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उसकी शादी के दो सप्ताह के बाद जब वह और सिद्धार्थ पहली बार फेरा डालने के लिए घर पर आये तब माँ ने चार दिन के लिए मेरा कमरा उन्हें दे दिया और मुझे उन दिनों स्टोर में रहना पड़ा था।
तीन दिन तो मंजू और सिद्धार्थ मेरे कमरे में ही सोते रहे लेकिन चौथी रात को अगले दिन आने वाले बिछोह से दुखी मंजू माँ से बातें करते करते उनके पास ही सो गई।
सिद्धार्थ देर रात तक मंजू के आने की प्रतीक्षा करता रहा किन्तु जब वह नहीं आई तब उसे कमरे में अकेले ही सोना पड़ा।
उस रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे सोने से पहले मैं लघु शंका के लिए बाथरूम के भिड़े हुए द्वार को धकेलती हुई अन्दर घुसी और जो देखा उससे स्तब्ध हो गई।
बाथरूम की लाइट जल रही थी और सिद्धार्थ पूर्ण नग्न रूप में अपने सिर को थोड़ा ऊपर किये तथा आँखें बंद किये पॉट के सामने खड़ा हुआ था, उसने अपना बायां हाथ पॉट की टंकी पर रखा हुआ था और वह दायें हाथ से बड़े ही प्यार से अपने सात इंच लम्बे एवम् ढाई इंच मोटे लिंग को हिला रहा था।
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
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स समय मुझे ऐसा लग रहा था कि बाथरूम में दिवाली की बत्तियों की तरह एक लाईट जल बुझ रही है।
मैं उस लुभावने दृश्य को देखने में इतनी लीन थी कि मुझे समय गुजरने का पता ही नहीं चला और मेरी तन्द्रा तब टूटी जब सिद्धार्थ का स्वर मेरे कानों में पड़ा।
वह छत की ओर मुँह करके कह रहा था– ओह इश्वर, तेरी भी क्या अजब माया है। मुझे तो घरवाली चाहिए थी और तुमने यह आधी घरवाली को क्यों भेज दिया?
फिर मेरी ओर देखते हुए बोला– दीदी, आप कब आईं? मुझे तो आपके आने की कोई आहाट ही नहीं सुनाई दी। कृपया मुझे इस दशा में आपके सामने खड़े रहने के लिए क्षमा कर देवें।
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मैं एक साधरण परिवार की एक सामान्य युवती हूँ जिसे किसी भी अन्य युवती के तरह युवा शरीर की भूख सताती रहती है और मैं उसे मिटाने का प्रयास अपनी ऊँगली से करती भी रहती हूँ।
आज जब सिद्धार्थ ने मुझसे सहायता मांगी तो मेरे शरीर की वह भूख जाग उठी और मैं सोच में पड़ गई कि ‘क्या करूँ और क्या नहीं करूँ!’
मेरे सामने दो विकल्प थे, जिनमें से एक था कि मैं सिद्धार्थ के साथ पूरा सहयोग करूँ और यौन संसर्ग करके दोनों की भूख मिटा कर संतुष्टि पाऊँ।
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क्योंकि मैं अपनी छोटी बहन मंजू के साथ कोई विशवासघात नहीं करना चाहती थी इसलिए निश्चय किया की मुझे दूसरे विकल्प तक ही सीमत रहने की सहमति देनी चाहिए।
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मुझे सोचते हुए देख कर सिद्धार्थ बोला– दीदी आप रिश्ते में मेरी साली यानि की आधी घरवाली भी तो हो, फिर इतना भी क्या सोचना, अगर आपकी सहमति हो तो मुझे जल्दी से आपके कपड़े उतारने की अनुमति दे दीजिये।
मैं एक कदम पीछे हटते हुए बोली- नहीं, मैं मंजू या और किसी के कहने पर नहीं आई हूँ। मुझे मेरी लघु-शंका यहाँ ले कर आई है।
मेरी बात सुन कर सिद्धार्थ बोला- दीदी, क्या आप मेरी इस क्रिया में सहयोग नहीं देंगी? मैं तो सोच रहा था की इस समय आप भी उत्तेजित हैं और मेरी जैसी समरूप क्रिया भी कर रही थी। क्यों नहीं हम दोनों पारस्परिक एक दूसरे की क्रिया में सहायता करें और आसीम आनन्द एवम् संतुष्टि पायें?
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