Posts: 76,182
Threads: 890
Likes Received: 11,668 in 9,578 posts
Likes Given: 22
Joined: Dec 2018
Reputation:
118
प्रेमी संतोष से बिछुड़ने का गम दीपिका शादी के बाद भी नहीं भुला पाई थी. मगर वही प्रेमी जब उस की जिंदगी में दोबारा आया तो क्या वह उसे अपना पाई.
दफ्तर से लौटने के बाद शाम ढले उदय बरामदे में बैठा शाम की चाय की चुसकियां ले रहा था. दीपिका वहीं बैठी स्वैटर बुन रही थी.
शाम ढलते देख कर दीपिका ने बिस्तर समेटना शुरू किया. उस के हलके भूरे रेशम से बाल बारबार उस के गुलाबी गालों पर गिर रहे थे और वह उन्हें बारबार अपनी कोमल उंगलियों से कानों के पीछे धकेल रही थी.
‘‘अब उठो भी… यह चादर समेटने दो,’’ कहते हुए दीपिका ने संतोष को हिलाया, जो अब भी बिस्तर पर लेटा था.
‘‘रहने दो न इन जुल्फों को अपने सुंदर मुखड़े पर… जैसे चांद को बादल ढकने की कोशिश कर रहे हों,’’ संतोष ने दीपिका को अपनी जुल्फें पीछे करते देख कहा.
‘‘शाम होने को आई है, जनाब. अब भी इन बादलों को घर नहीं भेजा तो आज तुम्हारे इस चांद को घरनिकाला मिल जाएगा, समझे?’’
‘‘तुम्हें किस बात का डर है? न घर की कमी है और न घर ले जाने वाले की… जिस दिन तुम हां कह दो उसी दिन मैं…’’
‘‘बसबस, हां कर तो चुकी हूं… अब जाओ भी. उदय घर आते ही होंगे… तब तक मैं सब ठीकठाक कर लूं,’’ दीपिका फटाफट हाथ चलाते घर व्यवस्थित करते हुए बोली, ‘‘कल कितने बजे आएंगे, गुरुदेव?’’
‘‘वही, करीब 12 बजे,’’ कहते ही संतोष कुछ सुस्त हो गया, ‘‘अब यों चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगता मानो हम प्यार नहीं कोई गुनाह कर रहे हों.’’
‘‘गुनाह तो कर ही रहे हैं हम, संतोष.
यदि हमारी शादी हो गई होती तब अलग बात थी पर अब मैं उदय की पत्नी हूं… तुम मेरे घर में मेरे संगीत अध्यापक की हैसियत से आते हो. इस स्थिति में हमारा यह रिश्ता गुनाह ही तो हुआ न?’’
‘‘ऐसा क्यों भला? पहले हम दोनों ने प्यार किया… उदय तुम्हारी जिंदगी में बाद में आया. अगर तुम्हारे और मेरे घर वाले जातबिरादरी के चक्कर में न पड़ कर हमारे प्यार के लिए राजी हो गए होते और आननफानन में तुम्हारी शादी दूसरे शहर में न करवा दी होती तो…’’
‘‘छोड़ो पुरानी बातों को. यह क्या कम है कि दूसरे शहर में भी हम एकदूसरे से टकरा गए और एक बार फिर मिल गए. शायद प्रकृति को भी मेरे मन में तुम्हारे लिए इतना प्यार देख मुझ पर दया आ गई और उस ने हमारे समीप्य का रास्ता सुझा दिया.’’
दफ्तर से लौटने के बाद शाम ढले उदय बरामदे में बैठा शाम की चाय की चुसकियां ले रहा था. दीपिका वहीं बैठी स्वैटर बुन रही थी. संतोष को दीपिका के हाथ से बनी चीजें बहुत भाती थीं. इसीलिए वह संतोष के लिए कभी स्वैटर तो कभी दस्ताने बुनती रहती. उदय के पूछने पर कह देती कि अपनी किसी सहेली या छोटे भाई के लिए बना रही है. फिर बनाने के बाद खुशी से अपने पहले प्यार संतोष को उपहारस्वरूप दे आती.
