ....मेरा पूछने का मतलब...देखने में ...कैसी हूँ मैं ...''
इतना कहकर उसने अपनी ज़ुल्फो मे हाथ फेरा..अपने खुले हुए बाल पीछे किए...और अपना सीना बाहर की तरफ़ निकाल कर ऐसे पोज़ दिया जैसे कोई फोटो सेशन हो रहा हो वहाँ...
केशव की नज़रें काजल की हर हरकत पर थी...उसके नाज़ुक हाथों का जुल्फे पकड़कर पीछे करना...अपने चेहरे पर उँगलियों को फेरना , बालों को कान के पीछे अटकाना..सब वो ऐसे देख रहा था जैसे वो सब काजल उसके लिए ही कर रही हो..
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केशव अपनी बहन की सुंदरता देखकर हैरान हुए जा रहा था...उसे पता तो था की वो सुंदर है..पर इतनी सेक्सी भी है, ये आज ही पता चला उसको..अभी तो उसने कोई मेकअप नही किया हुआ..अपने गुलाबी होंठों पर लाल लिपस्टिक , आँखो मे काजल और चेहरे पर मेकअप करने के बाद तो ये कयामत ही लगेगी
काजल : "क्या सोचने लगे अब....बोलो ना..''
केशव (झेंपता हुआ सा) : "बोल तो दिया दीदी...आप अच्छी हो...चलो अब आगे देखो...मैं दोबारा पत्ते बाँट रहा हू...''
और केशव ने बात बदलते हुए फिर से 3-3 पत्ते बाँट दिए..ये काम उसने इसलिए भी किया था की काजल की ऐसी बातें सुनकर उसके लंड ने अपना पूरा आकार ले लिया था और वो अंडरवीयर में ऐसे फँस गया था की उसे सही करने के लिए वो अपने हाथ नीचे भी नही कर पा रहा था...क्योंकि अपनी बड़ी बहन के सामने वो कैसे अपने लंड को हाथ लगाता भला..इसलिए उसने बात बदलने में ही भलाई समझी ताकी उसका लंड नीचे बैठ जाए
अब की बार काजल ने पत्ते नही उठाए..
काजल : "पर तुमने तो कहा था की ब्लाइंड चलने के लिए पैसे चाहिए होते है...अब क्या हम दोनो भी पैसो से खेलें क्या ...''
केशव : "नही...उसके बदले कुछ भी रख देते है...''
इतना कहकर वो इधर उधर देखने लगा...
काजल के मन मे तब तक एक बात आ चुकी थी, वो बोली : "एक काम करते है...ब्लाइंड या चाल के बदले हम एक दूसरे से सवाल करेंगे...और सामने वाला उसके जवाब बिल्कुल सच मे देगा...बोलो मंजूर है...''
केशव को समझ नही आया की उसकी बहन करना क्या चाहती है...पर वो समझ चुका था की काजल उसे फंसाना चाहती है , जो भी था,उसमें वो फंसना नही चाहता था
केशव : "क्या दीदी...आप भी ना...इसमे मज़ा नही आएगा...रूको...में पैसे लेकर आता हू...उससे ही खेलते है...या फिर माचिस की तिल्लिया लेकर आता हू, उन्हे आपस मे बाँट लेंगे, उनसे खेलेंगे...''
काजल : "नही...अब तो मैं ऐसे ही खेलूँगी...वरना तुम उठाओ ये पत्ते और जाओ अपने कमरे मे...मुझे भी नींद आ रही है..''
दोनो ही सूरत मे काजल अपना फायदा देख रही थी...अगर वो खेलने के लिए मान जाता तो वो उससे अपनी पसंद के सवाल करके कुछ सच उगलवाती...और अगर वो चला जाता तो रोज रात की तरह चेटिंग वगेरह करते हुए मुठ मारती ...और वैसे भी आज वो कुछ ज़्यादा ही उत्तेजित हो रही थी...पता नही क्यो.
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सारिका का नाम सुनते ही काजल का दिमाग़ सुन्न सा हो गया...ये तो उसकी बचपन की सहेली थी...जिसके साथ वो पिछले 2 सालो से बात नही कर रही...दोनो मे किसी बात को लेकर इश्यू हो गया था इसलिए..
