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चंडीगड़ में मेरे चाचा का परिवार रहता था. चाचा की कई साल पहले मौत हो चुकी थी. घर में चाची, उनका बेटा और बहू रहते थे. उनकी बेटी भी थी जिसकी अब शादी हो चुकी थी. तय यह हुआ की मैं होस्टल में न रहकर चाचा के घर में रहकर इंजिनियरिंग के चार साल बिताऊँगा. पहले मैं इस बात से बहुत नाराज़ हुआ. मुझे लगा की कॉलेज का मज़ा तो होस्टल में ही आता है, लेकिन मुझे क्या पता था की वो चार साल मेरी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत चार साल होंगे.
कुछ महीने बाद मैं निकल पड़ा चंडीगड़ के लिए. रास्ते भर मैं खुश था की कई साल बाद मैं अपनी भाभी से मिलूँगा. सुमन मेरे चचेरे भाई रवि की बीवी का नाम है. रवि भैया मुझसे उम्र में आठ साल बड़े हैं. उन्होने कॉलेज ख़त्म करने के कुछ महीने बाद ही सुमन भाभी से शादी कर ली थी. मैं न जाने कितनी बार सुमन भाभी के नाम की मुट्ठी मारी थी. और थी भी वो तगड़ा माल. शादी के वक़्त जब भाभी को दुल्हन के कपड़ो में देखा था, तब लंड पर काबू पाना मुश्किल था. मैने बस यही सोचा था की रवि भैया कितने खुशकिस्मत हैं जो इस बला की खूबसूरत लड़की को चोदने को मिल रहा है उन्हे.
खैर मैं अगले दिन चंडीगड़ पहुँचा और चाची और भाभी ने मेरा स्वागत किया. चाची बोली, "अब तू आ गया है, चलो कोई तो मर्द होगा घर में, नही तो तेरा भाई हर समय इधर-उधर भागता रहता है बस". भैया की सेल्स की जॉब थी जिस वजह से वो हर वक्त बाहर रहते थे. सुमन भाभी मेरे लिए पानी लेकर आई. क्या ज़बरदस्त माल लग रही थीं वो. गुलाबी साड़ी में किसी स्वर्ग की अप्सरा जैसी खूबसूरत, गोरा सुडौल बदन जो किसी नामर्द के लंड में जान डाल दे. पर जो सबसे खूबसूरत था वो था उनके पल्लू से उनका आधा ढका पेट और उसमे से आधी झाँकती हुई ठुण्डी. मैने उनके हाथ से पानी लिया पर मेरी नज़र उनके पेट से हट नही पा रही थी. दिल करता था की बस पल्लू हटा के उनके पेट और ठुण्डी को चूम लू.
तभी अचानक भाभी बोल पड़ी "क्या देख रहे हो देवर जी".
मैं तोड़ा झेप गया. सोचने लगा कहीं भाभी कुछ ग़लत ना सोचे या चाची को ये न लगे कि मैं उनकी बहू को ताड़ रहा हूँ.
मेरी नज़र भाभी के चेहरे पर पड़ी. इतनी खूबसूरत थी वो जैसे मानो भगवान ने फ़ुर्सत में पूरा वक्त देकर उन्हे बनाया हो.
"क्क्क-कुछ नही भाभी" मैं कुछ भी बोल पाने में असमर्थ था.
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"राजेश, तुझे सबसे उपर दूसरी मंज़िल पर कमरा दिया है. अपना सामान लगा ले और नहा-धो कर नीचे आजा खाने के लिए." चाची बोली.
मैं अपना सामान उपर ले जाने लगा. मेरी नज़र भाभी पर पड़ी, तो वो मेरी तरफ मुस्कुराकर कर देखी और अपना पल्लू हल्का सा खोलकर अपनी नाभि के दर्शन कराकर चिढ़ा रही थी.
शाम को भैया वापस आए. हम सब ने खाना खाया और रात को सोने चले गये. रात को मेरी नींद अचानक खुली. मुझे प्यास लगी थी. मैं पानी पीने के लिए नीचे गया. सबसे नीचे वाली मंज़िल पर चाची सो रही थी. मैं पानी पी कर उपर आ रहा था कि तभी पहली मंज़िल पर मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई दी. इस मंज़िल पर भैया-भाभी का कमरा था. उनके कमरे से एक औरत की मधुर कामुक आवाज़ें आ रही थी. मैने सोचा की कान लगा के सुने क्या चल रहा है अंदर. थोड़ा इंतज़ार करने के बाद मैने दरवाज़े पर अपना कान लगा दिया. अंदर से भैया बोल रहे थे, "सुम्मी, चूस... हाँ..और ज़ोर से चूस. मुझे मालूम है तू कितनी इस लंड की दीवानी है. चूस... चूस साली रांड़... चूस". और तभी भाभी के लंड चूसने की आवाज़ और तेज़ हो गयी.
मेरा लंड फनफना उठा. मुझसे रहा नही गया. मैने अपने पयज़ामे में से अपना लंड निकाला और और धीरे-धीरे उसे हिलने लगा.
"आह... आह...आह.... क्या मस्त चूस्ती है तू, साली मादरचोद"
भाभी भैया के लंड को ३ मिनिट से चूस रही थी.
"सुम्मी.... अब रुक जा... नही तो मैं तेरे मूँह में ही छूट जाऊँगा."
अंदर से भाभी की लंड चूसने की आवाज़ें बंद हो गयी.
"अब बता... मेरा लंड तुझे कितना पसंद है?"
भाभी बोली, "आप जानते हैं, फिर भी मुझसे बुलवाना चाहते हैं."
"बता ना मेरी जान"
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अचानक मेरी नज़र चाबी के छेद पर पड़ी. मैने अपनी आँख लगाकर देखा क्या हो रहा है अंदर.