दीपिका और उदय की शादी को 2 वर्ष बीत चुके थे. इन 2 वर्षों की शुरुआत में दीपिका बेहद उदासीन रही. उदय सोचता कि नया शहर, नया साथी और नई जिंदगी के चलते वह अपने पुराने जीवन को याद कर उदास रहती है. किंतु असली वजह थी उस का प्यार संतोष का उस से बिछड़ जाना. दीपिका बारबार उस शाम को कोसती जब वह और संतोष मूवी देख कर बांहों में बांहें डाले लौट रहे थे कि बड़े भाई साहब से उन का अचानक सामना हो गया. बिजली ही टूट पड़ी थी. वहीं बाजार से घसीटते हुए उसे घर लाया गया था. अब उस का कमरा ही उस का संसार बना दिया गया था. न कोई मिलने आएगा, न वह किसी से मिलने जा सकेगी. ढाई दिन भूख हड़ताल भी की दीपिका ने, किंतु कोई न पिघला. पेट की ज्वाला ने उसे ही पिघला दिया. संतोष से मिलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. घर वाले पुराने विचारों के थे और ऊपर से संतोष विजातीय भी था.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
Posts: 76,182
Threads: 890
Likes Received: 11,668 in 9,578 posts
Likes Given: 22
Joined: Dec 2018
Reputation:
118
‘अगर उस लड़के की जान की सलामत चाहती है, तो भूल जा उसे’, ‘एक बार आप आज्ञा दे दो भाई साहब उस कमीने के टुकड़े भी नहीं मिलेंगे,’ ‘मेरा मन करता है कि इस निर्लज्ज को ही जहर दे कर मार डालूं’ जैसे कठोर वाक्यों से उस की सुबह और शाम होने लगी थी. धीरेधीरे उस का मनोबल टूटने लगा था. फिर 15 दिनों के भीतर उस की शादी तय कर दी गई. उस की अपने होने वाले पति या आने वाली जिंदगी के बारे में कुछ भी जानने की लालसा नहीं थी. वह एक मुरदे की भांति वही करती गई, जो उस के घर वालों ने उस से करने को कहा. विवाहोपरांत वह दूसरे शहर में पहुंच गई जहां उदय की नौकरी थी. घर में केवल उस का पति और वह ही रहती थी. ससुराल वाले दूसरे शहर में रहते थे.
उदय बहुत अच्छा व्यक्ति था. किंचित गंभीर किंतु सरल. किसी भी लड़की के लिए ऐसा जीवनसाथी मिलना बेहद खुशी की बात होती. वह अपनी पत्नी की हर खुशी का ध्यान रखता. यहां तक कि सुहागरात पर दीपिका के चेहरे पर दुख की छाया देख उदय ने उसे जरा भी तंग नहीं किया. सोचा पहले वह अपने नए परिवेश में समा जाए.
कुछ दिन उदास रहने के बाद दीपिका ने भी अपना मन लगाने में ही भलाई समझी. वह अपने नए घर, अपने नए रिश्तों में अपनी खुशी तलाशने लगी.
उस शाम घर में एक छोटी सी पार्टी थी. उदय के सभी मित्र आमंत्रित थे. उदय के जिद करने पर दीपिका ने एक छोटा सा गीत सुनाया. सारी महफिल उस के सुरीले गायन पर झूम उठी थी. सभी वाहवाह करते नहीं थक रहे थे. उदय मंत्रमुग्ध रह गया था.
‘‘मुझे पता नहीं था कि मेरी बीवी ने इतना अच्छा गला पाया है. तुम संगीत की शिक्षा क्यों नहीं लेतीं? तुम्हारा मन भी लगा रहेगा और शौक भी पूरा हो जाएगा,’’ उस रात सब के जाने के बाद उदय ने कहा था.
दीपिका चुप रही थी. वह संगीत की कक्षा ही तो थी जहां उस की मुलाकात संतोष से हुईर् थी. दोनों के सुर इतनी अच्छी तरह से मेल खाते थे कि उन के गुरु ने स्वत: ही उन की जोड़ी बना दी थी. फिर साथ अभ्यास करतेकरते कब संगीत ने उन दोनों के दिल के तार आपस में जोड़ दिए, उन्हें पता ही नहीं चला. गातेगुनगुनाते दोनों एक उज्ज्वल संगीतमय भविष्य के सपने संजोने लगे थे. लेकिन उस एक शाम ने उन के सभी सपनों को चकनाचूर कर दिया था और आज फिर उदय संगीत का विषय ले बैठा था.
दीपिका के चुप रहने के बावजूद उस की इच्छाओं का ध्यान रखने वाले उस के पति ने इधरउधर से पता कर उस के लिए एक संगीत अध्यापक का इंतजाम कर दिया, ‘‘आज से रोज तुम्हें नए सर संगीत का अभ्यास करवाने आया करेंगे.’’
संतोष को अपने संगीत अध्यापक के नए रूप में देख कर दीपिका हैरान रह गई. विस्फारित आंखों उसे ताकती वह कुछ न बोल सकी. हकीकत से अनजान उदय ने दोनों की मुलाकात करवाई और फिर ‘आल द बैस्ट’ कहता हुआ दफ्तर चला गया.