पर उसका खुद का भाई, उसकी सबसे करीबी सहेली के साथ लगा हुआ है, ये उसने सोचा भी नही था.
काजल : "सारिका के साथ.....ओह्ह्ह्ह माय गॉड ...पर ये कब से चल रहा है...मुझे तो पता भी नही..''
केशव : "आप एक ही बार मे दो सवाल नही पूछ सकती...अब मेरी ब्लाइंड है..यानी सवाल पूछने की बारी अब मेरी है..''
केशव अपने आप को बड़ा समझदार समझ रहा था उस वक़्त...उसने मुस्कुराते हुए वही प्रश्न अपनी बहन से भी पूछ लिया : "आपका कोई बाय्फ्रेंड है क्या...या कभी रहा हो...क्या नाम है उसका..''
काजल ने सपाट चेहरे से उत्तर दिया : "नही...कोई था ही नही तो नाम किसका बताऊ ..''
बेचारा केशव अपना सा मुँह लेकर रह गया.
वैसे इन बातो का कोई मतलब नही था...दोनो भाई बहन ने आज से पहले कभी इस विषय पर बात नही की थी...उन्हे थोड़ा अटपटा भी लग रहा था...पर मज़ा भी बहुत आ रहा था...ख़ासकर काजल को..वो तो समझ चुकी थी की इस गेम के ज़रिए वो आज सब कुछ उगलवा लेगी केशव से..जो वो हमेशा से उससे पूछना चाहती थी..पर शरम के मारे कभी पूछने की हिम्मत ही नही हुई.
काजल : "अब मेरी बारी...अब ये बताओ...सारिका के साथ तुमने क्या -2 किया है..''
ये उसकी ब्लाइंड थी..
केशव (झल्लाकर) : "आप भी ना दीदी...ये कैसे सवाल पूछ रही है...मुझे शर्म आ रही है..''
काजल : "एक लड़का होकर भी तू ऐसे शरमा रहा है...रहने दे..मुझे नही खेलनी ये गेम शेम ..तू जा अपने कमरे में ..मुझे वैसे भी नींद आ रही है..''
ये तो जैसे उसके स्वाभिमान पर चोट कर दी थी काजल ने...वो एकदम से तैश मे आकर बोला : "मुझे कोई शरम-वरम नही आती ...ये तो तुम्हारा लिहाज कर रहा हू..वरना मुझे ये बाते बताने मे कोई फ़र्क नही पड़ता..''
काजल (चटखारे लेते हुए) : "तो बता ना...चुप क्यों है अभी तक...बोल, क्या-2 किया है तुम दोनो ने अभी तक..''
काजल फुल टू मूड में आ चुकी थी अब तक...और शायद ये भी भूल चुकी थी की वो क्या पूछ रही है और किससे...
केशव : "हमने....वो किस्सस वगैरह ...हग्स....उम्म.....एंड फकिंग भी ....''
लास्ट का वर्ड यानी फकिंग सुनते ही काजल एकदम से सुलग कर रह गयी...दो साल पहले तक, जब तक दोनो की दोस्ती थी, उन्होने यही डिसाईड किया था की अपनी शादी से पहले किसी को भी वो सब नही करने देंगी...पर ये सारिका कितनी चालू निकली...इन दो सालो मे वो कितनी बदल गयी है...कहाँ से कहाँ पहुँच गयी...अपना वादा तोड़ दिया...और चुदवा भी ली...और वो भी उसके खुद के भाई से...
काजल को गुस्सा तो बहुत आया..पर वो कर भी क्या सकती थी...उसकी अपनी लाइफ थी..वो जैसे चाहे , वैसे चलाए...वो बेकार मे ही गुस्सा करके अपना खून जला रही है.
वो थोड़ा नॉर्मल हुई...पर 'फकिंग' शब्द सुनने के बाद वो अपने भाई से नज़रें नही मिला पा रही थी...
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केशव : "चलो कोई बात नही...अब तो आपको पता चल ही गया है...अब आप फिर से ब्लाइंड यानी कुछ और पूछना चाहती हो तो पूछो ...वरना अपने पत्ते खोलकर चाल चलो...''