भैया बिस्तर पर बैठे थे और भाभी ज़मीन पर अपने घुटनो पर. दोनो नंगे थे. भाभी को नंगा देख कर मेरी आँखें फटी रह गयी. गोरा शरीर, सुंदर चूचियाँ देख कर मैं अपने लंड को और तेज़ी से हिलाने लगा. हाथ में उनके भैया का लंड था जिसे वो हल्के-हल्के हिला रही थी.
"आपका लंड मुझे पागल कर देता है. रोज़ रात को ये कमीनी चूत मेरी, बहुत परेशन करती है. आपके लंड के लिए तरसती है. रोज़ रात को एक योद्धा की तरह आपके लंड से युद्ध करना चाहती है और उस युद्ध में आपसे हारना चाहती है. आपका अमृत पा कर ही इसे ठंडक मिलती है."
भाभी जीभ निकाल कर भैया के पेशाब वाले छेद को चाटने लगी.
"क्या सही में?.... आह!!!"
"हाँ... औरत की संभोग की प्यास मर्द से कई गुना ज़्यादा होती है. लेकिन आप आधे वक्त घर पर ही नही होते. ऐसी रातों में बस अपनी उंगली से ही इस कमीनी को शांत करती हूँ. बहुत अकेली हो जाती हूँ आपके बिना. दिल नही लगता मेरा."
"सुम्मी, उठ फर्श से..... "
भाभी फर्श से उठ कर भैया के सामने खड़ी हो गयी. मेरा लंड उनके नंगे बदन को और बढ़कर सलामी देने लगा. भैया ने भाभी की कमर को दोनो हाथों से पकड़ा और उनका पेट चूम लिया.
"सुम्मी, अगर ऐसी बात है तो क्यूँ ना मैं तेरे इस प्यारे से पेट में एक बच्चा दे दूँ?" यह कहके एक बार फिर उन्होने भाभी का पेट चूम लिया.
भाभी ने एक कातिल मुस्कान देकर कहा "हाँ, दे दीजिए मुझे एक प्यारा सा बच्चा. बना दीजिए मुझे माँ. बो दीजिए अपना बीज मेरी इस कोख में". भाभी अपना हाथ अपने पेट पर रखते हुए बोली.
"चल आजा बिस्तर पे. आज तेरी कोख हरी कर देता हूँ. बच्चेदानी हिला कर चोदून्गा, साली, एक साथ चार बच्चे पैदा करेगी तू." भैया बोले.
"रुकिये... पहले मेरी बुर चाट के इसे गीला कर दीजिए ना एक बार" भाभी बोली.
"मेरी जान, तुझे कितनी बार बोलू, मेरी चूत चाटना पसंद नही. बहुत ही कसैला सा स्वाद होता है."
"आप मुझसे तो अपना लंड चुसवा लेते हैं, मेरी चूत क्या इस काबिल नही की उसे थोड़ा प्यार मिले."
"तू चूस्ती भी तो मज़े से है, चल अब देर मत कर, लेट जा और टांगे खोल दे"
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भाभी ने वैसा ही किया. भैया अपने लंड पर थूक मल रहे थे.
भैया ने भाभी की टाँगों को खोल कर, अपना लंड हाथ में लेकर उसे भाभी की चूत पर रखकर एक झटका मारा.
"आह" भाभी के मूँह से निकला. भाभी का ख़याल ना रखते हुए, वो झटके पे झटके मार मार के अपना पूरा छेह इंच का लंड भाभी की चूत में जड़ दिया.
"साली, तेरी कमीनी चूत तो बेशर्मी से गीली हो रही है."
दोनो ने दो मिनिट साँस ली. फिर भैया बोले "छिनाल, तैयार हो जा... माँ बनने वाली है तू... इसी कोख से दर्जनों बच्चे जनेगी तू."
और फिर तीव्र गति से भाभी की चुदाई शुरू हो गई. भाभी भैया के नीचे लेटी हुई थी और चेहरे पे चुदाई के भाव थे.
"ओह... ओह... ओह... सस्स्स्सस्स... आह" भाभी के मुख से कामुक आवाज़ें सुन कर मैं अपना लंड और तेज़ी से हिलने लगा.
"ले चुद साली... और चुद...." भाभी का हाथ लेकर भैया ने उसे अपने टट्टो पर रख दिया.
"ले सहला मेरे टटटे... और ज़्यादा बीज दूँगा तुझे" भाभी भैया के टॅटन को सहलाने लगी.
भैया ने भाभी के कंधों पर हाथ रखकर उन्हे कसकर पकड़ लिया और कसकर चोद्ने लगे.
"ले, मालिश कर मेरे लंड की अपनी चूत से.... साली, क्या लील रही है तेरी चूत मेरे लंड को... लगता है बड़ी उतावली है तू मेरे बीज के लिए"
और भाभी चीख पड़ी...
"चोद मुझे साले भड़वे... दे दे मुझे अपना बच्चा.... हरी कर दे मेरी कोख". भैया ने चुदाई और तेज़ कर दी. अब तो पूरा बिस्तर बुरी तरह से हिल रहा था.
भाभी ने अपनी उंगली अपने मूँह में डालकर गीली की और उससे भैया के पिछवाड़े वाले छेद को रगड़ने लगी.
"आह... सुम्मी.. मैं छूटने वाला हूँ." भैया बोले.
"नही.. थोड़ा रूको... मैं भी छूटने वाली हूँ" भाभी बोली
"नही... और नही रुक सकता, सुम्मी..... आह... मैं छूट रहा हूँ... ये ले मेरा बीज... आह".
भैया ने सारा माल भाभी की चूत में डाल दिया.
फिर भैया एक तरफ करवट लेकर सो गये. मुझसे भी रहा नही गया. मैं भी छूट गया और मेरा सारा माल फर्श पर गिर गया.
थोड़ी देर बाद मैने च्छेद से झाँक कर देखा तो भैया सो गये थे, ख़र्राटों की आवाज़ आ रही थी. भाभी अभी भी जागी हुई थी और हाँफ रही थी. वो गुस्से में थी.
