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हेलो दोस्तों, मेरा नाम राइटर (काल्पनिक) है. बहुत समय से अपने जीवन के एक अध्याय को आप सब के साथ शेयर करने का सोच रहा था.. आज अवसर मिला तो सोचा बिना देर किए ये शुभ कार्य कर डालता हूँ.
बहुत समय से मैं अपने चाचा के घर पर उन्हीं के परिवार के साथ रह रहा हूँ… और अब भी रहता हूँ... क्यों? ये आपको कहानी के अंत में पता चल ही जाएगा. दरअसल मास्टर्स के लिए यहीं के एक कॉलेज में दाखिला मिला था. मेरे कहीं और भाड़ा ले कर रहने के आईडिया पर चाचा को बहुत गुस्सा आया था --- पापा तक को कड़े शब्दों में कहा था उन्होंने की जब तक उस शहर में वो या उनकी फैमिली है तब तक मुझे उसी शहर में रहने के लिए कोई कमरा भाड़े पे लेने की आवश्यकता नहीं है.
मैं काफ़ी खुश हुआ था. मेरे मम्मी - पापा भी. पापा को तो अपने छोटे भाई पर बड़ा गर्व भी हुआ था.. रह - रह कर मेरी मम्मी और मुझे कहते रहते की 'देखो, इसे कहते हैं सँस्कार. अपने परिवार के लिए, भाई, बड़े भाई के लिए कुछ भी करने की सोचना; हर किसी को नहीं मिलता --- ना ये सँस्कार और ना ऐसा भाई.'
चाचा के इसी दयालुता की भरपाई करने के लिए ही पापा ने न जाने मुझे कितने तरह की घुट्टी पिलाई... 'चाचा और उनके परिवार का अपने सामर्थ्य -अनुसार ध्यान रखना, चाचा की सेवा करना, समय - समय पर चाची की मदद करते रहना, उनके बच्चों को परेशान नहीं करना, उनको सताना नहीं,' इत्यादि.
मम्मी और पापा के इसी तरह के कई सीख व उपदेशों की गाँठ बाँध कर एक दिन चाचा जी के यहाँ आ गया.
हालाँकि एक बात तो तय नज़र आई कि चाची कुछ खास खुश नहीं थी. सामने से कुछ बोली भी नहीं, लेकिन उनके हाव भाव से स्पष्ट दिख गया की घर में एक अतिरिक्त सदस्य के बढ़ जाने से और चाहे कुछ हो न हो, वो कम से कम खुश तो नहीं थी.
चाचा और दोनों बच्चों से बहुत प्यार व अपनापन मिला; पर चाची से उतना नहीं.
चाची मेरे लगभग सभी बातों का जवाब सिर्फ़ चार शब्दों में देती,
'हाँ', 'ठीक है', 'अच्छा', 'हम्म'.
चाचा के कारण सामने से विरोध न जता कर अच्छे से पेश आती किंतु बड़े शालीन तरीक़े से मुझे ये जता देती की इस घर में तो मैं आ गया लेकिन उनके दिल में मेरा रत्ती भर भी 'स्वागत' नहीं है.
खैर, मैं चाचा से ज़्यादा मतलब रखता था.. क्योंकि देखा जाए तो मैं तो चाचा के घर आया था, और घर के मालिक तो चाचा ही हैं इसलिए एक चाचा के अलावा किसी और ने मेरे बार में क्या सोचा और उसे / उन्हें कैसा लगा, इन सब बातों से मुझे कुछ खास फर्क पड़ना भी नहीं चाहिए था.
पर धीरे - धीरे ही सही, मैंने चाची के दिल में भी जगह बनाना शुरू कर दिया था… नहीं, मैं कोई शौक से उनके दिल में जगह नहीं बनाया और ना ही कोई कोशिश किया.. मैं तो चाहे सुबह हो या शाम, बच्चों और चाचा जी के साथ समय बिताता था; बच्चे मुझसे बहुत प्यार करने लगे थे. वे चाहे घर में रहे या कॉलेज के लिए निकले, खेले या होमवर्क बनाए, हर समय मुझे ही अपने पास चाहते… और चूंकि मैं भी उन पर अच्छे से ध्यान देता था तो उनके होमवर्क समय पे होने लगे थे और उनकी हैंडराइटिंग भी पहले से काफ़ी सुधर चुकी थी. इस बात की तारीफ़ खुद इनके टीचर चाचा - चाची से पेरेंट - टीचर मीटिंग में करते.
हाँ, ये सब कोई दो तीन दिन या सप्ताह में नहीं हुआ.. समय लगा. तकरीबन तीन महीने. दिन थोड़ा कम ज़्यादा हो सकता है…
साथ ही, घर के कई कामों में भी हाथ बंटाता था…
इन सभी कारणों से चाची का मन मेरे प्रति नर्म होने लगा था.