काजल के पास तो काफ़ी सवाल थे...पर पहली बार मे ही वो सब पूछकर वो केशव को भगाना नही चाहती थी...उसने अपने पत्ते उठा लिए..पर ये पत्ते उसकी समझ मे नही आए...
केशव ने भी अपने पत्ते उठा कर देखे...उसके पास 5 का पेयर आया था...वो खुश हो गया..पर काजल के प्रश्नवाचक चेहरे को देखकर बोला : "क्या हुआ दीदी...पत्ते ठीक नही आए क्या...''
काजल : "पता नही...ये देखो ज़रा...''
उसने अपने पत्ते सामने फेंक दिए...वो थे इक्का, बादशाह और बेगम...
केशव : "यार दीदी....आप तो कमाल हो...पता है ये क्या है....सबसे बड़ी सीक्वेंस ...इनको तो सिर्फ़ और सिर्फ़ ट्रेल ही काट सकती है..जो बड़ी मुश्किल से आती है...जैसी आपके पास पिछली बार आई थी..इक्के की ''
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और फिर केशव ने काजल को सभी तरह के पत्तो के बारे मे बताया की क्या बड़ा होता है...क्या छोटा...सुच्ची किसे कहते हैं...कलर...पेयर ..सीक्वेंस ...सभी की जानकारी दी उसने..
केशव : "ये गेम तो आप जीत गयी...''
काजल : "अब पैसे तो रखे नही है हमने ...फिर मुझे क्या मिलेगा...''
वो मंद -2 मुस्कुरा भी रही थी ये बोलते हुए...
केशव को उसकी हँसी का जो मतलब नज़र आ रहा था..वो कहना नही चाहता था...और ये भी नही बोलना चाहता था की जीतने के बाद वो क्या माँगने की बात कर रही है...
केशव : "वो बाद मे बता देना...अभी मुझे कुछ और देखना है...''
काजल : "क्या ???"
और जान बूझकर काजल ने अपने दोनो हाथ अपनी छातियों पर रख लिए...जैसे केशव उन्हे ही देखने की बात कर रहा हो..
और फिर केशव के मासूमियत से भरे चेहरे पर पसीना देखकर वो खुद ही हंस-हंसकर लोट-पोट हो गयी...
काजल : "हा हा हा ....केशव तू भी ना....कितना बड़ा भोंदू है...पता नही तूने वो सब कैसे किया होगा सारिका के साथ...वो तो तुझे कक्चा खा गयी होगी...''
केशव : "मुझे ...और वो....आप ये बात कैसे कह सकती हो ...''
वो ताश की गड्डी को पीटता हुआ बोला
काजल : "मुझे पता है...वो ऐसी ही है शुरू से...जिस तरह की बाते वो करती थी की ये करेगी...वो करेगी...मैं तो सोच भी नहीं सकती थी वो सब...और वो बोल भी देती थी...उसकी बातें सुनकर ही मुझे पता चल गया था की इसके हाथ जो भी पहला शिकार आएगा...वो उसका क्या हाल करेगी...और मुझे क्या पता था की उसका शिकार मेरा भाई ही होकर रहेगा...हा हा''
और वो फिर से अपना पेट पकड़कर ज़ोर-2 से हँसने लगी
अब केशव अपनी बहन को क्या बताता...पहली बार उसने सारिका की चूत यहीं मारी थी...वो भी इसी बेड पर, जहाँ वो इस समय खेल रहे थे..काजल ऑफीस गयी हुई थी और माँ किसी काम से मार्केट...
उस समय उसने सारिका की ऐसी चीखे निकलवाई थी की वो आज भी याद करके सहम जाती है...बाद में तो उसे केशव के मोटे लंड की आदत पड़ गयी...पर बाद मे भी हर बार वो उसकी रेल बनाकर ही चुदाई करता था...
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काजल : "ये तू कर क्या रहा है...मुझे भी तो बता ज़रा...''
केशव : "रूको दीदी. ...बस थोड़ी देर और...''
और उसके बाद केशव ने 3 बार और पत्ते बाँटे ...और हर बार काजल के पत्ते भारी थे...और हर बार उसके पास चाल खेलने लायक ही पत्ते आ रहे थे...कभी पेयर ...कभी कलर...कभी सीक्वेंस ...