भैया की तरफ मुँह करके भाभी बोली "अपनी हवस मेरी चूत पर निकाल कर... करवट लेकर सो गया, मादरचोद!"
अचानक भाभी उठी तो मुझे लगा वो दरवाज़े पर आ रही हैं. इसलिए मैं वहाँ से भाग कर अपने कमरे में आ गया.
कुछ देर रुकने के बाद मैने सोचा एक आख़िरी बार भाभी के नंगे बदन के दर्शन कर लूँ. मैं ध्यान से नीचे उतरा और फिर से छेद से झाँका.
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नज़ारा देख के मेरा लंड फिर से जाग उठा. मेरी नंगी भाभी ने अपनी दो उंगलियाँ चूत में डाली थी. और दूसरे हाथ से वो अपना दाना रगड़ रही थी.
मैने फिर से लंड हिलना शुरू कर दिया. भाभी अपनी उंगलियों से अपनी ही चूत चोद रही थी और कामुक आवाज़ें निकल रही थी. कुछ देर बाद उनके अंदर से एक आवाज़ आई जो सिर्फ़ एक तृप्त औरत छूटते समय निकलती है. उसके बाद भाभी की चूत से फवररा सा निकला. मुझे लगा वो मूत रही थी.
खैर, उसके बाद भाभी लाइट बंद करके सो गयी और मैं भी अपने कमरे में आ के सो गया.
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अगले दिन सुबह उठा तो आठ बज रहे थे. मैने देखा कि मैं नंगा ही सो गया था और वो भी दरवाज़ा खुला छोड़ के. मुझे डर लगा की कहीं किसी ने मुझे नंगा तो नही देख लिया. तभी अचानक मेरा ध्यान, कल रात की घटनाओं पर पडा. कैसे मैने भैया-भाभी की चुदाई देखी और कैसे अपना माल फर्श पर गिरा दिया था. भाभी का गोरा सुडौल शरीर याद करके मेरा आठ इंच आठ इंच का लंड पूरा तन कर खड़ा हो गया.
मैने झट से दरवाज़ा बंद किया और भाभी के बारे में सोच कर अपना लंड हिलाने लगा. मैने आँखें बंद की और भाभी का नंगा बदन मेरे सामने आया. नंगी चूचियाँ और उनपर चॉक्लेट जैसे भूरे निप्पल जिनको भाभी अपने एक हाथ से मसल रही थी. और उनका खूबसूरत पेट और उसपर उनकी प्यारी सी नाभि. भाभी अपनी कमर एक नौटंकी में नाचने वाली रंडी के जैसे मटका रही थी और मुझसे खुद को चोदने का आग्रेह कर रही थी.
इतने में मुझसे रहा नही गया और मैं छूट गया. ढेर सारा माल मेरे लंड से छूट कर नीचे चादर पर गिरकर इकट्ठा होने लगा. मैने नंगे ही लेटकर कुछ देर आराम किया और फिर मेरी आँख लग गयी.
कुछ देर बाद दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ ने मुझे जगाया. "क्यूँ देवर जी, रात को क्या घोड़े बेचे थे जो इतना देर तक सो रहे हो. जल्दी उठो, आज आपका कॉलेज का पहला दिन है. चलो उठो."
"हन भाभी, बस २ मिनिट" मैं भूल ही गया था की आज मुझे कॉलेज जाना है." मैं अपने कपड़े ढूँढने लगा. लेकिन मुझे मेरी चड्डी नही मिली, तो मैं बिना चड्डी के सिर्फ़ पायजामे में दरवाज़ा खोला. पायजामे में मेरे वीर्य ने एक गीला धब्बा बना दिया था और साथ ही चड्डी न होने की वजह से मेरा लंड पायजामे में झूल रहा था. मैने दरवाज़ा खोला तो भाभी बोली "सासू माँ उपर नही चढ़ पाती तो उन्होने मुझे भेजा है. चलो नहा धो के नीचे आ जाओ. नाश्ता कर लो"
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भाभी कमरे में आ गयी. उन्होने साड़ी पहनी हुई थी और हर बार की तरह क़यामत ढहा रही थी. और हर बार की तरह मेरी नज़र उनके गोरे मुलायम और खूबसूरत पेट पर पड़ी. मन तो था कि अभी बिस्तर पर पटक के पेट चूम लू और नंगी करके चोद दूं. मैं यही ख़याल में था जब भाभी बोली
"तुम्हारा कमरा साफ कर देती हूँ, देवर जी. जाओ तब तक नहा लो."
भाभी की नज़र चादर पर मेरे वीर्य से बने गीले धब्बे पर पड़ी. "यह क्या है देवर जी"
भाभी ने हँसकर बोला "कहीं रात को बिस्तर गीला तो नहीं..... हाय राम राजेश, वो क्या है?"
"क्या भाभी?"
मैने भाभी की नज़र देखी और सर झुका कर देखा तो देखा की मेरा 8 इंच का लंड पजामे के मूतने वाले छेद से बाहर निकल कर भाभी को सलामी दे रहा था. मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. मैं लंड को पाजामे के अंदर करते हुए बाथरूम की तरफ भागा. बाथरूम का दरवाज़ा बंद करते समय मैं देखा भाभी के चेहरे अचंभे के भाव थे. मैं बातरूम के अंदर काफ़ी देर तक बंद रहा. सोचा कि भाभी ने सबको जाकर बता दिया होगा. बाहर निकला तो देखा कि भाभी मेरा पूरा कमरा ठीक करके गयी हैं. मैं नहा-धो के नीचे नाश्ते के लिए आया. वहाँ भैया और चाची नाश्ता कर रहे थे.
मैं चुपचाप आकर बैठ गया.
