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मैं मुंबई में रहता था और वही एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करने के साथ कंप्यूटर कोर्स भी करता था.
मेरी बड़ी बहन भी वही रहती थी रहती थी. उसका पति एक प्राइवेट फर्म में काम करता था. अच्छा कमाता था, और उसने एक छोटा सा एक बेडरूम वाला फ्लैट ले रखा था. उनका घर छोटा होने के कारण मैं वहां नहीं रह सकता था. मगर उनके घर के पास ही मैंने भी एक कमरा किराये पर ले लिया था.
मेरी बहन का नाम कविता था. शादी के 4 साल बाद भी उसे कोई बच्चा नहीं था और शायद होने की सम्भावना भी नहीं थी. क्योंकि उसका पति थोड़ा सनकी किस्म का था . उसके दिमाग में पता नहीं कहाँ से अमीर बन ने का भूत सवार हो गया था. हालाँकि ये हमारे परिवार की जरुरत थी. वो हर समय दुबई जाने के बारे में बाते करता रहता था. हालाँकि दीदी उसकी इन बातो से कभी-कभी चिढ जाती थी मगर फिर भी वो उसके विचारो से सहमत थी.
फिर एक दिन ऐसा आया जब वो सच में दुबई चला गया. वहाँ उसे एक फर्म में नौकरी मिल गई थी. तब मैंने किराया बचाने और दीदी की सुविधा के लिए अपना किराये का कमरा छोड़ कर अपने आप को दीदी के एक बेडरूम फ्लैट में शिफ्ट कर लिया. ड्राइंग रूम के एक कोने में रखा हुआ दीवान मेरा बिस्तर बना और मैं उसी पर सोने लगा . दीदी अपने बेडरूम में सोती थी. एक ओर साइड में रसोइ और दूसरी तरफ लैट्रीन और बाथरूम.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
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दी जब वो पहनती थी उस समय सबसे ज्यादा आकर्षण उसकी टांगो में होता था.सलवार उसके पैरो से एकदम चिपकी हुई होती थी. जैसा की आप सभी जानते है ज्यादातर अपने यहाँ जो भी चुस्त सलवार बनती है वो झीने सूती कपड़ो की होती है. इसलिए दीदी की सलवार भी झीने सूती कपड़े की बनी होती थी और वो उसके टांगो से एकदम चिपकी हुई होती. कमीज़ थोरी लम्बी होती थी मगर ठीक कमर के पास आकर उसमे जो कट होता था असल में वही जानलेवा होता था. कमीज़ का कट चलते समय जब इधर से उधर होता तो चुस्त सलवार में कसी हुई मांसल जांघे और चुत्तर दिख जाते थे.
कविता दीदी की जांघे एकदम ठोस, गदराई और मोटी कन्दली के खंभे जैसी थी फिर उसी अनुपात में चुत्तर भी थे. एकदम मोटे मोटे , गोल-मटोल गदराये, मांसल और गद्देदार जो चलने पर हिलते थे. सीढियों पर चढ़ते समय कई बार मुझे कविता दीदी के पीछे चलने का अवसर प्राप्त हुआ था. सीढियाँ चढ़ते समय जब साडी या सलवार कमीज में कसे हुए उनके चुत्तर हिलते थे, तो पता नहीं क्यों मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती थी. इसका कारण शायद ये था की मुझे उम्र में अपने से बड़ी और भरे बदन वाली लड़कियोँ या औरते ज्यादा अच्छी लगती थी. सीढियों पर चढ़ते समय जब कविता दीदी के तरबूजे के जैसे चुत्तर के दोनों फांक जब हिलते तो पता नहीं मेरे अन्दर कुछ हो जाता था.
मेरी नज़रे अपने आप पर काबू नहीं रख पाती और मैं उन्हें चोर नजरो से देखने की कोशिश करता. पीछे से देखते समय मेरा सामना चूँकि दीदी से नहीं होता था इसलिए शायद मैं उनको एक भरपूर जवान औरत के रूप में देखने लगता था और अपने आप को उनके हिलते हुए चूत्तरों को देखने से नहीं रोक पाता था. अपनी ही दीदी के चुत्तरों को देखने के कारण मैं अपराधबोध से ग्रस्त हो शर्मिंदगी महसूस करता था. कई बार वो चुस्त सलवार पर शोर्ट कुर्ती यानि की छोटी जांघो तक की कुर्ती भी पहन लेती थी.