इसी तरह दो साल बीत गए…
कॉलेज के एग्जाम्स में मैंने अभी तक बहुत अच्छा रिज़ल्ट लाया था. आसपास के मोहल्लों के लड़के - लड़कियों को ट्यूशन भी देने लगा था और मुझसे पढ़ कर उनके परीक्षा परिणाम भी बहुत बढ़िया आने लगे थे. साथ ही मेरा एक छोटा - सा फ्रेंड्स ग्रुप भी बन गया था और मेरे कुछेक गुणों के कारण सब मेरे कायल भी हो गए थे. इन सबकी ख़बर चाचा - चाची को बराबर मिलती रहती… चाचा को तो बहुत गर्व होता, पर चाची का.... पता नहीं!
इन सब के बावजूद भी मैं बहुत अच्छे से जानता था की चाचा के कारण ही मुझे इस घर में स्थान मिला है; जाने अंजाने मुझसे हुई एक भी ग़लती चाची के मन में मेरे प्रति खटास भर सकती है. दो साल कोई कम समय नहीं होता लेकिन करियर के नज़रिए से अभी मैं बहुत निश्चिंत नहीं था. आज के समय में सिर्फ़ कॉलेज पास ऑउट होना ही किसी भी तरह की नौकरी की गारंटी नहीं है. मेरे ग्रुप के निशांत की बात ही कर लूँ; उसके बाप को रिटायर होने में अब बस साल भर का समय रह गया है.. छोटा भाई अब भी पढ़ाई कर रहा है... कुछ समय पहले ही इसके बड़ी बहन की शादी हुई थी; अपर मिडिल क्लास वाले घर में शादी कराने के चक्कर में इसके बाप को 2 - 3 जगह से क़र्ज़ लेना पड़ा था. वो क़र्ज़ अभी पूरा चुकता हुआ नहीं है. थोड़ा - थोड़ा कर के चुकाया जा रहा है और अब निशांत के माँ - बाप को निशांत से भी कुछ उम्मीदें हैं. इसलिए बेचारा पिछले चार महीने से नौकरी के लिए मारा - मारा फिर रहा है. पढ़ने में कितना अच्छा या बुरा था ये मुझे नहीं मालूम लेकिन ये खुद कहता रहा है कि,
“अपन को कभी पढ़ाई में मन लगा ही नहीं.”
अब चूँकि कुछ ज़िम्मेदारियाँ इस पे भी आने लगीं थीं इसलिए एक कंप्यूटर कोचिंग सेंटर से ADCA कोर्स कर लिया
था; उस पे भी DTP में ख़ास ध्यान दिया था… अब जहाँ भी नौकरी के लिए अप्लाई करता वहाँ या तो वैकेंसी नहीं होती या फिर अँग्रेज़ी, हिंदी टाइपिंग के अलावा दो और भाषा टाइपिंग में सिद्धहस्त होने का बिन माँगा सुझाव दिया जाता. कभी Word per minute ज़्यादा होने की माँग होती तो कभी टैली जानकार होने की माँग होती…. और अगर टैली आती भी है तो कॉमर्स बैकग्राउंड होने की शर्त लग जाती!
ठीक ऐसी समस्याओं से मुझे भी दो चार होना पड़ता है.. फ़िलहाल फूल टाइम नौकरी की जरूरत है नहीं मुझे लेकिन अगर कभी पार्ट टाइम नौकरी करने की नौबत आ गई तो तब मेरी क्या और कैसी परिस्थिति होगी; यही सोच - सोच कर अक्सर बहुत डर जाता हूँ.
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एक दिन चाचा के ऑफिस के लिए निकल जाने के बाद घर के कंपाउंड में चाची पौधों को पानी दे रही थी. मौसम साफ़ और ख़ुशमिज़ाज़ था... मेरा नाश्ता हो गया था और अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ा सिगरेट ले रहा था. उस लड़ाई वाले घटना को करीब एक सप्ताह - दस दिन बीत गया था और चाचा अब भी उसी दुकान से हर दूसरे दिन मिठाई या कुछ नमकीन वगैरह ले आते हैं. निश्चिंतता की बात ये है की इतने दिनों में वे दोनों लड़के चाचा वहाँ उस दुकान में या दुकान के आसपास नहीं दिखे.
पर मैं मन ही मन उन लड़कों के तरफ़ से किसी भी अप्रिय घटना के लिए प्रस्तुत रहने लगा था. कुछ लफंगे चोट खाए हिंसक जानवर की भाँति होते हैं, पलट कर वार ज़रूर करते हैं.