तभी भाभी मेरा नाश्ता लेकर आई और खुद भी बैठकर नाश्ता करने लगी. मेरी हालत खराब थी कि कहीं मेरी हरकत के बारे में बता ना दिया हो. भाभी ने कुछ देर बाद बोला, "सासू माँ, मैं सोच रही थी अपना राजू कितना सयाना हो गया है. हमारी शादी के वक़्त तो बस बच्चा ही था." ऐसा कहते हुए भाभी ने मेरे गाल खीचे. मुझे महसूस हो गया की भाभी कुछ देर पहली हुई घटना के बारे में किसी को नही बताया.
"हाँ बहू, बड़ा हो गया राजू." चाची बोली.
उसके बाद मैं कॉलेज चला गया. मेरा यही रवैया हो गया था. सुबह कॉलेज जाना. शाम को कॉलेज से आकर खाना खाना और रोज़ रात को भैया-भाभी की चुदाई देखना .
कुछ दिन बाद शनिवार का दिन था. भैया काम से बाहर गये थे. कॉलेज भी बंद था. मैं घर के बाघीचे में पौधो को पानी दे रहा था. तभी चाची बोली-"बेटा राजेश, ज़रा उपर जाकर सुमन को बुला दे".
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मैं उपर की ओर बढ़ा और भाभी के कमरे तक पहुँचा. मैने दरवाज़ा खटखटने की सोची लेकिन कुत्ते की पूंछ कभी सीधी हुई है? मैं हर बार की तरह चाभी वाले छेद से अंदर झाँकने के लिए झुका. नज़ारा देख कर मेरी आँखें फटी रह गयी और मेरा लंड फनफना कर खड़ा हो गया. सामने भाभी केवल गुलाबी रंग की ब्रा और चड्डी में खड़ी खुद को शीशे में निहार रही थी.
मैं अपना लंड निकल कर धीरे-धीरे हिलने लगा. भाभी के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी. वो अपने बदन को घूम-घूम कर आईने में देख रही थी. फिर वो अपने बदन के अंगों को हाथों से सहलाने लगी. गर्दन और चूचियों को सहलाते हुए वो अपने खूबसूरत पेट और नाभि पर हाथ फेरते हुए बोली "बहुत जल्द..."
उसके बाद भाभी ने अपनी ब्रा और चड्डी उतार दी और चूतड़ मटकाते हुए बाथरूम में नहाने चली गयी. मैं अपना लंड हिला रहा था. तभी मैने देखा की भाभी कमरा अंदर से बंद करना भूल गयी थी. मैं चुपचाप, बिना आवाज़ किए उनके कमरे में घुस गया. भाभी की ब्रा और चड्डी अभी भी ज़मीन पर पड़ी थी. मैने उनकी चड्डी ज़मीन से उठाई और उसे सूंघने लगा.
क्या मादक खुश्बू आ रही थी उनकी चड्डी से. ऐसी खुश्बू सिर्फ़ एक चुदासी औरत की चूत से ही आ सकती थी. मैं चड्डी सूंघते हुए अपना लंड बुरी तरह से हिला रहा था.
फिर मैंने उनकी चड्डी को अपने लंड पर लगाकर आँखें बंद कर ली. भाभी की चड्डी गीली थी. मैने अपना लंड चड्डी के उसी जगह पर लगाया था जहाँ भाभी की चूत थी. मेरा लंड का टोपा गीला हो चुका था. उस गीलेपन ने भाभी की चड्डी भी गीली कर दी. कुछ देर और हिलने के बाद मैं छूटने वाला था. मैने भाभी की चड्डी को एक बार अपने लंड से रगड़कर अलग किया और छूटने को तय्यार था.
मैने अपनी आँखें खोली तो देखा भाभी बाथरूम के दरवाज़े पर खड़ी थी. उन्होने सिर्फ़ एक पीली तौलिया पहनी थी. वो मेरी तरफ देख रही थी और उनका मूह हैरानी से खुला था. मेरा हाथ अपने लंड से छूट गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मेरा मुठ मेरे लंड से बाहर निकल कर फर्श पर गिर रहा था.
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भाभी की नज़र मेरे मुठ गिरते लंड पर पड़ी. जब मेरा लंड शांत हुआ, मैने अपना पजामा उठाया और वहाँ से निकालने की सोची.
"रुक!" भाभी की गरजती हुई आवाज़ ने मुझे रोका.
"बेशरम!... तू यह सब सोचता है अपनी भाभी के बारे में...."
भाभी मेरे पास आई और फर्श पर से अपनी गीली चड्डी उठाई. उन्होने उसे सूँघा और फिर मेरे गाल पर ज़ोर का थप्पड़ मारा.
"बदतमीज़... बहुत ठरक चढ़ही है ना तुझे... बता कब से चल रहा है ये सब.... बता वरना सासू माँ को सब बोलती हूँ"
"नही नही भाभी... प्लीज़.... किसी को मत बोलना... मैं बताता हूँ."
मैने भाभी को सब बताया. सब सुनने के बाद भाभी गुस्से में थी.
"तू रुक.... आज शाम को तेरे भैया को सब बताऊंगी... की उनका चचेरा भाई उनकी बीवी के बारे में कितने गंदे ख़याल रखता है."
"नही भाभी... प्लीज़.. भैया मुझे जान से मार डालेंगे."
"बिल्कुल... तेरे जैसे बेशार्मों की यही सज़ा होनी चाहिए"
"नही भाभी प्लीज़... आप जो कहोगी मैं वो करूँगा.... आप जो सज़ा देना चाहो दे दो"
"अच्छा... अभी सासू माँ खाना बनाने के लिए बुला रही हैं... खाना खाने के बाद इसी कमरे में आ... तेरी सज़ा तभी मिलेगी तुझे."
भाभी नीचे खाना बनाने चली गयी. उन्होने काली साड़ी पहन रखी थी. भाभी मेरे लिए खाना लेकर आई. हम तीनो खाना खा रहे थे. सबसे पहले चाची ने खाना ख़त्म किया और वो उठकर अपनी थाली रखने चली गयीं. टेबल पर सिर्फ़ मैं और भाभी थे. भाभी बोली- "खाना ख़ाके चुपचाप मेरे कमरे में चले जाना". मैं जवाब देने में असमर्थ था. मैने सिर्फ़ हाँ में सिर हिलाया.