आख़िर मे केशव बोला : "दीदी...लगता है आपके अंदर कोई शक्ति छुपी है...या कोई वरदान है ,आप देख रही हो ना...हर बार आपके पत्ते कितने जबरदस्त आ रहे हैं...''
काजल : "हाँ तो....''
केशव (अपने चेहरे पर चालाकी भरी मुस्कान लाते हुए) : "दीदी ...मेरे पास एक प्लान है..''
काजल : "प्लान....? कैसा प्लान...और किसलिए.."
केशव : "देखो दीदी...आजकल दीवाली का टाइम है..और इस टाइम सभी लोग जुआ खेलते हैं...वैसे जुआ खेलने वाले तो पूरा साल खेलते हैं पर इन दिनों और भी ज़्यादा और बड़ी-2 गेम्स होती है ...और इसलिए वो कल में इतने पैसे जीत कर लाया था...''
काजल : "हाँ ...तो ..? "
केशव : "तो अगर हम लोग ये जुआ खेले...मेरा मतलब है की तुम...तो शायद काफ़ी पैसे आ सकते हैं...मेरे जितने भी दोस्त है वो सब खेलने वाले हैं...उनके साथ खेलेंगे..और मुझे पूरा विश्वास है की आप ही जीतोगे ..आप देख रहे हो ना, किस तरह के पत्ते आते हैं हर बार आपके पास...''
काजल का तो दिमाग़ ही घूम गया उसकी बात सुनकर..
काजल : "तू पागल हो गया है....तू चाहता है की में तेरी तरह जुआ खेलूं ..और वो भी तेरे उन आवारा दोस्तों के साथ...तुझे शर्म नही आएगी की तेरी बहन बाहर जाकर जुआ खेले...कभी सुना है तूने की कोई लड़की जुआ खेलती है...तुझे पता भी है की कितनी बदनामी होगी हमारी...''
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बोलते-2 उसकी आवाज़ काफ़ी तेज हो गयी थी गुस्से की वजह से.
केशव आराम से सब सुनता रहा और आख़िर मे बोला : "दीदी....सबसे पहले तो ये ख्याल मन से निकाल दो की लड़कियाँ ये काम नही करती...ये दीवाली के दिन है...और इन दिनों लड़कियाँ और औरतें ही सबसे ज़्यादा खेलती हैं...चाहे शगुन के लिए ही सही पर इन दिवाली के दिनों में जुआ खेलना शुभ माना जाता है..और आपको कहीं बाहर नही जाना है खेलने, मैं उन्हे यहीं बुला लूँगा...अपने घर पर..और आपको मेरे होते हुए किसी से भी डरने की जरुरत नही है...आप शायद नही जानती की मेरा कितना दबदबा है इस मोहल्ले में...कोई आपकी तरफ आँख उठा कर भी नही देख सकता...''
काजल उसकी बात सुनती रही..शायद उसको वो सब सही लग रहा था अब..
काजल (थोड़े नरम स्वर मे) : "पर...माँ हॉस्पिटल में है और हम लोग ऐसे घर मे बैठकर जुआ खेलेंगे...माना की तेरे दोस्त तेरे सामने नही बोलेंगे...पर पीछे से तो हर कोई यही कहेगा ना की माँ हॉस्पिटल मे है और इन्हे जुआ खेलने की पड़ी है..''
केशव : "ये सब मै माँ के लिए ही कर रहा हू...कल मेरी डॉक्टर् से बात हुई थी..उन्हे घर लाने के लिए..तो उन्होने कहा था की या तो 10 दिन तक उनका हॉस्पिटल मे रहकर इलाज करवा लो...या फिर घर लेजाकर एक इंजेक्शन रोज लगवाना, 5 दीनो तक..जो करीब 3000 का एक है..हम उन्हे कल ही घर ले आएँगे...और इन पैसों से उनका घर पर ही इलाज करवाएँगे..''