खिड़की से बाहर धुआँ उड़ाता हुआ मैं अपने भविष्य के बारे में सोच रहा था. पता नहीं ग्रेजुएशन के बाद क्या होगा..? कब तक मुझे यहाँ, इस घर में रहना होगा. हालाँकि यहाँ एक अगर चाची को छोड़ दिया जाए तो चाहे चाचा हो या इनके बच्चे, ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चे, युवा हों या उनके माँ - बाप, घरवाले, हर किसी से मुझे लाड़ - प्यार, विश्वास मिला है. चाची के व्यवहार में थोड़ी नरमी आयी है बस, पूरी तरह से बदली नहीं है.
इसी तरह की कई सारी बातें सोचते - सोचते मेरी नज़र खिड़की से नीचे आँगन में पौधों को पानी देते चाची पे गयी. मेरे उलट पौधों को झुक कर पानी दे रही थी चाची… फलस्वरूप, लो - कट ब्लाउज में झाँकती उनकी पीठ और कमर मेरे सामने थी. कमर से नीचे उनकी उभरी गाँड़ पे नज़रें टिक गयीं. दो सेकंड उनके गाँड़ को देखा नहीं की मेरे कमर के नीचे हलचल शुरू हो गई!
क्या मस्त गोल, सुडौल गांड़ पाई है चाची ने… चाचा की तो बल्ले - बल्ले हो जाती होगी.
वैसे, चाचा से जिस प्रकार के मूल विचार उभरते - निकलते रहते हैं; उससे लगता नहीं की एक मिशनरी छोड़ कर और कोई पोजीशन करते होंगे.
आह! काश ऐसी ही गोल गाँड़ कम से कम छूने भर के लिए मिल जाए मुझे!!
अभी मैं चाची के सुडौल गाँड़ जैसी एक गाँड़ की अपने लंड पे उछालने की कल्पना कर ही रहा था की अचानक मेरी नज़र हमारे ग्रिल गेट के उस पार गुजरती सड़क पे गई जहां चार लड़के खड़े थे. ये चारों लड़के हमारे घर के सामने से गुज़र रहे थे की उनमें से एक लड़के की नज़र घर का मुख्य गेट जोकि ग्रिल का है उससे होते हुए भीतर आंगन में पौधों को पानी देती चाची पे पड़ी.. वह लड़का तुरंत रूक कर उनको देखने लगा. उसे यूँ अचानक से रूक कर सामने वाले घर की ओर देखता देख कर बाकी भी उसके पास आ कर हमारे घर की ओर देखने लगे और देखते ही सब के सब मानो वहीं जड़ हो गए --- मुँह खुला का खुला रह गया --- आँखें और चौड़ी हो गईं!
मैं अपने कमरे की खिड़की से लड़कों की हालत देख कर पहले तो हँसा और फिर तुरंत ही सजग हो कर ये सोच कर उत्सुकता बढ़ी की इन सालों ने ऐसा क्या देख लिया की इनकी ये जड़वत -स्थिति हो गई..? मैं लड़कों की स्थिति से ज़्यादा उन लड़कों को लेकर फ़िक्रमंद हो गया क्योंकि उन चार लड़कों में से दो उन्हीं लौंडों के मुखड़े थे जिनमें से एक को कुछ दिन पहले अपने मुक्के का स्वाद चखाया था... कदाचित ये महज संयोग ही होगा की आज ही इन दोनों को यहाँ होना था.
खैर, मैं तुरंत कमरे से निकल कर पीछे वाले दरवाज़े से घर के बाहर आ कर एक बड़ा -सा चक्कर लगा कर उन्हीं लड़कों के पीछे आ कर खड़ा हो गया और उन लड़कों के देखने वाली दिशा में नज़र गड़ाया --- और फिर मैंने भी जो देखा वो देख कर जान ही हलक को आ गई! दिल भी शायद कंफ्यूज हो गया की उसे ज़ोर - ज़ोर से धड़कना है या धकड़ना ही बंद कर देना है?!
मैंने वो देखा जिसे देखने की चाह हमारे उम्र के हर लौंडे को रहती है... और वो भी अगर खास कर के किसी विवाहित या मैच्योर आयु की महिला के हो तो बात ही क्या..?!
थोड़ी दूरी बना कर उन लड़कों के पीछे से मैंने देखा की चाची का पल्लू अपनी जगह से हट गया है... इतना हट गया है की लगभग मान सकते हैं की सीने पर से गिर गया है और घोर आश्चर्य की बात तो यह है की उनको देख कर लग रहा है कि उनको इस बारे में बिल्कुल भी ध्यान नहीं है. वह अपने में मगन रहते हुए कभी पौधों को पानी दे रही है तो कभी किसी पौधे को हाथ से छू - छू कर देखने लगती है. वह जितना टाइम उस पोजीशन में रहती, उनके V -कट ब्लाउज से दूध की दोनों थैलियाँ बाहर छलकी हुई रहतीं और फलस्वरूप एक बहुत ही सुंदर, आकर्षक, गहरी, लम्बी -सी क्लीवेज का निर्माण भी हो रहा था.