फिर चाची की आवाज़ आई "सुमन, बेटा मैं सोने जा रही हूँ. तू भी टेबल सेमेटकर आराम कर ले. राजेश तुझे तो पढ़ाई करनी होगी." और फिर चाची कमरे में जाकर सो गयी. मैने खाना ख़त्म किया और भाभी के आदेशानुसार उनके कमरे में जाकर इंतज़ार करने लगा. कुछ देर बाद भाभी आई.
"हाँ... तो देवर जी... बताइए आपकी क्या सज़ा होनी चाहिए?"
"कुछ भी भाभी... बस प्लीज़ भैया को मत बताना."
"ठीक है... तो.." भाभी मेरे पास आई और मेरे पैजमे का नाड़ा खोल दिया.
"उतरो इसे और अपना लंड खड़ा करो मेरे सामने.... बहुत मज़ा आता है तुझे दूसरों को नंगा देखने में.... अब बता कैसा लग रहा है तुझे?"
साड़ी में से उनका नंगा पेट और प्यारी सी नाभि देखकर तो मेरा लंड तो पहले ही खड़ा था. मैं बस हिलाकर उसे तोड़ा आराम दे रहा था.
"रुक... हिलाना बंद कर.... अब खड़े लंड के साथ सॉरी बोलते हुए कान पकड़कर ३० बार उटठक- बैठक कर"
मेरा लंड भाभी के सामने तनकर खड़ा था. और मैने अपना लंड छोड़कर कान पकड़कर उटठक-बैठक करनी शुरू कर दी. मेरी नज़र भाभी पर ही थी. लेकिन भाभी सिर्फ़ मेरे झूलते हुए खड़े लंड को ही देख रही थी.
भाभी ने मेरे लंड को देखते हुए अपनी जीभ बाहर निकली और उससे अपने होठों को चाटा. मैने उटठक-बैठक ख़त्म की तो मेरा लंड बहुत दर्द कर रहा था. मैने उसे हिलाने के लिए भाभी से अनुमति माँगी. भाभी ने अपनी आँखें झपकाकर हाँ का इशारा किया.
मैं तुरंत अपना लंड धीरे-धीरे हिलाकर उसे आराम देने लगा. कुछ देर बाद भाभी बोली "रुक...!"
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मुझे लगा की फिर से सज़ा मिलेगी. लेकिन भाभी मेरे पास आई और मेरे लंड पर अपना थूक थूका और बोली "ले, इसे अपने पूरे लंड पर मल और फिर हिला"
मैने वैसा ही किया और मुझे और आनंद मिला. मैं आँखें बंद करके अपना लंड हिलाए जा रहा था. तभी मुझे अपने लंड पर कुछ गीला गरम-सा महसूस हुआ. मैने नीचे सिर झुकाया तो पाया की भाभी मेरा लंड अपने मुँह में लेकर चूस रही थी. मैने अपना हाथ लंड से हटाया और भाभी ने मेरे लंड के पूरे आठ इंच अपना मुँह में ले लिए. भाभी अपनी जीभ से मेरा पूरा लंड चाट रही थी. उनकी आँखें बंद थी और चाटते हुए उन्होने मेरा लंड अपने मुँह से निकाला और मेरे लंड के मूतने वाले छेद को जीभ से चाटने लगी.
मैं भाभी के बालों को सहलाते हुए बोल पड़ा "सुम्मी... चूसो इसे... चूस एक ढाई रुपये वाली रंडी के जैसे... मुझे मालूम है की तू कैसी लालची निगाहों से इसे देखती है.... चूस इसे... और प्यास बुझाले अपनी..."
भाभी ये सुनके मेरा लंड ज़ोर से चूसने लगी और हल्के-हल्के मेरे टट्टो को सहलाने लगी. मुझसे रहा नही गया. मैने भाभी का चेहरा दोनो हाथों से पकड़ा और कसके अपना लंड उनके मुँह से अंदर-बाहर करने लगा. कुछ ही देर में भाभी मेरी गांड पर चपत लगाने लगी और चिकोटी काटने लगी. मुझे दर्द हुआ तो मैने उन्हे छोड़ दिया.
भाभी कुछ देर खाँसी और फिर बोली "तू और तेरा भाई... दोनो एक नंबर के भड़वे.... साले मेरे से अपना लंड मज़े से चुस्वाएँगे... लेकिन दोनो में से कोई भी मेरी बुर नही चाटेगा.... चल इधर आ... और चाट इसे"
भाभी बिस्तर पर बैठ गयी. मैं ज़मीन पर अपने घुटनों पर बैठ गया. मैने उनकी साड़ी का पल्लू हटाया और उनका खूबसूरत पेट और नाभि नज़र आई. मुझसे रहा नही गया मैने उनकी नाभि चूम ली और पेट को अपने चेहरे से लगा लिया. भाभी ने मेरे बाल खीचें और बोली "साले... चूत चाटने को बोला था... मेरा पेट क्यों चूम रहा है?"
"भाभी, प्लीज़... आप नही जानती हो की आपके पेट और नाभि का मैं कितना दीवाना हूँ... दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ है ये... आपका गुलाम बनके रहूँगा हमेशा, बस मुझसे इसे प्यार करने दो"
भाभी ने मुझे अपने पेट और नाभि को खूब प्यार करने दिया.
"चल... अब देर मत कर... मेरी चूत बहुत प्यासी है"
मैने भाभी की साड़ी उठाई और उनकी खूबसूरत जांघें चूम ली. जांघें चूमते हुए मैने उनकी चड्डी उतार दी. फिर उनकी चूत के पास जाकर एक गहरी साँस अंदर ली. वो भाभी के बदन की असली खुश्बू थी. वो खुश्बू से मैं पागल हो गया और भाभी की चूत को मैने चूम लिया.