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उस दिन मैं उनसे नज़रे नहीं मिला पाता था. मेरी नज़रे जांघो से ऊपर उठ ही नहीं पाती थी. शोर्ट कुर्ती से झांकते चुस्त सलवार में कसे मोटे मोटे गदराये जांघ भला किसे अच्छे नहीं लगेंगे भले ही वो आपकी बहन के हो. पर इसके कारण आत्मग्लानी भी होती थी और मैं उनसे आंखे नहीं मिला पाता था.दीदी की चुत्तर और जांघो में जो मांसलता आई थी वही उनकी चुचियों में भी देखने को मिलती थी. उनके मोटे चुत्तर और गांड के अनुपात में ही उनकी चुचियाँ भी थी.
चुचियों के बारे में यही कह सकते है की इतने बड़े हो की आपकी हथेली में नहीं समाये पर इतने ज्यादा बड़े भी न हो की दो हाथो की हथेलियों से भी बाहर निकल जाये. कुल मिला कर ये कहे तो शरीर के अनुपात में हो. कुछ 18-21 साल की लड़कीयों जो की देखने में खूबसूरत तो होंगी मगर उनकी चुचियाँ निम्बू या संतरे के आकार की होती है. जवान लड़कियोँ की चुचियों का आकार कम से कम बेल या नारियल के फल जितना तो होना ही चाहिए. निम्बू तो चौदह-पंद्रह साल की छोकरियों पर अच्छा लगता है. कई बार ध्यान से देखने पर पता चल पाता है की पुशअप ब्रा पहन कर फुला कर घूम रही है.
इसी तरह कुछ की ऐसी ढीली और इतनी बड़ी-बड़ी होगी की देख कर मूड ख़राब हो जायेगा. लोगो का मुझे नहीं पता मगर मुझे तो एक साइज़ में ढली चूचियां ही अच्छी लगती है. शारीरिक अनुपात में ढली में हुई, ताकि ऐसा न लगे की पुरे बदन से भारी तो चूचियां है या फिर चूची की जगह पर सपाट छाती लिए घूम रही हो. सुन्दर मुखड़ा और नुकीली चुचियाँ ही लड़कियों को माल बनाती है.कई बार रसोई में या बाथरूम में काम समय मैंने देखा था की वो अपने पेटीकोट को उठा कर कमर में खोस लेती थी जिससे घुटने तक उसकी गोरी गोरी टांगे नंगी हो जाती थी. दीदी की पिंडलियाँ भी मांसल और चिकनी थी. वो हमेशा एक पतला सा पायल पहने रहती थी.
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उस दिन मैं रसोई में फ़्रिज से पानी लेने दो-तीन बार गया. रसोई में दीदी को बहुत पसीना आ रहा था. उसके चेहरे और पेट पर पसीना साफ़ दिख रहा था. पसीने के कारण सफ़ेद रंग का पेटीकोट उनके चुत्तरो से चिपक गया था. ब्लाउज भी काफी भींग गया था और उसकी चुचियों से चिपक गया था. ध्यान से देखने पर मुझे ऐसा लगा जैसे उनकी चुचियों के निप्पल भी ब्लाउज के ऊपर से दिख रहे थे. शायद दीदी ने गर्मी के कारण ब्रा नहीं पहना था. मैं फ्रीज से पानी निकाल कर पी रहा था तभी वो निचे झुक कर कुछ करने लगी, उनके चुत्तर मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से उभर कर आ गए. पसीने से भीगा पेटीकोट पूरी तरह से चिपक गया था और दोनों चुत्तर दिखने लगे थे.
नीले रंग की पैंटी और उसके किनारे साफ़ नज़र आ रहे थे. पेटीकोट का कपड़ा भींग कर उनकी गांड की दरार में फस जाता अगर उन्होंने पैंटी नहीं पहनी होती. मैं एक दम से घबरा गया और भाग कर जल्दी से रसोई से निकल गया. शुक्रवार की रातो को मैं आमतौर पर बहुत देर से सोता था. क्योंकि अगले दिन शनिवार और रविवार मेरे ऑफिस में छुट्टी होती थी. ऐसे ही एक शनिवार के दिन मेरे जीवन में एक नया मोर आया. शुक्रवार की रात थी और दीदी हमेशा की तरह 11 बजे रात को सोने चली गई थी. मैं देर रात तक केबल पर फिल्म देखता रहा. अगले दिन शनिवार को मेरी नींद बहुत देर से खुली . छुट्टी के दिनों में दीदी मुझे जगाती नहीं थी. क्योंकि घर में सभी जानते थे की मुझे देर तक सोना पसंद था. उस दिन ऐसा ही हुआ था. मैंने जब घड़ी देखी तो उस समय दिन के 10 बज रहे थे . मैं घबरा कर जल्दी से उठा.