ऐसे दृश्य तो हर आयु के मर्दजात में अत्यंत लोकप्रिय होते हैं!
"शशशssss.... क्या माल है यार!"
"हाँ, भाई... ऊपर से लेकर नीचे, आगे - पीछे... एकदम भरी हुई है."
"काश, एक बार छूने को मिल जाती...!"
"हाँ यार.... देख के ही खड़ा हो गया है... छूने को मिलता तो पता नहीं क्या होता?"
"होता क्या, इतना भरा हुआ जिस्म सामने से अधनंगा देखते ही हमारा पूरा माल निकल जाता.."
"अरे माल क्या निकलता.. माल का पूरा ज्वालामुखी ही फट पड़ता यार!"
"ज़्यादा कुछ समझ तो नहीं आ रहा है इतनी दूर से लेकिन इतना कह सकता हूँ की इसके होंठ पतले हैं..."
"तो...?!"
"तो ये की ज़रा सोच के देख, जब हमारा अपना मुँह में लेगी तब क्या ही जबरदस्त फील आएगी!"
"हा हा हा हा हा..." इस बात पे सब हँसने लगे.
तभी चौथे ने कहा,
"अबे तुम लोग मुँह में लेने - देने की क्या बात कर रहे हो... उन दूध की टंकियों को देखो ज़रा.. इनके बीच में अपना लंड देने भर से ही ज्वालामुखी निकलवा देगी साली."
"अबे हाँ यार, एकदम पॉइंट वाला बात बोला तू." बाकी तीनों ने हाँ में हाँ मिलाया.
"और इसका चेहरा देख... क्या मस्त गोल है न."
"हाँ भाई.. गाल ही क्या मस्त फूले हुए से हैं... इन गालों को तो चाट - चाट कर दाँतों से हल्का काटने में मज़ा ही आ जाएगा!"
"और गले के आसपास का एरिया देख... कंधों को देख... इतनी भरी हुई है की ब्लाउज तो मानो कंधे के माँस में धँसी जा रही है."
"हम्म, भरी तो है.. लेकिन भारी नहीं है."
"एकदम सौ टका बात कही है भाई तूने।"
तभी तीसरा बोला,
"तुम लोगों ने एक और ख़ास बात नोट नहीं किया."
"क्या??"
"गौर से इसकी चूचियों को देखो…."
"अबे यार, तब से तो वही देख रहे हैं."
"हाँ बे, वही तो देख रहे हैं."
"पर तुम लोग वो नहीं देख रहे जो मैं देख रहा हूँ."
"ऐसा क्या देख रहा है बे...?!"
"चूचियों की गहराई देख रहे हो..?"
"हाँ..?"
"और उसका मंगलसूत्र..?"
"हम्म…. तो..?"
"सोच यार... जब ये घोड़ी बनती होगी तब क्या ही सीन बनता होगा..!"
"तू बता..."
"क्या बताऊँ.. बस, ये सोच की तू इसकी चब्बी गाँड़ को पीछे से थपकी दे रहा है.. ज़ोर - ज़ोर से और ये 'आह' 'आह' कर रही है... इसके ये फूली हुई, बड़ी चूचियाँ लटक रही हैं और चूचियों के साथ ही साथ इसकी पवित्रता की निशानी, इसके सती - सावित्री होने का गवाह ये मँगलसूत्र भी लटक रहा है और हर धक्के पे आगे - पीछे डोल रहा है..."
इतना सुनते ही बाकी तीनों लड़के एक साथ आहें भर उठे...
"आहहहsss…अबे हाँ यार....."
दो ने तो वहीं अपना - अपना लंड पैंट के ऊपर से पकड़ कर मसल दिया. तीसरा अपने सीने पे हाथ रख कर सहलाने लगा और चौथा अपने दोनों हाथ पैंट के पॉकेट में डाल कर ऐसे किया जिससे समझ में आ गया की अंदर से लंड पकड़ रखा है.
तभी न जाने ऐसा क्या हुआ की चाची को पीछे मुड़ना पड़ा.. और उनके ऐसा करते ही साड़ी में ढकी उनकी मस्त गोल गाँड़ हमारे सामने आ गयी! और तो और वो कुछ यूँ झुकी की उनका कमर तक का हिस्सा नीचे और गाँड़ ऊपर की ओर पूरा उठा गया!!