भाभी के मुँह से "आह!" निकल पड़ी. मैने सिर उठाकर उपर देखा तो भाभी के आँखें बंद थी और चहेरे पर कामुकता के खूबसूरत भाव थे.
भाभी बोली, "राजू, फिर से कर... बहुत तड़पाती है ये कमीनी". मैंने भाभी को थोड़ा परेशान करने की सोची. मैने चूत के पास अपना मुँह लगाया और दोनो जांघों को पास लाकर अपने गालों से चिपका लिया. फिर चूत के इर्द-गिर्द ही अपनी जीभ से भाभी की चूत छेड़नी शुरू की. मैने ठान ली की जबतक भाभी खुद तड़प कर मुझसे चूत चाटने को ना बोले, मैं उनकी चूत नही चाटूंगा. और मैने वैसा ही किया.
चूत के इर्द-गिर्द ही जीभ घुमा रहा था और इसके साथ ही मेरी खुरदरी दाढ़ी भाभी की जांघों को सता रही थी. भाभी बार बार सोच रही थी की मैं चूत अब चाटूँगा लेकिन मैं ऐसा नही कर रहा था. तंग आकर भाभी ने अपना हाथ मेरे सिर पर लगाकर मुझसे अपनी चूत चटवाने की कोशिश की लेकिन मैने फिर भी उनकी चूत नही चाटी. आख़िर में भाभी के सब्र का बाँध टूट गया और वो बोली "भड़वे साले... चाट ले ना अब मेरी चूत को"
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
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और फिर मैने भाभी की चूत पर अपनी जीभ चलानी शुरू कर दी. मैं एक हाथ से उनके पेट को हल्के हल्के दबा रहा था और साथ ही चूत चाटे जा रहा था. भाभी के मुँह से कामुक आवाज़ें आने लगी.
"हाँ राजू, चाट ले इसे... शांत कर दे साली को... बहुत तंग करती है ये तेरी भाभी को... बदला ले अपनी भाभी का इससे"
और मैं और तेज़ी से भाभी की चूत चाटने लगा. भाभी ने आगे से अपनी उंगली लाकर अपनी चूत का दाना रगड़ने लगी. वो ज़ोर से हाँफ रही थी. मैं भाभी के दाने से उनकी उंगली हटाई और अपनी उंगली से उनका दाना रगड़ने लगा.
"हाँ... हाँ... बस राजू वहीं पे... हाँ वही पे... बहुत मज़ा आ रहा है राजू... तू.. तू पागल कर देगा मुझे... हाँ राजू.. बस चाट मुझे" और फिर मैने भाभी को पूरी ताक़त से चाटना शुरू कर दिया. मुझे लगा की जैसे मेरी ज़िंदगी का मक़सद ही सुमन भाभी को कामुक सुख देना हो.
"रा... रा.. राजू.... मैं... मैं छूट रही हूँ.... मैं छूट रही हूँ.... आआआहह!"
भाभी ने अपनी जांघों से मेरा सिर पकड़ कर छूटने लगी. उनकी चूत से गाढ़े पानी की धार छूट कर सीधा मेरे मुँह पर गिरने लगी. मुझे लगा की वो मूत रही हैं लेकिन वो मूत नही रही थी. वो उनकी चूत का पानी था. भाभी ने सारा पानी मेरे मुँह पर छोड़ा और फिर शांत हो गयी.
मैने उनका पानी चखा. नमकीन लेकिन स्वादिष्ट था. मैंने सिर उठा के देखा तो पाया भाभी गहरी साँसें ले रही थी और चेहरे पर एक तृप्त औरत की हल्की सी मुस्कान थी. मैं भाभी के उपर आ गया और ब्लाउस फड़कर उनकी चूचियाँ आज़ाद कर दी और निपल चूसने लगा. फिर भाभी का चेहरा प्यार से पकड़कर उनको चूमने लगा. भाभी भी मेरे चुम्मो का जवाब देने लगी. हम दोनो कई मिनिट तक एक दूसरे को चूमते रहे. मैने उनकी आँखें भी चूमी.
मेरा लंड और भाभी की चूत भी एक दूसरे को चूम रहे थे. मैं भाभी के कान में बोला "भाभी.... क्या मैं...?"
भाभी ने मुझे गले से लगाया और बोली "हाँ राजू.... डाल दे"
मैने झट से अपना लंड भाभी की चूत में डाला. छूट इतनी गीली थी की फ़ौरन मेरा लंड जड़ तक भाभी की चूत में घुस गया. मैने भाभी की चूत में अपने लंड ले खुदाई करने लगा. भाभी की चूत मेरे लंड को लील रही थी. मैं अपने लंड की मालिश भाभी की चूत से कर रहा था और भाभी के नर्म रसीले होंठ चूम रहा था.
जल्द ही मैं भी छूटने वाला था. भाभी मुझसे प्यार से चुदवा रही थी. उनके दोनो हाथ मेरे चूतड़ पर थे. मैं सोच रहा था की अपना माल कहाँ निकालू. अचानक मुझे याद आया की उस रात भैया भाभी को बच्चा देने वाले थे. ये ख़याल आते ही मुझसे रहा नही गया और मैं भाभी की चूत के अंदर ही छूट गया. छूटते समय मैने भाभी को फिर चूम लिया.
जब मैं पूरी तरह से छूट गया तो भाभी के उपर से उतरकर उनके बगल में लेट गया और प्यार से उनका पेट सहलाने लगा, ये सोचकर की शायद मेरा बच्चा अब इस पेट में पल रहा है. मैने भाभी को लेट-लेट अपनी बाहों में लिया. उन्होने भी मुझे अपनी बाहों में लिया. हम दोनों ने एक दूसरे को चूमा और चिपक कर सो गये.