अपने चारो तरफ देखते ही मुझे अहसास हो गया की दीदी बहुत पहले उठ चुकी है क्यों की, पुरे घर की सफाई हो चुकी थी . मुझे अपने देर से उठने की आदत पर शर्मिन्दगी हुई. जल्दी से ब्रश किया और चाय के लिए रसोई में जा कर खुद से चाय बना लिया और पेपर पढ़ते हुए चाय पिने लगा. बिना चाय पिए मुझे सुबह में बाथरूम जाने में प्रॉब्लम होती थी. दीदी शायद घर में नहीं थी, पड़ोस में किसी के पास गई थी. चाय ख़तम कर के मैं लैट्रीन चला गया.ये लैट्रीन पहले सेपरेट नहीं था. मतलब बाथरूम के साथ ही मिला हुआ था और एक ही दरवाजा था. इसके कारण बहुत असुविधा होती थी. क्योंकि एक आदमी के घुसने से ही लैट्रीन और बाथरूम दोनों इंगेज हो जाते थे.
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अगर घर में ज्यादा सदस्य न हो तब तो कोई प्रॉब्लम नहीं होती थी, मगर गेस्ट्स के आ जाने पर समस्या खड़ी हो जाती थी. लैट्रीन बाथरूम सेपरेट रहने पर दो आदमी एक साथ दो काम कर सकते थे. इसलिए लैट्रीन और बाथरूम दोनों को सेपरेट कर दिया गया. इसके लिए बाथरूम के बीच में लकड़ी के पट्टो की सहायता से एक दिवार बना दी गई. ईट की दीवार बनाने में एक तो खर्च बहुत आता दूसरा वो ज्यादा जगह भी लेता, लकड़ी की दीवार इस बाथरूम के लिए एक दम सही थी. लैट्रीन के लिए एक अलग दरवाजा बना दिया गया.दस मिनट बाद जब मैंने फ्लश कर लिया और बाहर निकलने वाला ही था की तभी मुझे लगा की कोई बाथरूम का दरवाजा खोल कर अन्दर घुसा है .
पता नहीं क्यों मगर मेरे पैर जहाँ थे वही रुक गए. कौन हो सकता है, ये बात ज्यादा सोचने की नहीं थी. मैं थोड़ी देर तक वही दरवाजा बंद होने की आहट का इन्तेज़ार करता रहा. दीदी शायद कोई गीत गुनगुना रही थी. लैट्रीन में उसकी आवाज़ स्पष्ट आ रही थी.बहुत आराम से उठ कर लकड़ी के पट्टो पर कान लगा कर ध्यान से सुन ने लगा. केवल चुड़ियो के खन-खनाने और गुन-गुनाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. फिर नल के खुलने पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी. मेरे अन्दर के शैतान ने मुझे एक आवाज़ दी, लकड़ी के पट्टो को ध्यान से देख.
मैंने अपने अन्दर के शैतान की आवाज़ को अनसुना करने की कोशिश की, मगर शैतान हावी हो गया था. दीदी जैसी एक खूबसूरत औरत लकड़ी के पट्टो के उस पार नहाने जा रही थी. मेरा गला सुख गया और मेरे पैर कांपने लगे. अचानक ही पजामा एकदम से आगे की ओर उभर गया. दिमाग का काम अब लण्ड कर रहा था. मेरी आँखें लकड़ी के पट्टो के बीच ऊपर से निचे की तरफ घुमने लगी और अचानक मेरी मन की मुराद जैसे पूरी हो गई. लकड़ी के दो पट्टो के बीच थोड़ा सा गैप रह गया था. सबसे पहले तो मैंने धीरे से हाथ बढा का बाथरूम स्विच ऑफ किया फिर लकड़ी के पट्टो के गैप पर अपनी ऑंखें जमा दी.दीदी की पीठ लकड़ी की दिवार की तरफ थी.