ये नज़ारा देख कर उन लड़कों की क्या बात करूँ; खुद मेरी हालत दिल के एक्स्ट्रा तेज़ गति से धड़कना चालू कर देने के कारण मरने जैसी हो गई.
बाकी उन चारों लड़कों के हालत भी कुछ सही नहीं थे. उनको देखते ही मैंने तय किया की मुझे अब थोड़ा साइड हो जाना चाहिए नहीं तो पकड़े जाने का भी पूरा चाँस है.
मेरा ये निर्णय बहुत सही साबित हुआ क्योंकि जैसे मैं कुछ कदम पीछे हटा उन चारों में से किसी ने सीटी मार दी और एकाध गाड़ियों के आते - जाते शोर में भी चाची को यह सुनाई दी गयी. वह तुरंत पलट कर देखी --- गेट के उस पार चार लड़कों को अपनी तरफ़ देखता हुआ पा कर चाची पहले घर को देखी, फिर पौधों को और फिर अपने शरीर पर नज़र दौड़ाई. जैसे ही अपने सीने को पल्लू से हीन देखी; झट से सीधी हो पल्लू को सही की और एकाध पौधे पर नाम मात्र का पानी दे कर जल्दी से घर में घुस गई.
ऐसा होते ही उन लड़कों के मुँह से हताशा के डूबे स्वर एक साथ निकले… बेचारे सुनहरे दृश्य को अधिक समय तक देख जो नहीं पाए. बाकी के तीन लड़के उस चौथे वाले को गुस्से से देखा और जम कर उसे खरी - खोटी सुनाते हुए साथ में चले गए.
लड़कों का बाद में क्या हाल हुआ होगा ये कौन जाने… मुझे उस बात में कोई इंटरेस्ट नहीं था. मेरी हालत तो ऐसी खूबसूरत, सँस्कारी महिला के अंदर छुपे एक कामदेवी का साक्षात्कार होने भर से ही बहुत बुरी हो गई थी. मैं दौड़ कर अंदर गया और कमरे का दरवाज़ा लगा कर सीधे अटैच्ड बाथरूम में घुसा और अब तक बीते पूरे दृश्य को याद कर - कर के हिलाने लगा.
किसी महिला को याद कर के गिराया गया मेरा वो पहला माल मुझे ताउम्र याद रहेगा.
रात को मैंने गौर किया की अपने कमरे में चाची चाचा से किसी विषय पर बड़ी गंभीरता से कोई बात कर रही है... कोई बात बहुत अच्छे से बता रही है और चाचा भी उत्तर में 'हम्म, हम्म' कर रहे हैं.
कमरे के अंदर से आती चाची की दबी आवाज़ से मैं इतना तो समझ ही गया की वह दिन में बीती घटना की शिकायत चाचा से कर रही है... और इस बारे में चाचा सिवाय सुनने के अलावा कर भी क्या सकते हैं..? वो शायद खुद मन ही मन कह रहे होंगे की साली तू है ही ऐसी कमाल की बम की तुझे 3-4 लड़के क्या, मोहल्ला क्या... पूरा बाजार देखता होगा!
वैसे बहुत पहले अपने किसी दोस्त या शायद अपने ही उम्र के किसी लड़के से सुन रखा था की आजकल कई पति ऐसे भी होते हैं जो अपनी बीवी की खूबसूरती दूसरे के सामने दिखा कर या दूसरों को अपनी बीवी को घूरते देख कर बहुत हॉर्नी हो जाते हैं.... और सब से ज़्यादा मज़ा तो तब आता है जब इनकी बीवी ही अपने पतियों को ऐसे किसी इंसान या घटना के बारे में बताती हैं.
इस बात का ख्याल आते ही मैं ये सोचने को मजबूर हो गया की क्या मेरे चाचा भी ऐसे ही एक 'मर्द' हो सकते हैं...?
जारी है....
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अगले एक हफ्ते तक वही चार लड़के हमारे घर के सामने से एक खास समय पर गुज़रते रहें. क्यों गुज़रते रहें…? इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था मेरे लिए. एक ऐसी विवाहिता महिला जो हर उस जगह से मीट और चर्बी से भरपूर हो जहाँ से होने की कामना की जाती है, कौन नहीं देख - देखकर अपनी आँखें नहीं सेकना चाहेगा... भले ही वो कपड़ों से पूरी तरह पैक्ड हो.