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मैं जब उठा तो भाभी मेरे से चिपक के सो रही थी. मैने घड़ी देखी तो उसमे चार बज रहे थे. मैने भाभी को देखा. वो बहुत प्यारी लग रही थी. मैने उन्हे थोड़ा कस्के अपनी बाहों में जकड़ा और प्यार से उनके होंठ चूम लिए. फिर उनके नंगे बदन को अपने हाथ से सहला रहा था. उनकी पीठ से होते हुए अपने हाथ उनके चूतड़ पर ले गया. उनके सुंदर चूतड़ पर हाथ मलते हुए मैने एक चपत लगाई. भाभी लेकिन उठी नही. उनके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी. मैने फिर उनके होंठ चूम लिए.
फिर मैने भाभी के घुटने के नीचे वाले हिस्से को पकड़ा और उनका पैर अपने सीने तक ले जाकर उनकी एड़ी अपने चूतड़ पर रख दिया. भाभी अब भी सो रही थी और उनकी चूत पूरी तरह से खुल गयी थी. मेरा लंड खड़ा हो चुका था. मैने अपना लंड हाथ में लिया और लंड के टोपे को उनकी चूत पर रगड़ने लगा.
भाभी नींद में 'म्म्म्ममम' की आवाज़ निकालने लगी. मुझे याद आया की मैने अपना वीर्य भाभी के अंदर छोड़ा था और शायद उससे वो माँ बन चुकी होगी. इसलिए मैं उनका पेट सहलाने लगा. भाभी को माँ बनाने के ख़याल ने मेरा लंड और कड़ा कर दिया. मुझसे रहा नही गया. मैने अपना लंड भाभी की चूत पर टिकाया और ज़ोर का झटका मारा. लंड एक ही बार में सारे बंधन तोड़ के पूरे आठ इंच भाभी की चूत में जाकर बस गया. भाभी चीख मार के उठी. मैने अपना हाथ जल्दी से उनके मूँह पर रखा. भाभी कुछ देर ऐसे ही कराह रही थी.
थोड़ी देर बाद मैने हाथ हटाया और लंड आगे-पीछे करने लगा. भाभी गुस्से से मुझे देख रही थी. मैं उनके चूमने के लिए आगे बढ़ा, भाभी बोली- "दूर हट.... इतनी बेरहमी से डाला है तूने अपना लंड मेरे अंदर.... बलात्कार करेगा अपनी भाभी का?"
मैने चुदाई बंद कर दी.
"नही भाभी... आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हो... मैं और आपका बलात्कार.... बलात्कार सिर्फ़ हिजड़े करते हैं. आपकी चूत गीली थी तो मुझे लगा... अगर आपको मैने दर्द दिया तो मुझे माफ़ कर दीजिए"
भाभी ने मुझे पुचकारा. मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोली- "राजू... तुझे कुछ भी करना हो मेरे साथ, मेरी अनुमति ले लिया कर.... तेरे साथ चुदाई के बाद मैं बहुत ही मीठी नींद सो रही थी. अचानक तेरे लंड के हमले ने मुझे जगा दिया. तुझे ये मालूम होना चाहिए की तेरी भाभी भी एक इंसान है सिर्फ़ एक चूत नही जिसमे तू कभी भी अपना लंड पेल देगा.... चल, कोई बात नही... इधर आ."
भाभी ने मुझे अपने पास बुलाया और मेरा माथा चूम के मुझे अपने सीने से लगा लिया. मेरा सर भाभी की चूची पर था. उनकी भूरी निप्पल मैने अपने मुँह में ली और चूसने लगा.
"ओ... दूद्धू पिएगा भाभी का?"
उन्होने अपना हाथ से मुझे सहारा दिया और ऐसे लगा जैसे एक माँ अपने बच्चे को दूध पीला रही हो. ज़ाहिर सी बात है की उनकी चूची से असली दूध नही निकला लेकिन मैं फिर भी चूस्ता रहा.
"राजू... चुदाई क्यों बंद कर दी तूने?.... तेरे लंड डालने के तरीके से नाराज़ थी मैं... तेरे लंड से नही.... तेरी एक चुदाई ने मुझे तेरे लंड का दीवाना बना दिया है.... क्या चोदता है तू... जानवर पाल रखा है तूने... चल चोद ले मेरी चूत को."
मैं भाभी के उपर चढ़ गया और फिर से ठुकाई करने लगा. भाभी की चूत बेशर्मी से गीली हो रही थी. वो मेरे लंड को जकड़े हुए थी. मैं फिर भी पूरी लगन से भाभी को चोद रहा था.
"हाँ राजू... चोद मुझे... चोद मुझे... तेरे मोटे लंड की दीवानी हो गयी हूँ मैं... इतना लंबा है ये... मैं इसे अपने बच्चेदानी में महसूस कर रही हूँ.... चोद मुझे... निकल अपनी ठरक मेरी चूत में"
मैने भाभी को चूम लिया और सटा-सट चोदने लगा. मेरे हाथ भाभी की चूचियों को कस के पकड़ कर चोद रहा था और उनके हाथ मेरे चूतड़ पर थे. वॉ अपनी उंगली से मेरी गान्ड का छेद रगड़ने लगी. बदले में मैं भी उनका दुद्धु पीने लगा. थोड़ी देर बाद भाभी बोली- "राजू... मैं.... मैं....मैं छूटने वाली हूँ"
मैं भाभी को बेरहमी से चोदे जा रहा था. अचानक भाभी मेरे चूतड़ पर अपने नाख़ून कस के गढ़ा दिए और 'आआआआअ" की आवाज़ के साथ छूटने लगी. मुझसे भी रहा नही गया. मैं भाभी का निप्पल जिसे मैं चूस रहा था ज़ोर से काटा और भाभी की चूत में ही छूटने लगा.
मेरे सारा माल गिराने के बाद, मैं भाभी के उपर बेहोश पड़ा रहा. कुछ देर बाद भाभी मेरे चूतड़ पर हल्के-हल्के चपत लगाने लगी.