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मैंने सोचा की शायद दीदी अब अपनी ब्रा खोलेंगी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. अपने दोनों हाथो को बारी-बारी से उठा कर वो अपनी कांख को देखने लगी. एक हाथ को उठा कर दुसरे हाथ से अपनी कांख को छू कर शायद अपने कांख के बालो की लम्बाई का अंदाज लगा रही थी. फिर वो थोड़ा सा घूम गई सामने लगे आईने में अपने आप को देखने लगी.अब दीदी का मुंह बाथरूम में रखे रैक और उसकी बगल में लगे आईने की तरफ था.
मैंने सोच रहा था काश वो पूरा मेरी तरफ घूम जाती मगर ऐसा नहीं हुआ. उनकी दाहिनी साइड मुझे पूरी तरह से नज़र आ रही थी. उनका दाहिना हाथ और पैर जो की पेटिको़ट के अन्दर था पेट और ब्रा में कैद एक चूची, उनका चेहरा भी अब चूँकि साइड से नज़र आ रहा था इसलिए मैंने देखा की मेरा सोचना ठीक था और उन्होंने एक पीले रंग का फेसमास्क लगाया हुआ था.
अपने सुन्दर मुखरे को और ज्यादा चमकाने के लिए. अब दीदी ने रैक से एक दूसरी क्रीम की बोतल अपने बाएं हाथ से उतार ली और उसमे से बहुत सारा क्रीम अपनी बाई हथेली में लेकर अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठा दिया. दीदी की नंगी गोरी मांसल बांह अपने आप में उत्तेजना का शबब थी और अब तो हाथ ऊपर उठ जाने के कारण दीदी की कांख दिखाई दे रही थी.
कांख के साथ दीदी की ब्रा में कैद दाहिनी चूची भी दिख रही थी. ब्रा चुकी नोर्मल सा था इसलिए उसने पूरी चूची को अपने अन्दर कैद किया हुआ था इसलिए मुझे कुछ खास नहीं दिखा, मगर उनकी कांख कर पूरा नज़ारा मुझे मिल रहा था. दीदी की कांख में काले-काले बालों का गुच्छा सा उगा हुआ था.शायद दीदी ने काफी दिनों से अपने कांख के बाल नहीं बनाये थे. वैसे तो मुझे औरतो के चिकने कांख ही अच्छे लगते है पर आज पाता नहीं क्या बात थी मुझे दीदी के बालों वाले कांख भी बहुत सेक्सी लग रहे थे.
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मोटी और गदराई जांघे जो की शारीरिक अनुपात में हो, ऐसी जांघे. पेटीकोट के उठते ही मेरे सामने ठीक वैसी ही जांघे थी जिनकी कल्पना कर मैं मुठ मारा करता था. एकदम चिकनी और मांसल. जिन पर हलके हलके दांत गरा कर काटते हुए जीभ से चाटा जाये तो ऐसा अनोखा मजा आएगा की बयान नहीं किया जा सकता. दीदी की जांघे मांसल होने के साथ सख्त और गठी हुई थी उनमे कही से भी थुलथुलापन नहीं था. इस समय दीदी की जांघे केले के पेड़ के चिकने तने की समान दिख रही थी.
मैंने सोचा की जब हम केले पेड़ के तने को अगर काटते है या फिर उसमे कुछ घुसाते है तो एक प्रकार का रंगहीन तरल पदार्थ निकलता है शायद दीदी के जांघो को चूसने और चाटने पर भी वैसा ही रस निकलेगा. मेरे मुंह में पानी आ गया.लण्ड के सुपाड़े पर भी पानी आ गया था. सुपाड़े को लकड़ी के पट्टे पर हल्का सा सटा कर उस पानी को पोछ दिया और पैंटी में कसी हुई दीदी के चुत्तरों को ध्यान से देखने लगा. दीदी का हाथ इस समय अपनी कमर के पास था और उन्होंने अपने अंगूठे को पैंटी के इलास्टिक में फसा रखा था.
मैं दम साधे इस बात का इन्तेज़ार कर रहा था की कब दीदी अपनी पैंटी को निचे की तरफ सरकाती है. पेटीकोट कमर के पास जहा से पैंटी की इलास्टिक शुरू होती है वही पर हाथो के सहारे रुका हुआ था. दीदी ने अपनी पैंटी को निचे सरकाना शुरू किया और उसी के साथ ही पेटीकोट भी निचे की तरफ सरकता चला गया. ये सब इतनी तेजी से हुआ की दीदी के चुत्तर देखने की हसरत दिल में ही रह गई. दीदी ने अपनी पैंटी निचे सरकाई और उसी साथ पेटीकोट भी निचे आ कर उनके चुत्तरों और जांघो को ढकता चला गया.