‘‘तुम यहां कैसे? क्या मेरा पीछा करते हुए…?’’ दीपिका के मुंह से पहला वाक्य निकला.
‘‘नहीं दीपू, मैं तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा. मैं तो इस शहर में रोजगार ढूंढ़ने आया और किसी के कहने पर यहां नौकरी की तलाश में पहुंच गया.’’
‘‘मुझे दीपू कहने का हक अब तुम खो चुके हो, संतोष. अब मैं शादीशुदा हूं. तुम्हारे लिए एक पराई स्त्री.’’
पता नहीं नियति को क्या मंजूर था, जो संतोष और दीपिका को एक बार फिर एकदूसरे के समक्ष खड़ा कर दिया था. अपनीअपनी जिंदगी में दोनों आगे बढ़ने को प्रयासरत थे, परंतु इस अप्रत्याशित घटना से दोनों को एक बारगी फिर धक्का लगा था.
‘‘मुझे तुम संगीत सिखाने आने दो दीपू. नहींनहीं दीपिका. फीस के पैसों से मेरी मदद हो जाएगी. उदय के सामने मैं कोई बात नहीं आने दूंगा, यह मेरा वादा रहा.’’
2
बरसात की काई (भाग-2)
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
Posts: 76,182
Threads: 890
Likes Received: 11,668 in 9,578 posts
Likes Given: 22
Joined: Dec 2018
Reputation:
118
लेकिन अब दीपिका कुंआरी नहीं थी, शादीशुदा थी. अब वह इस सीमा को लांघ चुकी थी.
कहानी के बाकी भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
संतोष के आग्रह को दीपिका ठुकरा न सकी. कुछ घंटों की असहजता के बाद दोनों पहले की तरह घुलमिल गए. वही हंसीमजाक, वही मधुर स्वरलहरी भरा अभ्यास.
‘‘अपने अतीत में घटे हादसों पर शोकाकुल होने से अब क्या लाभ? जो होना था वह हो चुका. अब आगे की सुध लेने में ही समझदारी है,’’ अगले दिन अभ्यास के बाद उदास संतोष को दीपिका समझा रही थी. उसे संतोष का उदास चेहरा देख कर पीड़ा होती थी.
‘‘तुम्हें अपने सामने किसी और को देख मुझे जो पीड़ा होती है शायद तुम समझ नहीं सकतीं. तुम मेरी थीं और अब…’’ कहते हुए संतोष ने दीपिका की बांहें कस कर पकड़ लीं.
कुंआरी लाज को बचाए रखना हर लड़की को धरोहर में सिखाया जाता है.
लेकिन अब दीपिका कुंआरी नहीं थी, शादीशुदा थी. अब वह इस सीमा को लांघ चुकी थी. शादी के बाद उस ने मजबूरी में इस सीमा को लांघा, तो क्या अब अपनी खुशी के लिए नहीं लांघ सकती और फिर घर की चारदीवारी में किसी को क्या खबर लगेगी. फिर उस के पति ने स्वयं ही संतोष को उस के कमरे में धकेल दिया था. संतोष और दीपिका स्वयं को नहीं रोक सके. उन के प्यार का सागर उमड़ा और फिर बांध को तोड़ते चला गया.
इस घटना के बाद दीपिका का उन्मुक्त व्यवहार लौट आया था. उदय इस से काफी प्रसन्न था. उसे लग रहा था कि दीपिका संगीत में डूब कर इतनी खुश है.
‘‘कभी कोई स्वैटर हमारे लिए भी बना दो,’’ आसमानी रंग का स्वैटर देख उदय के मुंह में पानी आ गया, ‘‘क्या लाजवाब डिजाइन डाली है इस बार तुम ने.’’
‘‘अगली बार आप के लिए बना दूंगी, पक्का. यह तो अपने चचेरे भाई के लिए बना रही हूं. दरअसल, अगले महीने उस का जन्मदिन आ रहा है.’’
‘‘तो हो क्यों नहीं आतीं तुम अपने मायके? काफी अरसे से गई नहीं.’’
‘‘नहीं, नहीं, मुझे नहीं जाना. आप के खानेपीने का क्या होगा और फिर…’’
‘‘मैं कोईर् दुधमुंहा बच्चा हूं, जो इतनी चिंता करती हो? मायके जाने में भला कौन लड़की मना करती है? तुम तसल्ली से जाओ और सब से मिल कर आओ. मैं अपनी देखभाल खुद कर लूंगा,’’ उदय ने जोर दिया तो दीपिका मना न कर सकी.