मनुष्य की, उसमें भी खासकर मर्दजात की कल्पना -शक्ति बहुत तेज़ व विकसित होती है… कई सारी बातों को, जो अभी हुई ही नहीं है या होने की कोई संभावना है.. या नहीं है... उसमें भी न जाने क्या से क्या और कहाँ से कहाँ तक सोच लेते हैं. और बात जब कुछ गलत सोचने की हो, तब तो कोई सीमा रह ही नहीं जाती. यही हाल आजकल के बेरोज़गार, लफ़ूआ, मनचले लौंडों का है. जिस सोच से लाइफ बने वह तो सोचना नहीं है लेकिन उसके अलावा दुनिया की हर चीज़, हर बात,... जिनमें से अधिकतर गलत, अमर्यादित होती हैं; वो सब सोच लेना है. फिर लड़कियों, महिलाओं को लेकर गलत कैसे और क्यों ही न सोचा जाए…? वैसे सभ्य, शिक्षित कहलाने वाले भी कुछ कम नहीं होते.
यहाँ इस मामले में भी उन लड़कों ने चाची की मादक शरीर के दर्शन के बाद गलत ही सोचा होगा… साला खुद मैं चाची के नाम पर उस दिन के बाद एक - एक दिन कई - कई बार हिलाया हूँ... इन लड़कों की बात ही क्या करना?
लेकिन उन बेचारों को मायूसी ही हाथ लगी. ऐसा इसलिए क्योंकि मेरी बुद्धिमति चाची ने पौधों को पानी देने का अपना समय ही बदल लिया था.
यहाँ एक और बात नोटिस की मैंने. उस एक दिन के बाद से चाची का कपड़ा पहनने का स्टाइल थोड़ा अलग हो गया --- उनके कपड़े पहले कहीं अधिक अच्छे ढंग से उनके जिस्म से चिपकने और ढकने लगे हैं. ब्लाउज तो अभी भी वही डीप बैक कट वाले हैं लेकिन अब मेरे आसपास होने पर चाची अपने जिस्म को साड़ी से अच्छे से ढक लेती है. जहाँ तक संभव हो, वह अपना पेट भी ढककर रखने लगी. कोशिश करती मेरे सामने उनको कोई चीज़ या किसी बात पे झुकना न पड़े... सामने से जिससे उनकी चूचियाँ और क्लीवेज न दिखें और पीछे से भी ताकि उनकी गाँड प्रदर्शित न हो जाए.
और तो और, अब तो शायद मेरे इस घर में होने से फिर से अनकम्फर्टेबल फील करने लगी. जो भी थोड़ा - बहुत मेरे प्रति उनके हृदय में कोमल भावना जागने लगी थी; वो शायद अब धीरे - धीरे गायब होना शुरू हो गई.
ये सब हुआ उन गाँडूओं के कारण.
कुछ महीनों बाद ही मेरा ग्रेजुएशन का फाइनल एग्जाम है... साथ ही इधर कुछ समय पहले अलग - अलग इंस्टिट्यूट में स्किल डेवलपमेंट और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी भी शुरू कर दिया था मैंने. चाचा ने पहले ही घोषणा कर दिया था कि मैं नौकरी के लिए प्रयास उन्हीं के यहाँ रहते हुए करूँगा. मम्मी-पापा ने पहले तो नाजुक-सी आपत्ति की थी, पर बाद में मान भी गए. इसका मतलब ये हुआ की अब सिर्फ पढ़ाई पूरी करने तक नहीं, बल्कि नौकरी नहीं लगने तक मुझे चाचा - चाची के साथ रहना है.
पर उस दिन के बाद से चाची जी का बदला हुआ व्यवहार कहीं मेरे सपने पर पानी न फेर दे!
जारी है....
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इसके बाद के कई दिन बिना किसी झंझट के बीते.
कहते हैं कभी-कभी परेशानियाँ अपना समाधान करवाए बिना पीछा नहीं छोड़तीं.
ऐसा हमारे साथ भी हुआ.
एक दिन फिर उन्हीं लड़कों के साथ चाचा का सामना हो गया… उसी जगह पर... जहाँ पहली बार हुआ था. इस बार भी पार्किंग को ले कर हुआ. और इस बार मामला वाकई में पार्किंग को लेकर ही था. लड़कों की संख्या भी इस बार पहले के मुकाबले अधिक थी. कुल 6 जन थे. शुरूवात मामूली बकझक से हुई जोकि धीरे - धीरे बहुत सीरियस होती चली गई.
हाथ चलने में अब 2-3 मिनट की देरी थी...
और सबसे टेंशन वाली बात तो ये कि इस बार चाची भी साथ में थी. ऊपर से संयोगवश आज उनका ड्रेस (साड़ी) भी कुछ यूँ चटकदार है जिसे देख कर किसी का भी दिल बहक जाए. हुआ भी वही... उन लड़कों ने उनके साथ भी बहुत बदतमीज़ी की.