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अपनी पैंटी उतार उसको ध्यान से देखने लगी पता नहीं क्या देख रही थी. छोटी सी पैंटी थी, पता नहीं कैसे उसमे दीदी के इतने बड़े चुत्तर समाते है. मगर शायद यह प्रश्न करने का हक मुझे नहीं था क्यों की अभी एक क्षण पहले मेरी आँखों के सामने ये छोटी सी पैंटी दीदी के विशाल और मांसल चुत्तरों पर अटकी हुई थी. कुछ देर तक उसको देखने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपनी पैंटी साफ़ करने लगी. फिर थोड़ी देर बाद ऊपर उठी और अपने पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया. मैंने दिल थाम कर इस नज़ारे का इन्तेज़ार कर रहा था.
कब दीदी अपने पेटीकोट को खोलेंगी और अब वो क्षण आ गया था. लौड़े को एक झटका लगा और दीदी के पेटीकोट खोलने का स्वागत एक बार ऊपर-निचे होकर किया. मैंने लण्ड को अपने हाथ से पकर दिलासा दिया. नाड़ा खोल दीदी ने आराम से अपने पेटीकोट को निचे की तरफ धकेला पेटीकोट सरकता हुआ धीरे-धीरे पहले उसके तरबूजे जैसे चुत्तरो से निचे उतरा फिर जांघो और पैर से सरक निचे गिर गया. दीदी वैसे ही खड़ी रही. इस क्षण मुझे लग रहा था जैसे मेरा लण्ड पानी फेंक देगा. मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करू.
मैंने आज तक जितनी भी फिल्में और तस्वीरे देखी थी नंगी लड़कियों की वो सब उस क्षण में मेरी नजरो के सामने गुजर गई और मुझे यह अहसास दिला गई की मैंने आज तक ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा. वो तस्वीरें वो लड़कियाँ सब बेकार थी. उफ़ दीदी पूरी तरह से नंगी हो गई थी.हालाँकि मुझे केवल उनके पिछले भाग का नज़ारा मिल रहा था, फिर भी मेरी हालत ख़राब करने के लिए इतना ही काफी था. गोरी चिकनी पीठ जिस पर हाथ डालो तो सीधा फिसल का चुत्तर पर ही रुकेंगी. पीठ के ऊपर काला तिल, दिल कर रहा था आगे बढ़ कर उसे चूम लू.
रीढ़ की हड्डियों की लाइन पर अपने तपते होंठ रख कर चूमता चला जाऊ. पीठ पीठ इतनी चिकनी और दूध की धुली लग रही थी की नज़र टिकाना भी मुश्किल लग रहा था. तभी तो मेरी नज़र फिसलती हुई दीदी के चुत्तरो पर आ कर टिक गई. ओह, मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा था. गोरी चिकनी चुत्तर. गुदाज और मांसल. मांसल चुत्तरों के मांस को हाथ में पकर दबाने के लिए मेरे हाथ मचलने लगे. दीदी के चुत्तर एकदम गोरे और काफी विशाल थे. उनके शारीरिक अनुपात में, पतली कमर के ठीक निचे मोटे मांसल चुत्तर थे.
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उन दो मोटे मोटे चुत्तरों के बीच ऊपर से निचे तक एक मोटी लकीर सी बनी हुई थी. ये लकीर बता रही थी की जब दीदी के दोनों चुत्तरों को अलग किया जायेगा तब उनकी गांड देखने को मिल सकती है या फिर यदि दीदी कमर के पास से निचे की तरफ झुकती है तो चुत्तरों के फैलने के कारण गांड के सौंदर्य का अनुभव किया जा सकता है.तभी मैंने देखा की दीदी अपने दोनों हाथो को अपनी जांघो के पास ले गई फिर अपनी जांघो को थोड़ा सा फैलाया और अपनी गर्दन निचे झुका कर अपनी जांघो के बीच देखने लगी शायद वो अपनी चूत देख रही थी. मुझे लगा की शायद दीदी की चूत के ऊपर भी उसकी कान्खो की तरह से बालों का घना जंगल होगा और जरुर वो उसे ही देख रही होंगी.