‘‘अब क्या होगा, अब हम कैसे मिलेंगे? उस शहर में मिलना असंभव है, किसी ने देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा,’’ आज दोपहरी में दीपिका का अभ्यास में बिलकुल मन नहीं लग रहा था.
‘‘तुम चिंता मत करो. तुम से मिले बिना मैं भी नहीं रह सकता हूं. कुछ सोचता हूं…’’ संतोष ने आखिर एक उपाय निकाल लिया, ‘‘तुम और मैं यहीं इसी शहर में किसी होटल में रह लेंगे 3-4 दिन. उदय को तुम खुद ही फोन करती रहना अपने मोबाइल से. होटल के कमरे से बाहर ही नहीं निकलेंगे तो कोई हमें देखेगा कैसे? हंस कर कहते हुए संतोष दीपिका के बदन पर अठखेलियां करने लगा.’’
टे्रन के टिकट हाथ में लिए उदय को बाय करती दीपिका ट्रेन में सवार हो गई. अगले स्टेशन पर संतोष उस की प्रतीक्षा कर रहा था. वहां से दोनों होटल चले गए. रिसैप्शन पर गलत नाम बताने की सोची, किंतु आजकल आईडैंटिटी पू्रफ, घर का पता, पैन कार्ड आदि की कौपी रखी जाती है, इसलिए असली नामपता बताते हुए दोनों की हालत खराब हो रही थी. हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे थे, जिन से मुंह छिपाते दीपिका को किसी कालगर्ल वाली अनुभूति हो रही थी.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
Posts: 76,182
Threads: 890
Likes Received: 11,668 in 9,578 posts
Likes Given: 22
Joined: Dec 2018
Reputation:
118
‘‘मुझे पता होता कि ऐसा अनुभव रहेगा तो मैं कभी नहीं आती,’’ दीपिका को खुद पर गिलानी हो रही थी.
‘‘अब तो कमरे में आ गए हैं… छोड़ो न बातों को और आ जाओ मेरी बांहों में,’’ संतोष ऐसे लालायित था जैसे आज उस की सुहागरात हो.
‘‘ठहरो, पहले उदय को फोन कर के बता तो दूं कि मैं पहुंच गई हूं.’’
‘‘अरेअरे, यह क्या कर रही हो? अभी नहीं, तुम कल सवेरे पहुंचोगी. भूल गईं कि अभी तुम ट्रेन में सफर कर रही हो.’’
संतोष का अट्टहास दीपिका को जरा भी अच्छा नहीं लगा. एक ही कमरे में, बिना किसी लोकलाज के बावजूद दीपिका का यौवन संतोष की बांहों को टालने लगा. सिरदर्द का बहाना बना कर वह जल्दी सो गई.
अगली सुबह जब दीपिका ने चाय का और्डर दिया तो 2-3 वेटरों को उस ने अपनी ओर देख फुसफुसाते हुए पाया. ‘हो न हो ये हम दोनों के भिन्न नाम और पते के बारे में बात कर रहे होंगे… क्या सोच रहे होंगे ये मेरे बारे में… छि…’ दीपिका के मन का चोर बारबार सिर उठा रहा था.
‘‘अब तो फोन कर लूं उदय को? अब तक तो ट्रेन पहुंच गई होगी,’’ थोड़ीथोड़ी देर में यही राग अलापती दीपिका से संतोष भी परेशान हो उठा. बोला ‘‘हां, कर लो.’’
‘‘तुम्हारे चायपानी का इंतजाम तो ठीक है न? पता नहीं कैसे यह ट्रेन लेट हो गई. अकसर तो समय पर पहुंचती है,’’ उदय के सुर में चिंता घुली थी. शुक्र है दीपिका ने फोन उठाते ही यह नहीं कहा कि मैं ठीक से पहुंच गई. एक बार फिर वह बच गई. वह बहुत घबरा गई. बोली, ‘‘यदि मेरे मुंह से निकल जाता कि मैं ठीकठाक पहुंच गई तो क्या होता, संतोष?’’
‘‘कहा तो नहीं न. मत घबराओ इतना. कल वैसे ही तुम्हारे सिर में दर्द था. आज सोचसोच कर और सिरदर्द कर लोगी,’’ इस चोरीछिपे की पिकनिक से न तो दीपिका खुश थी और न ही संतोष को चैन था.
‘‘चलो, आज नीचे रेस्तरां में चल कर नाश्ता कर के आते हैं. तुम्हारा थोड़ा मन बहल जाएगा,’’ संतोष बोला.
उदय के साथ रहने से दीपिका को स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता करने की आदत हो गईर् थी. उस ने ओट्स और आमलेट लिया. संतोष ने कालेज के दिनों की तरह आलू के परांठे और रायता मंगवाया.