भीड़ इक्क्ठा हो गई...
कोई चाचा से सहमत,
तो कोई उन लड़कों को शांत करने में व्यस्त.
जो नहीं हो रहा था वो ये की उस भीड़ में से किसी के भी गाँड में इतना दम नहीं था की वो सीधे, एक बार के लिए ही सही, उन लड़कों को गलत कहता या उनके बर्ताव का विरोध करता... गलत का विरोध हमेशा होना चाहिए, जो कि यहाँ नहीं हुआ. वैसे भी आजकल लोग दूसरों के फटे में जल्दी टाँग नहीं अड़ाते. कम से कम यहाँ गिनती के कुछ लोग तो हैं जो बीच-बचाव के लिए आए हैं.
संयोग से मैं अपने दोस्तों के साथ पास ही के एक दुकान के पीछे सिगरेट पी रहा था. आजकल रोड रेज, पार्किंग इश्यू, ईगो क्लैश इत्यादि लगे ही रहते हैं इसलिए पहले ध्यान नहीं दिया, पर जब बहुत हो-हल्ला होने लगा तो अपनी जगह से उठ कर सड़क के पास आ कर देखा की अच्छी - खासी भीड़ हो रखी है और कुछ लोगों में बहुत बहस हो रही है. तुरंत ही चाचाजी का आवाज़ सुनाई दिया —- पास जाकर देखा तो उन लौंडे - लपाटों को देखते ही दिमाग भयानक गरम हो गया. पता नहीं एकदम से मुझे क्या हो गया जो मैं दौड़कर गया और बिना किसी को कोई मौका दिए उन लड़कों से अकेले भीड़ गया. अकेले ही सबको बहुत बुरी तरह से मारने-पीटने लगा. वे लड़के संख्या में अधिक थे और मुझे बड़े आराम से धो सकते थें लेकिन ऐसा कर न पाए क्योंकि तब तक मेरे ग्रुप से दो लड़के जो मेरी ही तरह हट्टे - कट्टे हैं, आ कर उन लड़कों से लड़ पड़े. थोड़ी देर तक अच्छी मारधाड़ चली. उस दिन वाले लड़के को जिसे मुक्के से बेहोश किया था, वह डायरेक्ट मुझसे लड़ने से बच रहा था लेकिन जल्द ही मेरे हाथ लग गया और फिर उसे तो सबसे ज़्यादा बहुत बुरी तरह मारा. हालाँकि थोड़ी मार मुझे भी लगी लेकिन उस समय गुस्सा इतना था दिमाग में की मार लगने के दर्द को बड़े आराम से सह गया.
इतनी देर में सिक्युरिटी आ गई.
किसी ने खबर कर दिया था...
हम सबको थाने ले गईं. ऐसे मामलों में जो भी संबंधित जाँच और फॉर्मलिटी होती है, वो सब की गई. पर सबको नहीं. जिन दो लड़कों ने विवाद खड़ा किया था उन्हें एक रात हवालात में बंद किया गया और बाकी को सख्त वॉर्निंग के साथ जाने दिया.
मैंने बाद में अपने सभी दोस्तों को धन्यवाद किया, खास कर उन दोनों को जिन्होंने लड़ाई में मेरा साथ दिया था.
उस दिन मेरी दिलेरी देख कर चाचा-चाची को बहुत गर्व हुआ था. ये बात उन दोनों के चेहरों से स्पष्ट पता चला था — और चाची तो मानो ख़ास इंप्रेस्ड हुई जान पड़ रही थी. उस दिन के बाद मेरे साथ बात करने का ढंग बहुत बदल गया उनका. अब जब भी बात करना होता, एक हल्की मुस्कुराहट के साथ करती. खास ध्यान रखती की मेरे पढ़ाई के समय बच्चे मेरे कमरे में न जाएँ. मोबाइल, टीवी की आवाज़ धीमी रखतीं. स्पेशल ध्यान दे कर खास मेरे लिए मेरी पसंद की डिश बनाती. पहले रात में जल्दी सोना पड़ता था; ज़्यादा देर तक लाइट ऑन रहना पसंद नहीं था. लेकिन अब चाचाजी ने फुल छूट दे दिया था. जितनी देर जागना चाहूँ, जब सोना चाहूँ --- मेरी मर्ज़ी.
एक साँझ 6:00 -- 6:15 बजे की बात है...
मैं बच्चों को उनके होमवर्क में हेल्प कर रहा था… और चाची बगल के सोफे पर बैठी मोबाइल में व्यस्त थी.
तभी चाचा जी एकदम से अंदर आएँ --- ऑफिस से तुरंत लौटे ही थें... बड़े खुश दिख रहे थे. चाची ने पूछा की आखिर बात क्या है? तब चाचा जी ने कहा,
"पता है आज क्या हुआ?"