मेरा अनुमान सही था और दीदी ने अपने हाथ को बढा कर रैक पर से फिर वही क्रीम वाली बोतल उतार ली और अपने हाथो से अपने जांघो के बीच क्रीम लगाने लगी. पीछे से दीदी को क्रीम लगाते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो मुठ मार रही है. क्रीम लगाने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपने पेटीकोट और पैंटी को साफ़ करने लगी. मैंने अपने लौड़े को आश्वाशन दिया की घबराओ नहीं कपरे साफ़ होने के बाद और भी कुछ देखने को मिल सकता है. ज्यादा नहीं तो फिर से दीदी के नंगे चुत्तर, पीठ और जांघो को देख कर पानी गिरा लेंगे.करीब पांच-सात मिनट के बाद वो फिर से खड़ी हो गई. लौड़े में फिर से जान आ गई. दीदी इस समय अपनी कमर पर हाथ रख कर खड़ी थी. फिर उसने अपने चुत्तर को खुजाया और सहलाया फिर अपने दोनों हाथों को बारी बारी से उठा कर अपनी कान्खो को देखा और फिर अपने जांघो के बीच झाँकने के बाद फर्श पर परे हुए कपड़ो को उठाया.
यही वो क्षण था जिसका मैं काफी देर से इन्तेज़ार कर रहा था. फर्श पर पड़े हुए कपड़ो को उठाने के लिए दीदी निचे झुकी और उनके चुत्तर लकड़ी के पट्टो के बीच बने गैप के सामने आ गए. निचे झुकने के कारण उनके दोनों चुत्तर अपने आप अलग हो गए और उनके बीच की मोटी लकीर अब दीदी की गहरी गांड में बदल गई. दोनों चुत्तर बहुत ज्यादा अलग नहीं हुए थे मगर फिर भी इतने अलग तो हो चुके थे की उनके बीच की गहरी खाई नज़र आने लगी थी.
देखने से ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े खरबूजे को बीच से काट कर थोड़ा सा अलग करके दो खम्भों के ऊपर टिका कर रख दिया गया है. दीदी वैसे ही झुके हुए बाल्टी में कपड़ो को डाल कर खंगाल रही थी और बाहर निकाल कर उनका पानी निचोड़ रही थी. ताकत लगाने के कारण दीदी के चुत्तर और फ़ैल गए और गोरी चुत्तरों के बीच की गहरी भूरे रंग की गांड की खाई पूरी तरह से नज़र आने लगी.दीदी की गांड की खाई एक दम चिकनी थी.
गांड के छेद के आस-पास भी बाल उग जाते है मगर दीदी के मामले में ऐसा नहीं था उसकी गांड, जैसा की उसका बदन था, की तरह ही मलाई के जैसी चिकनी लग रही थी. झुकने के कारण चुत्तरों के सबसे निचले भाग से जांघो के बीच से दीदी की चूत के बाल भी नजर आ रहे थे. उनके ऊपर लगा हुआ सफ़ेद क्रीम भी नज़र आ रहा था. चुत्तरो की खाई में काफी निचे जाकर जहा चूत के बाल थे उनसे थोड़ा सा ऊपर दीदी की गांड की सिकुरी हुई भूरे रंग की छेद थी.
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अपने अंडकोष को अपने हाथो से सहलाते हुए हलके से सुपाड़े को दो उँगलियों के बीच दबा कर अपने आप को सान्तवना दिया.सारे कपड़े अब खंगाले जा चुके थे. दीदी सीधी खड़ी हो गई और अपने दोनों हाथो को उठा कर उसने एक अंगराई ली और अपनी कमर को सीधा किया फिर दाहिनी तरफ घूम गई. मेरी किस्मत शायद आज बहुत अच्छी थी. दाहिनी तरफ घूमते ही उसकी दाहिनी चूची जो की अब नंगी थी मेरी लालची आँखों के सामने आ गई. उफ़ अभी अगर मैं अपने लण्ड को केवल अपने हाथ से छू भर देता तो मेरा पानी निकल जाता.
चूची का एक ही साइड दिख रहा था. दीदी की चूची एक दम ठस सीना तान के खड़ी थी. ब्लाउज के ऊपर से देखने पर मुझे लगता तो था की उनकी चूचियां सख्त होंगी मगर 28-29 साल की होने के बाद भी उनकी चुचियों में कोई ढलकाव नहीं आया था. इसका एक कारण ये भी हो सकता था की उनको अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ था. दीदी को शायद ब्रा की कोई जरुरत ही नहीं थी. उनकी चुचियों की कठोरता किसी भी 17-18 साल की लौंडिया के दिल में जलन पैदा कर सकती थी.
जलन तो मेरे दिल में भी हो रही थी इतनी अच्छी चुचियों मेरी किस्मत में क्यों नहीं है. चूची एकदम दूध के जैसी गोरे रंग की थी. चूची का आकार ऐसा था जैसे किसी मध्यम आकार के कटोरे को उलट कर दीदी की छाती से चिपका दिया गया हो और फिर उसके ऊपर किशमिश के एक बड़े से दाने को डाल दिया गया हो. मध्यम आकार के कटोरे से मेरा मतलब है की अगर दीदी की चूची को मुट्ठी में पकड़ा जाये तो उसका आधा भाग मुट्ठी से बाहर ही रहेगा. चूची का रंग चूँकि हद से ज्यादा गोरा था इसलिए हरी हरी नसे उस पर साफ़ दिखाई पर रही थी, जो की चूची की सुन्दरता को और बढा रही थी
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इड से देखने के कारण चूची के निप्पल वन-डायेमेन्शन में नज़र आ रहे थे. सामने से देखने पर ही थ्री-डायेमेन्शन में नज़र आ सकते थे.तभी उनकी लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई का सही मायेने में अंदाज लगाया जा सकता था मगर क्या कर सकता था मजबूरी थी मैं साइड व्यू से ही काम चला रहा था. निप्पलों का रंग गुलाबी था, पर हल्का भूरापन लिए हुए था. बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं था मगर एक दम छोटा भी नहीं था किशमिश से बड़ा और चॉकलेट से थोड़ा सा छोटा. मतलब मुंह में जाने के बाद चॉकलेट और किशमिश दोनों का मजा देने वाला.
दोनों होंठो के बीच दबा कर हलके-हलके दबा-दबा कर दांत से काटते हुए अगर चूसा जाये तो बिना चोदे झर जाने की पूरी सम्भावना थीदाहिनी तरफ घूम कर आईने में अपने दाहिने हाथ को उठा कर देखा फिर बाएं हाथ को उठा कर देखा. फिर अपनी गर्दन को झुका कर अपनी जांघो के बीच देखा. फिर वापस नल की तरफ घूम गई और खंगाले हुए कपरों को वही नल के पास बनी एक खूंटी पर टांग दिया और फिर नल खोल कर बाल्टी में पानी भरने लगी. मैं समझ गया की दीदी अब शायद नहाना शुरू करेंगी.
मैंने पूरी सावधानी के साथ अपनी आँखों को लकड़ी के पट्टो के गैप में लगा दिया. मग में पानी भर कर दीदी थोड़ा सा झुक गई और पानी से पहले अपने बाएं हाथ फिर दाहिनी हाथ के कान्खो को धोया. पीछे से मुझे कुछ दिखाई नहीं पर रहा था मगर. दीदी ने पानी से अच्छी तरह से धोने के बाद कान्खो को अपने हाथो से छू कर देखा. मुझे लगा की वो हेयर रेमोविंग क्रीम के काम से संतुष्ट हो गई और उन्होंने अपना ध्यान अब अपनी जांघो के बीच लगा दिया. दाहिने हाथ से पानी डालते हुए अपने बाएं हाथ को अपनी जांघो बीच ले जाकर धोने लगी.
हाथों को धीरे धीरे चलाते हुए जांघो के बीच के बालों को धो रही थी. मैं सोच रहा था की काश इस समय वो मेरी तरफ घूम कर ये सब कर रही होती तो कितना मजा आता.झांटों के साफ़ होने के बाद कितनी चिकनी लग रही होगी दीदी की चुत ये सोच का बदन में झन-झनाहट होने लगी. पानी से अपने जन्घो के बीच साफ़ कर लेने के बाद दीदी ने अब नहाना शुरू कर दिया. अपने कंधो के ऊपर पानी डालते हुए पुरे बदन को भीगा दिया. बालों के जुड़े को खोल कर उनको गीला कर शैंपू लगाने लगी. दीदी का बदन भीग जाने के बाद और भी खूबसूरत और मदमस्त लगने लगा था. बदन पर पानी पड़ते ही एक चमक सी आ गई थी दीदी के बदन में.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.