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काजल को उसकी बात मे तर्क नज़र आया...क्योंकि ये बात डॉक्टर ने उसे भी कही थी...पर इतने पैसे कहाँ से लाती वो, यही सोचकर उसने उस बात पर ज़्यादा ध्यान नही दिया था..कहने को तो ये सरकारी हॉस्पिटल था पर उसमे भी उनके पैसे लग ही रहे थे....और रोज -2 आने-जाने की मशक्कत भी अलग से करनी पड़ती थी.अगर माँ को घर ले आएँ तो ये सारी चिंता और परेशानी ख़त्म हो जाएगी.
काजल : "पर असली में खेलते हुए अगर मैं हार गयी तो, मेरा मतलब है की अगर खेलते हुए लक्क ने मेरा साथ नही दिया तो ??"
केशव : "आप उसकी चिंता मत करो , मै सब संभाल लूंगा "
काजल चुप हो गयी....केशव समझ गया की वो उसकी बातों पर विचार कर रही है.
केशव : "दीदी...आप इतना मत सोचो...आजकल तो सभी के घर पर जुआ चलता है...कल भी मै अपने दोस्त गुल्लू के घर पर ही खेल रहा था...और उसकी बीबी को तो आप जानती ही हो, रूबी, वो भी खेल रही थी उसके साथ...अब ऐसा त्योहार का माहोल हो तो घर की औरतों का भी थोड़ा बहुत एंटरटेनमेंट हो जाता है...''
काजल तो पहले ही मान चुकी थी...केशव बेकार मे अभी तक उसे मनाने के लिए इधर-उधर की बातें कर रहा था..
वो जैसे ही बोला 'और वो जो मेरा दोस्त है ना.....'
काजल : "ओके ..बाबा ...समझ गयी....अब चुप कर जा....समझ गयी मैं...''
काजल ने हंसते हुए कहा तो केशव भी खुशी के मारे उछल पड़ा...और प्रेम भाव मे आकर वो काजल से लिपट गया..
केशव : "ओह ...दीदी ....मुझे पता था की आप ज़रूर समझोगी...भले ही ये ग़लत तरीका है पैसे कमाने का..पर हमें इस समय इन पैसो की बहुत ज़रूरत है...''
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काजल की साँसे तेज हो गयी...दरअसल केशव के जिस्म से निकल रही मर्दाना खुशबु उसे सम्मोहित सी कर रही थी...ऐसा लग रहा था की जैसे कोई नशा है जो केशव के शरीर से निकल कर उसकी सांसो मे समा रहा है..और ये सब महसूस करते-2 कब उसके निप्पल बाहर निकल कर केशव को चुभने लग गये, उसे भी पता नही चला...और केशव को लगा की शायद उसके गले मे पड़ा हुआ लॉकेट चुभ रहा है उसके सीने मे..पर फिर उसे याद आया की वो तो काफ़ी उपर बँधा है...और तब उसे एहसास हुआ की ये कोई लोकेट नही बल्कि कुछ और है...जो दोनो तरफ से एक बराबर चुभ रहा है..और उसे समझते देर नहीं लगी की वो क्या है
अब उत्तेजित होने की बारी केशव की थी...उसने लाख कोशिश की पर उसके लंड ने उसकी एक नही मानी और एकदम से तन कर खड़ा हो गया..जिसे काजल ने भी अपने पेट पर महसूस किया..
और ये था उसके शरीर पर किसी खड़े लंड का पहला एहसास...
भले ही रात के समय वो कितने ही लड़को के लंड खड़े करके मज़े लेती थी पर उनके एहसास को महसूस करने का ये पहला अवसर था उसके लिए और इस एहसास ने उसके शरीर को पसीने से भिगो दिया..और चूत को भी महका दिया
दोनो एकदम से अलग हो गये...और एक दूसरे से नज़रें चुराते हुए इधर-उधर देखने लगे..
केशव : "ओके ..दीदी ...अब मै चलता हू...अपने रूम मे..गुड नाइट. और हां आप कल ऑफीस की छुट्टी कर लेना..हम दोनो सुबह ही हॉस्पिटल चलेंगे और माँ को घर ले आएँगे......''
काजल : "ओक....मै सुबह ऑफीस में फोन कर दूँगी...गुड नाइट..''
उस रात काजल ने अपने वर्चुअल आशिकों से कोई भी बात नही की...पर जम कर अपनी बिना बालों वाली चूत को रगड़ा