"उठ राजू.... शाम हो गयी है... सासू माँ भी उठने वाली होंगी"
मैं भाभी के उपर से उठा और बगल में लेट कर आराम करने लगा. भाभी उठ कर बाथरूम में चली गयी और नहाने लगी. मैने उनको बहुत गंदा कर दिया था.
भाभी नहा कर बाहर आई और अपनी साड़ी पहनने लगी. मैं उठा और भाभी को पीछे से जाकर पकड़ा.
"भाभी... आज आपको मज़ा आया?"
"मज़ा?... तूने मुझे सबसे ज़्यादा सुख दिया है... ऐसा सुख जो सिर्फ़ एक मर्द ही एक औरत को दे सकता है.... तेरे लंड की तो मैं अब पूजा करूँगी"
मैं भाभी के सामने आया और घुटनो पर ज़मीन पर बैठ गया. भाभी की साड़ी का पल्लू खोला और उनका पेट सहलाने लगा. उनकी नाभि चूम ली.
"राजू, एक बात बता... मेरे पेट से तुझे इतना लगाव क्यों है? हमेशा इसको ही प्यार करता रहता है"
"भाभी... मेरे लिए ये दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ है... आपका पेट और आपकी ये प्यारी सी नाभि" मैने नाभि चूमते हुए बोला.
"लेकिन भाभी, अब तो ये पेट बहुत जल्द फूल जाएगा"
"वो भला क्यों, राजू"
"क्योंकि भाभी, मैने अपना वीर्य आपकी चूत में छोड़ा था.... आप मेरे बच्चे की माँ बनने वाली हो"
भाभी हँसते हुए बोली
"अरे पगले... ऐसे ही किसी लड़की की चूत में अपना वीर्य छोड़ने से लड़की माँ नही बनती"
"तो फिर क्या भाभी?"
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"महीने के कुछ दिन ख़ास होते हैं.... तब मेरी बच्चेदानी में अंडा होता है... उसे जब मर्द का बीज आकर मिलता है तब बच्चा पैदा होता है.... लेकिन तू फ़िक्र मत कर... जिस दिन मेरी बच्चेदानी में अंडा हुआ और चूत में तेरे लंड की खुजली हुई, तो तू कॉंडम पहनकर मेरे साथ सेक्स कर लेना... वैसे भी मुझे भी एक नाजायज़ औलाद को जन्म नही देना"
मैं भाभी का पेट चूमता रहा. भाभी साड़ी पहन कर तय्यार हो रही थी. मैं नंगा ही उनका पेट चूम रहा था. उनकी बातें सुन के मेरा लंड पूरा तन गया.
भाभी बोली, "चल राजू, तू भी कपड़े पहन ले.... हाय राम, इतनी चुदाई के बाद भी तेरा लंड खड़ा हो गया... कोई हैवान छुपा है तेरे लंड में."
"भाभी... बस आपके प्यार को तरसता है ये.... इसे थोड़ा प्यार कर लो ना"
मैने उपर उठ कर बोला. भाभी मुस्कुराई और ज़मीन पर बैठ कर मेरा लंड हाथ में लेकर उससे खेलने लगी. उन्होने मेरे लंड पर थूका और मेरा लंड पर थूक मलने लगी.
वो मेरे लंड को हिलाने लगी. मेरे लंड के टोपे पर पानी आ चुका था जिसे भाभी ने जीभ निकल कर चखा.
"बड़ा अच्छा स्वाद है तेरे लंड का, राजू"
भाभी मेरे लंड को चूम रही थी, चाट रही थी. मैं उम्मीद कर रहा था की भाभी मेरे लंड को चूसेंगी. लेकिन भाभी ने ऐसा नही किया. उन्होने मेरे दोनो टटटे पकड़े और बारी-बारी से एक-एक को मूँह में लेकर चूसा.
मुझसे रहा नही गया और मैने भाभी का चेहरा पकड़ा और लंड मूँह में डालकर अंदर-बाहर करने लगा. भाभी ने चूतड़ पर चपत लगाई. लंड मूँह से निकालकर बोली "अभी सिखाया हुआ पाठ भूल गया. मेरे साथ कुछ भी ज़बरदस्ती मत करना... इजाज़त ले हमेशा."
"सॉरी भाभी... पर लंड बहुत तंग कर रहा था... प्लीज़ चूसो ना इसे"
भाभी मेरे लंड को चूसने लगी और मेरे टटटे सहलाने लगी.
उन्होने लंड मूह से बाहर निकाला और बोली "राजू, मैं अभी नहा कर आई हूँ इसलिए मुझे गंदा मत करना... मेरे मुँह में ही अपना वीर्य निकल देना" और भाभी फिर से मेरा लंड चूसने लगी.
भाभी पूरे चाव से मेरा लंड चूस रही थी और प्यार से मेरे टटटे सहला रही थी. फिर उन्होने एक हाथ मेरे चूतड़ पर रख दिए और प्यार से चूतड़ सहलाने लगी. वो मेरा लंड चूस रही थी और साथ ही मेरे टटटे और चूतड़ सहला रही थी. फिर उन्होने अपनी उंगली ली और मेरे चूतड़ के छेद को उससे रगड़ने लगी. इतने में मैंने भाभी का सिर पकड़ा और मूँह में ही छूटने लगा. करीब ३० सेकेंड छूटा और फिर शांत हो गया.
भाभी मेरा सारा माल पी गयी. मैं फर्श पर ही लेट गया. भाभी अपनी साड़ी ठीक करने लगी.
"चल राजू... कपड़े पहन ले और अपने कमरे में चला जा."
मैं उठा. भाभी का पल्लू हटा के नाभि चूमी, कुछ देर पेट को अपने चेहरे से लगाया और फिर कपड़े उठा कर नंगा ही अपने कमरे में चला गया.
जिंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं.
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