"बताइयेगा नहीं तो कैसे पता होगा हमें?" चाची भौंहें सिकोड़ते हुए बोली.
चाचा मुस्कुराकर बोले,
"आज वही लड़के मिले थे!"
"हे भगवान! फिर से..?"
"हम्म."
"कुछ कहा या किया क्या उन लड़कों ने?"
"नहीं...!"
"नहीं?!!"
"हम्म, न कुछ कहा और न कुछ किया."
"पक्का...??!"
"अरे हाँ भई, एकदम पक्का."
अब मैंने सवाल किया,
"कहाँ मिले?"
"जहाँ पहली बार तुम्हारे साथ पंगा हुआ था!"
"ओह! वही मिठाई दुकान पे."
"यस."
"उस दिन की तरह आज भी वो दो ही थे या ज़्यादा?"
"वही दोनों लड़के थे. दुकान के पास ही खड़े थे. जैसे ही मैं आया और बाइक साइड में लगाने लगा; वो दोनों धीरे - धीरे वहाँ से दूर हो गए."
"दूर हो गए मतलब? वहाँ से चले गए या…?"
"उस दुकान से अगले ३ दुकान छोड़कर खड़े हो गए थे."
"ये आपने कब देखा?"
"जब मिठाई लेकर निकल रहा था तब..."
"ओके."
चाची हैरत से हम दोनों चाचा-भतीजे के बीच की बातें सुन रही थीं. सुनते हुए कभी मुझे और कभी चाचाजी को देख रही थीं. जैसे ही हम दोनों के बीच एक पॉज आया, तुरंत बोल पड़ी,
"एक मिनट, एक मिनट, 'पहली बार से पंगा हुआ था' से क्या मतलब आपका?"
चाचाजी मुस्कराए,
एक बार मेरी तरफ और फिर चाची को देखा... और फिर बड़े शांत भाव से चाची को सब कुछ कह सुनाया. उस दिन की घटना बताते हुए इस बात का खास ज़िक्र किया कि कैसे मैंने एक लड़के को एक ही मुक्के से बेहोश कर दिया था. सब सुनते हुए चाची को बिल्कुल भी यकीन नहीं हो रहा था पर चाचाजी ने अभी तक की मैरिड लाइफ में चाची से ना के बराबर झूठ बोला है और साथ ही ये सब कहते समय खुशी और गर्व से चमकती चाचाजी की आँखें खुद ही इस कहानी की गवाही दे रही थीं.
चाचाजी अपनी जगह से उठकर आए और मेरी पीठ थपथपा कर शाबाशी दी और अचानक से ऐसी बात बोल दी जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी.
चाचाजी की खुशी को देखकर चाची भी काफी ख़ुश हो गई. उन्होंने भी मुझे मुस्कुरा कर देखा.
चाचाजी अपनी जगह से उठकर आए और मेरी पीठ थपथपा कर शाबाशी दी और अचानक से ऐसी बात बोल दी जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी.
"ये मेरा सिर्फ भतीजा नहीं है, बल्कि उससे भी बढ़ कर है..."
कह कर वो थोड़ा रूके, मैं उन्हें ही देख रहा...
चाची की नज़र हम दोनों पर थी.
चाचाजी ने सेकंड भर चाची को देखा, फिर मेरी आँखों में देखते हुए एक बड़ी -सी स्माइल लिए बोले,
"ही इज़ दी मैन ऑफ़ दिस हाउस…!!"
पहले तो मैं समझा नहीं, क्योंकि उन्होंने अचानक से अंग्रेज़ी में कहा था. पर जैसे ही समझा, मेरी तो घोर आश्चर्य से आँखें बड़ी-बड़ी हो गयीं. चाची की भी यही स्थिति थी.
'मुझे मैन ऑफ द हाउस का खिताब दे दिया!'
मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ…
और चाची तो जैसे शॉक में बिल्कुल स्थिर हो चाचाजी को देखे जा रही थी.
'भला खुद (चाचा जी) के रहते अपने ही मुँह से अपने भतीजे को मैन ऑफ द हाउस कैसे कह सकते हैं ये?!'
हम दोनों ने अति अविश्वास से पहले तो चाचा जी को देखा और फिर एक-दूसरे को. मुझे समझ में नहीं आया की क्या प्रतिक्रिया दूँ इसलिए थोड़ा नर्वसा कर ‘हे हे’ कर के हँस कर वहाँ से चला गया.
मुझे नर्वस देखकर चाची मुस्कुराए बिना नहीं रह पाई; पर वो तब भी हैरान थी.
जारी है....
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