‘‘दीपू, इतना हलका नाश्ता क्यों? पेट ठीक नहीं है क्या?’’ संतोष ने पूछा.
‘‘अब हम कालेज में पढ़ते लड़केलड़की नहीं रहे, संतोष. उम्र के साथ हमें अपना खानपान और मात्र भी बदलनी चाहिए. उदय कहते हैं कि…’’ पर फिर दीपिका संभल कर चुप हो गई.
यह क्या हो रहा था उसे… बारबार उदय का खयाल, उदय की बात. उदय का नाम सुन संतोष के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. दोनों ने चुपचाप नाश्ता किया और फिर कमरे में लौट आए.
‘‘मैं बहुत बोर हो रही हूं, चलो कहीं घूम आएं,’’ दीपिका के अनुरोध पर संतोष मान गया. कमरे में पड़ेपड़े टीवी देख कर वह भी उकता रहा था. देर शाम तक दोनों ने आसपास के बाजार की खाक छानी और रात को कमरे में लौट आए. कपड़े बदल कर दीपिका बिस्तर पर लेट तो गई, किंतु जैसे वह उदय को टालती थी, वैसे आज उस का हृदय संतोष को टालने को कर रहा था. यह अजीब अपराधबोध की भावना क्यों जकड़ रही थी उसे आज?
संतोष को वह टाल नहीं पाई. मगर उस की ठंडी प्रतिक्रिया पर संतोष ने शिकायत अवश्य की, ‘‘यह क्या यंत्रचालित सी व्यवहार कर रही हो आज? क्या हुआ है?’’
दीपिका ने कोई उत्तर नहीं दिया. उस का मन स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि जिन घडि़यों के लिए वह तरसती रही, आज जब वे सामने हैं, तो क्यों वह भाग कर उन्हें नहीं पकड़ लेना चाहती?
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.
Posts: 76,182
Threads: 890
Likes Received: 11,668 in 9,578 posts
Likes Given: 22
Joined: Dec 2018
Reputation:
118
3
: बरसात की काई (भाग-3)
उदय के हावभाव देख कर संतोष और दीपिका दोनों को हैरानी हुई.
अगले दिन दीपिका ने 1 नहीं 2 बार उदय से फोन पर बात की. ‘‘सुबह के समय उदय खुश था, किंतु अभी जब मैं ने बात की तो वह कुछ चुप सा था. क्या बात हो सकती है?’’
‘‘दफ्तर के किसी काम में उलझा होगा. तुम्हें यहां उदय के मूड के बारे में बात करनी थी तो आई ही क्यों?’’ उदय के जिक्र से संतोष चिढ़ने लगा था. आज का दिन भी सुस्त बीता. जैसा सोचा था, वैसे कुछ नहीं हो रहा था. जबजब संतोष दीपिका को बिस्तर पर ले जाता, उस का व्यवहार इतना शिथिल रहता मानो सब कुछ उस की इच्छा के खिलाफ हो रहा हो. जिस अल्हड़ यौवन की खुशबू में संतोष खिंचा चला आता था, वह कहीं गायब हो चुकी थी. ऊपर से होटल का खर्च अलग. अगली शाम को ही दोनों ने लौटने की सोच ली.
‘‘कह दूंगी उदय से कि आप की याद आ रही थी.’’
दीपिका के कहने पर संतोष ने उस की आंखों को भेदते हुए पूछा, ‘‘कहीं यही सच तो नहीं?’’
दीपिका चुप रही. किंतु उस की झुकी नजरों ने भेद खोल दिया था. संतोष की उदासीन भावभंगिमा उस के उदास चेहरे से मेल खा रही थी. दीपिका को उस के घर रवाना कर संतोष अपने घर निकल गया.
शाम को घर लौटने पर अचानक दीपिका को अपने समक्ष पा उदय थोड़ा हैरान हुआ.
‘‘सरप्राइज,’’ चिल्ला कर दीपिका ने उदय के गले में बांहें डाल दीं.
‘‘जल्दी कैसे आ गई तुम? तुम्हें तो 2 दिन बाद आना था?’’ उदय के स्वर में कोई आवेग नहीं था.
‘‘क्यों, तुम्हें खुशी नहीं हुई क्या? अरे, तुम्हारी याद जो मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी, इसलिए जल्दी चली आई,’’ खाना लगाते हुए दीपिका चहक रही थी. आज उस का सुर उत्साह से लबरेज था, ‘‘इतने थके से क्यों लग रहे हो? तबीयत तो ठीक है न?’’
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं.