27-08-2026, 09:34 AM
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रात का अँधेरा कमरे में घना था। खिड़की से बाहर बारिश की बूँदें छत पर गिर रही थीं, मानो प्रकृति भी किसी छुपे हुए रहस्य को फुसफुसा रही हो। कमरे में केवल एक दीपक जल रहा था। उसकी मंद रोशनी में आरव बैठा था। उसकी साँसें भारी थीं। वह अपने हाथों में एक पुरानी डायरी थामे हुए था—वही डायरी जिसमें मीरा की लिखावट अब भी जीवित थी।
मीरा अब इस संसार में नहीं थी। तीन वर्ष पहले एक दुर्घटना ने उसे छीन लिया था। पर उसकी यादें आरव के अंदर जिंदा थीं। डायरी के पन्ने पलटते हुए उसकी उँगलियाँ एक जगह रुकीं। वहाँ मीरा ने लिखा था—
“अगर कभी तुम अकेले पड़ जाओ, तो याद रखना… मेरा शरीर तुम्हारे लिए हमेशा तैयार रहेगा। चाहे सपने में ही सही।”
आरव की आँखें बंद हो गईं। अचानक कमरे में हवा बदल गई। दीपक की लौ हिली। और धीरे-धीरे एक परिचित सुगंध फैली—चमेली और उसके शरीर की वह खास खुशबू जो केवल मीरा की थी।
“आरव…” आवाज़ बहुत हल्की थी, पर बिलकुल साफ।
उसने आँखें खोलीं। बिस्तर के किनारे खड़ी थी मीरा। सफेद साड़ी में। बाल खुले। आँखों में वही गहराई जो कभी उसे बेचैन कर दिया करती थी। वह असली लग रही थी—साँस लेती हुई, गर्म, जिंदा।
आरव उठा। उसके कदम लड़खड़ाए। “तुम… तुम कैसे?”
मीरा मुस्कुराई नहीं। उसने केवल अपना हाथ बढ़ाया। आरव का हाथ उसके हाथ में चला गया। त्वचा गर्म थी। नब्ज धड़क रही थी। यह कोई छाया नहीं थी।
“मैं तुम्हारी चाहत से बनी हूँ,” उसने फुसफुसाया। “तुम्हारे अंदर जो आग जल रही है, वही मुझे यहाँ लाई है।”
आरव ने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया। साड़ी का पल्लू खिसका। उसके स्तन उसके सीने से सटे। आरव के होंठ उसके गले पर टिक गए। उसने चूसा। मीरा की साँस तेज़ हो गई। उसकी कमर अंदर की ओर मुड़ी।
“और धीरे…” उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में मनाही नहीं थी।
आरव ने साड़ी का पल्लू पूरी तरह हटा दिया। उसके नंगे कंधे दीपक की रोशनी में चमक रहे थे। उसने उसके स्तनों को दोनों हाथों से थामा। निप्पल कठोर हो चुके थे। उसने एक को मुँह में लिया और जीभ घुमाई। मीरा की उँगलियाँ उसके बालों में घुस गईं। उसने आरव के सिर को और अंदर दबाया।
“हाँ… वहीं…” उसकी आवाज़ टूट रही थी।
आरव ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। साड़ी को पूरी तरह खोल दिया। उसके पैरों के बीच उसकी उँगलियाँ घुसीं। वह पहले से गीली थी। आरव ने दो उँगलियाँ अंदर डालीं। मीरा की कमर उठी। उसने आरव की कलाई पकड़ ली।
“और अंदर… पूरी तरह…”
आरव ने उँगलियाँ तेज़ी से हिलाईं। साथ ही उसके मुँह को चूसता रहा। मीरा का शरीर काँप रहा था। अचानक उसने आरव को अपने ऊपर खींच लिया।
“अब… अब अंदर आओ।”
आरव ने अपना लंड बाहर निकाला। वह पूरी तरह तना हुआ था। उसने मीरा के पैरों को फैलाया और धीरे-धीरे अंदर धकेला। मीरा की आँखें बंद हो गईं। उसकी साँस रुकी। आरव पूरा अंदर तक गया। दोनों एक पल के लिए रुके।
फिर आरव ने हिलना शुरू किया। पहले धीरे। फिर तेज़। हर धक्के के साथ मीरा की आवाज़ निकल रही थी—धीमी, गहरी, अधूरी।
“और तेज़… आरव… मुझे तोड़ दो…”
आरव ने उसके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। अब हर धक्का गहरा था। मीरा के स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। आरव ने एक स्तन को मुँह में लिया और दाँत से हल्का काटा। मीरा चीखी। उसकी योनि ने आरव के लंड को और कस लिया।
बारिश बाहर और तेज़ हो गई थी। कमरे में केवल उनके शरीर की आवाज़ें गूँज रही थीं—माँस की थपथपाहट, साँसों की आवाज़, और मीरा की दबी हुई चीखें।
आरव ने अचानक उसे पलटा। मीरा घुटनों के बल हो गई। आरव ने पीछे से प्रवेश किया। एक हाथ उसके बालों में था, दूसरा उसके स्तन को मसल रहा था। हर धक्के के साथ मीरा आगे झुक रही थी।
“मैं आ रही हूँ…” उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
आरव ने गति बढ़ा दी। मीरा का शरीर अकड़ गया। उसकी योनि ने आरव को जकड़ लिया। वह काँपते हुए चरम पर पहुँची। आरव भी रुक नहीं पाया। उसने उसके अंदर ही अपना वीर्य छोड़ दिया। गर्म लहरें अंदर फैल गईं।
दोनों गिर पड़े। साँसें भारी थीं। आरव ने मीरा को अपनी छाती से लगा लिया। उसकी उँगलियाँ उसके बालों में घूम रही थीं।
मीरा ने धीरे से कहा, “यह केवल शुरुआत है… तुम्हारी चाहत जब भी बुलाएगी, मैं आऊँगी। पर हर बार कुछ छूट जाएगा… कुछ अधूरा रहेगा।”
आरव ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में एक सवाल था जो उसने अभी पूछा नहीं था।
मीरा की उँगलियाँ उसके सीने पर रुक गईं। “कल रात… जब तुम फिर बुलाओगे… तो मैं तुम्हें वह बताऊँगी जो डायरी में नहीं लिखा।”
दीपक की लौ एक बार फिर हिली। और मीरा की आकृति धीरे-धीरे धुँधली पड़ने लगी।
आरव का हाथ खाली रह गया।
पर कमरे में अब भी उसकी खुशबू बाकी थी। और आरव के लंड में फिर से तनाव लौट आया था—क्योंकि वह जानता था कि यह अंत नहीं है।
सुबह की धूप कमरे में घुस आई थी, पर आरव की आँखों में अभी भी रात की घटना घूम रही थी। बिस्तर पर पड़ी सफेद चादर में मीरा की खुशबू बाकी थी। उसने डायरी बंद की और उठा। शरीर में एक अजीब सी हलचल थी—जैसे कोई अधूरी प्यास अभी भी उसके अंदर धधक रही हो।
उसने स्नान किया, कपड़े बदले और नीचे रसोई की ओर बढ़ा। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। धीमी, पर साफ।
आरव ने दरवाजा खोला। सामने खड़ी थी प्रिया—पड़ोस की वह महिला जिसके पति पिछले छह महीने से विदेश में थे। प्रिया की उम्र लगभग बत्तीस वर्ष थी। उसका चेहरा अंडाकार था, माथा चौड़ा और साफ। बड़ी-बड़ी काली आँखें जिनमें एक शांत थकान बसती थी। होंठ पूर्ण और गुलाबी। गर्दन लंबी और चिकनी। आज उसने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी। साड़ी का पल्लू उसके बाएँ कंधे पर से सरक कर आधा स्तन ढँक रहा था। उसके स्तन गोल और भारी थे, साड़ी के कपड़े के नीचे उनकी गोलाई स्पष्ट झलक रही थी। कमर पतली थी, और उससे नीचे कूल्हे चौड़े तथा गोल। साड़ी का घाघरा उसकी जाँघों की गोलाई को और निखार रहा था। बाल खुले थे, काले और घने, जो उसकी पीठ तक पहुँच रहे थे।
“आरव जी, सुबह-सुबह दस्तक दे रही हूँ… माफ़ कीजिएगा,” प्रिया ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में एक संकोच था। “कल रात बहुत तेज़ बारिश हुई थी। आपके घर की बत्ती देर तक जलती दिखी। सोचा, सब ठीक तो है?”
आरव ने सिर हिलाया। “हाँ… सब ठीक है। अंदर आइए।”
प्रिया अंदर आई। उसके पैरों की पायल की हल्की आवाज़ फर्श पर गूँजी। आरव ने उसे सोफे की ओर इशारा किया। प्रिया बैठी तो साड़ी का पल्लू थोड़ा और खिसक गया। उसके गले में एक पतली सोने की चेन थी, जो उसके क्लीवेज की गहराई तक जाती थी। आरव की निगाह वहाँ से हटने में थोड़ी देर लगाई।
प्रिया ने चाय बनाने की पेशकश की। रसोई में खड़ी होकर उसने चाय की पत्तियाँ चायदान में डालीं। उसकी बाँहें साड़ी की आस्तीन से बाहर थीं—गोरी, चिकनी, और कलाई पर पतली चूड़ियाँ। जब वह चाय उबाल रही थी, तो उसकी कमर हल्के-हल्के हिल रही थी। आरव दरवाजे के पास खड़ा रहा। उसके मन में मीरा की अंतिम बातें घूम रही थीं—“कल रात… जब तुम फिर बुलाओगे…”
चाय तैयार हुई। दोनों बैठे। प्रिया ने धीरे से पूछा, “आप अकेले कैसे रह लेते हैं इतने दिन? मेरा तो पति दूर है, पर मैं तो रोज़ व्यस्त रहती हूँ। आपका तो…”
आरव ने उत्तर दिया, “आदत पड़ गई है।” उसकी आवाज़ में एक भारीपन था।
प्रिया चुप रही। फिर उसने अपना पल्लू ठीक किया। उसके स्तनों की हलचल साड़ी के नीचे साफ दिखी। आरव की साँस थोड़ी तेज़ हो गई। वह जानता था कि यह प्रतिक्रिया मीरा की याद से जुड़ी है। प्रिया की उपस्थिति उसकी अधूरी चाहत को और उत्तेजित कर रही थी।
बातचीत सामान्य रही—पड़ोस के साझा मुद्दे, बारिश से हुए नुकसान, और प्रिया के पति के लौटने की संभावना। पर हर वाक्य के बीच एक चुप्पी थी जो दोनों महसूस कर रहे थे। प्रिया की निगाहें कभी-कभी आरव के चेहरे पर ठहर जातीं। आरव की निगाहें उसके गले और क्लीवेज से ऊपर उठने में संघर्ष कर रही थीं।
अचानक प्रिया ने कहा, “कल रात मुझे भी नींद नहीं आई। लगा जैसे कोई घर के आसपास घूम रहा हो।” उसकी आवाज़ में एक हल्की सी आशंका थी।
आरव की उँगलियाँ चाय के कप पर अकड़ गईं। क्या प्रिया ने भी कुछ महसूस किया था?
प्रिया उठी। “मुझे जाना चाहिए। दोपहर का खाना बनाना है।” वह दरवाजे की ओर बढ़ी। साड़ी का घाघरा उसकी जाँघों से रगड़ खा रहा था। आरव भी उठा। दरवाजे पर दोनों रुक गए। प्रिया ने सिर घुमाया। उसकी आँखों में एक अनकहा प्रश्न था।
आरव ने धीरे से कहा, “अगर कभी… बात करने का मन हो, तो आ जाना।”
प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी साँस थोड़ी भारी लग रही थी। वह चली गई।
आरव ने दरवाजा बंद किया। कमरे में फिर वही खुशबू फैली—चमेली की। दीवार के पास खड़ी थी मीरा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
“तुमने उसे देखा,” मीरा ने फुसफुसाया। “उसका शरीर… तुम्हें याद दिलाता है ना?”
आरव ने उत्तर नहीं दिया। मीरा पास आई। उसने आरव का हाथ अपने स्तन पर रखा। “प्रिया की तरह गोल और भारी… पर मेरा तुम्हारा है।”
आरव की उँगलियाँ अपने आप दब गईं। मीरा की साँस तेज़ हो गई। उसने आरव को दीवार से सटाया और उसके होंठों को चूस लिया। इस बार संभोग लंबा नहीं था। मीरा ने आरव के लंड को बाहर निकाला, घुटनों के बल बैठी और उसे अपने मुँह में ले लिया। उसकी जीभ और होंठ आरव को पागल कर रहे थे। आरव ने उसके बाल पकड़े और गति नियंत्रित की। कुछ ही क्षणों में उसने मीरा के मुँह में अपना वीर्य छोड़ दिया। मीरा ने सब निगल लिया, फिर उठी और आरव के कान में कहा—
“प्रिया कल फिर आएगी। तुम तय करना… उसे छूना है या नहीं। पर याद रखना—हर बार जब तुम किसी और को छुओगे, मैं और पास आऊँगी… और कुछ छुपा हुआ बताऊँगी।”
मीरा की आकृति फिर धुँधली पड़ने लगी। आरव अकेला रह गया। उसके मन में प्रिया की गोलाई, उसकी पतली कमर और मीरा का वादा एक साथ घूम रहे थे।
शाम अभी बाकी थी। और कल की मुलाकात का तनाव उसके शरीर में पहले से ही उतर चुका था।
दोपहर ढल चुकी थी। आसमान में बादल घिर आए थे। आरव बालकनी में खड़ा था। उसके हाथ में मीरा की डायरी थी, पर वह पन्ने नहीं पलट रहा था। मन प्रिया की सुबह की मुलाकात और मीरा के अंतिम शब्दों के बीच झूल रहा था।
तभी गेट की घंटी बजी।
आरव ने दरवाजा खोला। प्रिया फिर खड़ी थी। आज उसने गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी थी। साड़ी का कपड़ा पतला था। उसके स्तनों की गोलाई और निप्पलों की हल्की उभार साफ झलक रही थी। कमर इतनी पतली थी कि साड़ी की पल्लू की गाँठ वहाँ और निखर रही थी। कूल्हे चौड़े और गोल थे। जब वह चली तो घाघरे के नीचे जाँघों की लचक साफ महसूस होती थी। बाल आज बाँधे हुए थे, पर कुछ ज़ुल्फें माथे पर बिखरी थीं। गर्दन पर पसीने की एक पतली रेखा चमक रही थी।
“आरव जी, बिजली चली गई है मेरे घर में,” प्रिया ने कहा। आवाज़ में थकान थी। “पंखे बंद हैं। बहुत उमस हो रही है। अगर आपत्ति न हो तो थोड़ी देर यहाँ बैठ जाऊँ?”
आरव ने सिर हिलाया। प्रिया अंदर आई। सोफे पर बैठते हुए उसकी साड़ी का पल्लू एक बार फिर सरक गया। इस बार आधा स्तन लगभग उघड़ गया। उसने जल्दी से ठीक किया, पर आरव की निगाह वहाँ से हटने में देर लगाई।
कमरे में पंखा चल रहा था। प्रिया ने आँखें बंद कर लीं। कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा, “पति जब दूर होते हैं तो रातें बहुत लंबी लगती हैं। शरीर की जरूरतें… मन की जरूरतें… दोनों अधूरी रह जाती हैं।”
आरव चुप रहा। प्रिया की बातों में एक ईमानदारी थी जो उसे छू गई।
बारिश शुरू हो गई। बूँदें तेज़ी से गिरने लगीं। बिजली गिरी। कमरे की बत्ती एक क्षण के लिए मद्धम पड़ी। उसी क्षण आरव को मीरा की खुशबू महसूस हुई। वह कहीं पास थी।
प्रिया उठी और खिड़की के पास गई। बारिश देखती हुई बोली, “आज तो देर हो जाएगी। घर लौटना मुश्किल लगेगा।”
आरव उसके पास पहुँचा। दोनों खिड़की के किनारे खड़े थे। प्रिया का कंधा उसके बाजू से छू गया। त्वचा गर्म थी। प्रिया ने सिर घुमाया। उनकी आँखें मिलीं। उस एक निगाह में अकेलापन, चाहत और हिचकिचाहट तीनों थे।
आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया। प्रिया ने नहीं हटाया। बल्कि उसकी उँगलियाँ आरव की उँगलियों में फँस गईं।
“क्या हम गलत कर रहे हैं?” प्रिया की आवाज़ काँप रही थी।
आरव ने उत्तर के बजाय उसे अपनी ओर खींच लिया। होंठ होंठ से मिल गए। पहला चुंबन संकोच भरा था। दूसरा भूखा। प्रिया की साँस तेज़ हो गई। आरव का हाथ उसकी कमर पर था। उसने साड़ी का पल्लू हटाया। स्तन उसके हाथ में आ गए—नरम, भारी, और गर्म। निप्पल पहले से कठोर थे। आरव ने एक को मुँह में लिया। प्रिया की कमर अंदर की ओर मुड़ गई। उसकी उँगलियाँ आरव के बालों में घुस गईं।
“और… धीरे नहीं,” उसने फुसफुसाया।
आरव ने उसे सोफे पर लिटा दिया। साड़ी का घाघरा ऊपर उठाया। उसके अंदर कोई अंडरवियर नहीं था। योनि पहले से गीली थी। आरव ने उँगलियाँ अंदर डालीं। प्रिया की जाँघें काँप उठीं। उसने आरव के लंड को बाहर निकाला और अपने हाथ से सहलाया।
फिर आरव ने प्रवेश किया। प्रिया की आँखें बंद हो गईं। हर धक्के के साथ उसकी आवाज़ निकल रही थी—दबी हुई, पर साफ। आरव ने उसके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। गति तेज़ हो गई। प्रिया के स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। अचानक उसने आरव को कस लिया। शरीर अकड़ गया। वह चरम पर पहुँची। आरव भी उसके अंदर ही बिखर गया।
दोनों कुछ देर वैसे ही पड़े रहे। साँसें भारी थीं।
तभी कमरे के कोने में मीरा दिखाई दी। उसकी आँखों में नाराज़गी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसने केवल इतना कहा—
“अब तुमने उसे छू लिया। इसलिए मैं और पास आ गई हूँ। कल रात… तुम्हें वह सच बताऊँगी जो डायरी में कभी लिखा ही नहीं गया। वह सच… प्रिया से भी जुड़ा है।”
मीरा की आकृति गायब हो गई।
प्रिया अभी भी आरव की छाती पर सिर रखे लेटी थी। उसे कुछ पता नहीं था। पर आरव की धड़कन तेज़ हो चुकी थी।
बारिश अभी थमी नहीं थी। और कल की रात अब पहले से कहीं अधिक भारी लग रही थी।
रात गहर चुकी थी। बारिश थम चुकी थी, पर हवा में नमी बाकी थी। प्रिया जा चुकी थी। उसके जाने के बाद कमरे में चुप्पी फैल गई थी। आरव बिस्तर पर बैठा था। शरीर पर प्रिया का स्पर्श अभी भी महसूस हो रहा था, पर मन मीरा के अंतिम वाक्य पर अटका हुआ था—“वह सच… प्रिया से भी जुड़ा है।”
दीपक की लौ एक बार फिर हिली। चमेली की खुशबू फैली। मीरा बिस्तर के किनारे खड़ी थी। इस बार उसकी साड़ी सफेद नहीं, हल्के लाल रंग की थी। कपड़ा पतला था। उसके स्तनों की गोलाई और निप्पलों की कठोरता साफ झलक रही थी। कमर पतली, कूल्हे गोल और जाँघें चिकनी। बाल खुले थे, जो उसकी पीठ तक बह रहे थे।
“तुमने उसे छू लिया,” मीरा ने धीरे से कहा। आवाज़ में न कोई आरोप था, न जलन। केवल एक गहराई थी। “अब मैं तुम्हारे और पास हूँ। इसलिए वह बात बता सकती हूँ जो डायरी में कभी नहीं लिखी।”
आरव ने सिर उठाया। उसकी निगाहें मीरा के चेहरे पर टिकी थीं।
मीरा पास आई। बिस्तर पर बैठ गई। उसकी जाँघ आरव की जाँघ से छू गई। त्वचा गर्म थी। उसने आरव का हाथ अपने घुटने पर रखा और बोली—
“प्रिया… केवल पड़ोसन नहीं है। तीन वर्ष पहले, जब मेरी दुर्घटना हुई थी, उस रात प्रिया भी वहाँ मौजूद थी। वह मेरी सहेली थी। कॉलेज के दिनों से। हम दोनों ने कई रातें एक साथ बिताई थीं—तुम्हारे आने से पहले। उसके शरीर का हर कोना मुझे पता था, और मेरा उसे।”
आरव की साँस थम गई। उसने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने आगे कहा, “दुर्घटना के समय प्रिया मेरे साथ कार में थी। वह बच गई। मैं नहीं बची। पर उसने तुम्हें कभी नहीं बताया। डर थी कि तुम उसे दोष दोगे। इसलिए वह चुप रही। और अब… जब तुम अकेले हो, वह तुम्हारे पास इसलिए आ रही है क्योंकि उसे भी वही अकेलापन है जो मुझे तुम्हारे बिना था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। आरव की उँगलियाँ मीरा की जाँघ पर दब गईं। मीरा ने उसका हाथ अपने स्तन तक ले गई। निप्पल कठोर था।
“अब तुम जान गए हो,” मीरा ने फुसफुसाया। “प्रिया के अंदर मेरी यादें भी बसती हैं। जब तुम उसे छूते हो, तो कुछ अंश मुझ तक भी पहुँचता है। इसलिए… कल जब वह फिर आए, तो उसे पूरी तरह अपना लो। मैं पास रहूँगी।”
आरव ने मीरा को अपनी ओर खींच लिया। इस बार संभोग में जल्दबाजी नहीं थी। उसने मीरा को धीरे-धीरे नंगा किया। उसके स्तनों को चूसा, पेट पर होंठ फिराए, फिर जाँघों के बीच जीभ ले गया। मीरा की कमर उठी। उसकी उँगलियाँ चादर को जकड़ रही थीं। जब आरव ने प्रवेश किया, तो दोनों की आँखें मिलीं। हर धक्का गहरा था, पर जल्दबाजी से खाली। मीरा ने आरव के कान में केवल इतना कहा—
“प्रिया को बताना… कि मैंने सब कह दिया। फिर देखना, वह क्या करती है।”
चरमावस्था के बाद मीरा की आकृति फिर धुँधली पड़ने लगी। गायब होने से पहले उसने एक अंतिम बात कही—
“कल सुबह प्रिया खुद आएगी। और इस बार वह अकेली नहीं होगी। उसके साथ… एक और औरत होगी। वह औरत… तुम्हारी जिंदगी का अगला मोड़ है।”
आरव अकेला रह गया। खिड़की के बाहर रात अभी बाकी थी। पर उसके मन में अब दो चेहरे घूम रहे थे—प्रिया का, और वह अज्ञात चेहरा जो कल आने वाला था।
सुबह की पहली किरण अभी दूर थी। और उसके साथ एक नया रहस्य भी।
[/img]मृत पत्नी की आत्मा और भाभी के गीले होंठ
रात का अँधेरा कमरे में घना था। खिड़की से बाहर बारिश की बूँदें छत पर गिर रही थीं, मानो प्रकृति भी किसी छुपे हुए रहस्य को फुसफुसा रही हो। कमरे में केवल एक दीपक जल रहा था। उसकी मंद रोशनी में आरव बैठा था। उसकी साँसें भारी थीं। वह अपने हाथों में एक पुरानी डायरी थामे हुए था—वही डायरी जिसमें मीरा की लिखावट अब भी जीवित थी।
मीरा अब इस संसार में नहीं थी। तीन वर्ष पहले एक दुर्घटना ने उसे छीन लिया था। पर उसकी यादें आरव के अंदर जिंदा थीं। डायरी के पन्ने पलटते हुए उसकी उँगलियाँ एक जगह रुकीं। वहाँ मीरा ने लिखा था—
“अगर कभी तुम अकेले पड़ जाओ, तो याद रखना… मेरा शरीर तुम्हारे लिए हमेशा तैयार रहेगा। चाहे सपने में ही सही।”
आरव की आँखें बंद हो गईं। अचानक कमरे में हवा बदल गई। दीपक की लौ हिली। और धीरे-धीरे एक परिचित सुगंध फैली—चमेली और उसके शरीर की वह खास खुशबू जो केवल मीरा की थी।
“आरव…” आवाज़ बहुत हल्की थी, पर बिलकुल साफ।
उसने आँखें खोलीं। बिस्तर के किनारे खड़ी थी मीरा। सफेद साड़ी में। बाल खुले। आँखों में वही गहराई जो कभी उसे बेचैन कर दिया करती थी। वह असली लग रही थी—साँस लेती हुई, गर्म, जिंदा।
आरव उठा। उसके कदम लड़खड़ाए। “तुम… तुम कैसे?”
मीरा मुस्कुराई नहीं। उसने केवल अपना हाथ बढ़ाया। आरव का हाथ उसके हाथ में चला गया। त्वचा गर्म थी। नब्ज धड़क रही थी। यह कोई छाया नहीं थी।
“मैं तुम्हारी चाहत से बनी हूँ,” उसने फुसफुसाया। “तुम्हारे अंदर जो आग जल रही है, वही मुझे यहाँ लाई है।”
आरव ने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया। साड़ी का पल्लू खिसका। उसके स्तन उसके सीने से सटे। आरव के होंठ उसके गले पर टिक गए। उसने चूसा। मीरा की साँस तेज़ हो गई। उसकी कमर अंदर की ओर मुड़ी।
“और धीरे…” उसने कहा, पर उसकी आवाज़ में मनाही नहीं थी।
आरव ने साड़ी का पल्लू पूरी तरह हटा दिया। उसके नंगे कंधे दीपक की रोशनी में चमक रहे थे। उसने उसके स्तनों को दोनों हाथों से थामा। निप्पल कठोर हो चुके थे। उसने एक को मुँह में लिया और जीभ घुमाई। मीरा की उँगलियाँ उसके बालों में घुस गईं। उसने आरव के सिर को और अंदर दबाया।
“हाँ… वहीं…” उसकी आवाज़ टूट रही थी।
आरव ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। साड़ी को पूरी तरह खोल दिया। उसके पैरों के बीच उसकी उँगलियाँ घुसीं। वह पहले से गीली थी। आरव ने दो उँगलियाँ अंदर डालीं। मीरा की कमर उठी। उसने आरव की कलाई पकड़ ली।
“और अंदर… पूरी तरह…”
आरव ने उँगलियाँ तेज़ी से हिलाईं। साथ ही उसके मुँह को चूसता रहा। मीरा का शरीर काँप रहा था। अचानक उसने आरव को अपने ऊपर खींच लिया।
“अब… अब अंदर आओ।”
आरव ने अपना लंड बाहर निकाला। वह पूरी तरह तना हुआ था। उसने मीरा के पैरों को फैलाया और धीरे-धीरे अंदर धकेला। मीरा की आँखें बंद हो गईं। उसकी साँस रुकी। आरव पूरा अंदर तक गया। दोनों एक पल के लिए रुके।
फिर आरव ने हिलना शुरू किया। पहले धीरे। फिर तेज़। हर धक्के के साथ मीरा की आवाज़ निकल रही थी—धीमी, गहरी, अधूरी।
“और तेज़… आरव… मुझे तोड़ दो…”
आरव ने उसके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। अब हर धक्का गहरा था। मीरा के स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। आरव ने एक स्तन को मुँह में लिया और दाँत से हल्का काटा। मीरा चीखी। उसकी योनि ने आरव के लंड को और कस लिया।
बारिश बाहर और तेज़ हो गई थी। कमरे में केवल उनके शरीर की आवाज़ें गूँज रही थीं—माँस की थपथपाहट, साँसों की आवाज़, और मीरा की दबी हुई चीखें।
आरव ने अचानक उसे पलटा। मीरा घुटनों के बल हो गई। आरव ने पीछे से प्रवेश किया। एक हाथ उसके बालों में था, दूसरा उसके स्तन को मसल रहा था। हर धक्के के साथ मीरा आगे झुक रही थी।
“मैं आ रही हूँ…” उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
आरव ने गति बढ़ा दी। मीरा का शरीर अकड़ गया। उसकी योनि ने आरव को जकड़ लिया। वह काँपते हुए चरम पर पहुँची। आरव भी रुक नहीं पाया। उसने उसके अंदर ही अपना वीर्य छोड़ दिया। गर्म लहरें अंदर फैल गईं।
दोनों गिर पड़े। साँसें भारी थीं। आरव ने मीरा को अपनी छाती से लगा लिया। उसकी उँगलियाँ उसके बालों में घूम रही थीं।
मीरा ने धीरे से कहा, “यह केवल शुरुआत है… तुम्हारी चाहत जब भी बुलाएगी, मैं आऊँगी। पर हर बार कुछ छूट जाएगा… कुछ अधूरा रहेगा।”
आरव ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में एक सवाल था जो उसने अभी पूछा नहीं था।
मीरा की उँगलियाँ उसके सीने पर रुक गईं। “कल रात… जब तुम फिर बुलाओगे… तो मैं तुम्हें वह बताऊँगी जो डायरी में नहीं लिखा।”
दीपक की लौ एक बार फिर हिली। और मीरा की आकृति धीरे-धीरे धुँधली पड़ने लगी।
आरव का हाथ खाली रह गया।
पर कमरे में अब भी उसकी खुशबू बाकी थी। और आरव के लंड में फिर से तनाव लौट आया था—क्योंकि वह जानता था कि यह अंत नहीं है।
सुबह की धूप कमरे में घुस आई थी, पर आरव की आँखों में अभी भी रात की घटना घूम रही थी। बिस्तर पर पड़ी सफेद चादर में मीरा की खुशबू बाकी थी। उसने डायरी बंद की और उठा। शरीर में एक अजीब सी हलचल थी—जैसे कोई अधूरी प्यास अभी भी उसके अंदर धधक रही हो।
उसने स्नान किया, कपड़े बदले और नीचे रसोई की ओर बढ़ा। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। धीमी, पर साफ।
आरव ने दरवाजा खोला। सामने खड़ी थी प्रिया—पड़ोस की वह महिला जिसके पति पिछले छह महीने से विदेश में थे। प्रिया की उम्र लगभग बत्तीस वर्ष थी। उसका चेहरा अंडाकार था, माथा चौड़ा और साफ। बड़ी-बड़ी काली आँखें जिनमें एक शांत थकान बसती थी। होंठ पूर्ण और गुलाबी। गर्दन लंबी और चिकनी। आज उसने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी। साड़ी का पल्लू उसके बाएँ कंधे पर से सरक कर आधा स्तन ढँक रहा था। उसके स्तन गोल और भारी थे, साड़ी के कपड़े के नीचे उनकी गोलाई स्पष्ट झलक रही थी। कमर पतली थी, और उससे नीचे कूल्हे चौड़े तथा गोल। साड़ी का घाघरा उसकी जाँघों की गोलाई को और निखार रहा था। बाल खुले थे, काले और घने, जो उसकी पीठ तक पहुँच रहे थे।
“आरव जी, सुबह-सुबह दस्तक दे रही हूँ… माफ़ कीजिएगा,” प्रिया ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में एक संकोच था। “कल रात बहुत तेज़ बारिश हुई थी। आपके घर की बत्ती देर तक जलती दिखी। सोचा, सब ठीक तो है?”
आरव ने सिर हिलाया। “हाँ… सब ठीक है। अंदर आइए।”
प्रिया अंदर आई। उसके पैरों की पायल की हल्की आवाज़ फर्श पर गूँजी। आरव ने उसे सोफे की ओर इशारा किया। प्रिया बैठी तो साड़ी का पल्लू थोड़ा और खिसक गया। उसके गले में एक पतली सोने की चेन थी, जो उसके क्लीवेज की गहराई तक जाती थी। आरव की निगाह वहाँ से हटने में थोड़ी देर लगाई।
प्रिया ने चाय बनाने की पेशकश की। रसोई में खड़ी होकर उसने चाय की पत्तियाँ चायदान में डालीं। उसकी बाँहें साड़ी की आस्तीन से बाहर थीं—गोरी, चिकनी, और कलाई पर पतली चूड़ियाँ। जब वह चाय उबाल रही थी, तो उसकी कमर हल्के-हल्के हिल रही थी। आरव दरवाजे के पास खड़ा रहा। उसके मन में मीरा की अंतिम बातें घूम रही थीं—“कल रात… जब तुम फिर बुलाओगे…”
चाय तैयार हुई। दोनों बैठे। प्रिया ने धीरे से पूछा, “आप अकेले कैसे रह लेते हैं इतने दिन? मेरा तो पति दूर है, पर मैं तो रोज़ व्यस्त रहती हूँ। आपका तो…”
आरव ने उत्तर दिया, “आदत पड़ गई है।” उसकी आवाज़ में एक भारीपन था।
प्रिया चुप रही। फिर उसने अपना पल्लू ठीक किया। उसके स्तनों की हलचल साड़ी के नीचे साफ दिखी। आरव की साँस थोड़ी तेज़ हो गई। वह जानता था कि यह प्रतिक्रिया मीरा की याद से जुड़ी है। प्रिया की उपस्थिति उसकी अधूरी चाहत को और उत्तेजित कर रही थी।
बातचीत सामान्य रही—पड़ोस के साझा मुद्दे, बारिश से हुए नुकसान, और प्रिया के पति के लौटने की संभावना। पर हर वाक्य के बीच एक चुप्पी थी जो दोनों महसूस कर रहे थे। प्रिया की निगाहें कभी-कभी आरव के चेहरे पर ठहर जातीं। आरव की निगाहें उसके गले और क्लीवेज से ऊपर उठने में संघर्ष कर रही थीं।
अचानक प्रिया ने कहा, “कल रात मुझे भी नींद नहीं आई। लगा जैसे कोई घर के आसपास घूम रहा हो।” उसकी आवाज़ में एक हल्की सी आशंका थी।
आरव की उँगलियाँ चाय के कप पर अकड़ गईं। क्या प्रिया ने भी कुछ महसूस किया था?
प्रिया उठी। “मुझे जाना चाहिए। दोपहर का खाना बनाना है।” वह दरवाजे की ओर बढ़ी। साड़ी का घाघरा उसकी जाँघों से रगड़ खा रहा था। आरव भी उठा। दरवाजे पर दोनों रुक गए। प्रिया ने सिर घुमाया। उसकी आँखों में एक अनकहा प्रश्न था।
आरव ने धीरे से कहा, “अगर कभी… बात करने का मन हो, तो आ जाना।”
प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी साँस थोड़ी भारी लग रही थी। वह चली गई।
आरव ने दरवाजा बंद किया। कमरे में फिर वही खुशबू फैली—चमेली की। दीवार के पास खड़ी थी मीरा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
“तुमने उसे देखा,” मीरा ने फुसफुसाया। “उसका शरीर… तुम्हें याद दिलाता है ना?”
आरव ने उत्तर नहीं दिया। मीरा पास आई। उसने आरव का हाथ अपने स्तन पर रखा। “प्रिया की तरह गोल और भारी… पर मेरा तुम्हारा है।”
आरव की उँगलियाँ अपने आप दब गईं। मीरा की साँस तेज़ हो गई। उसने आरव को दीवार से सटाया और उसके होंठों को चूस लिया। इस बार संभोग लंबा नहीं था। मीरा ने आरव के लंड को बाहर निकाला, घुटनों के बल बैठी और उसे अपने मुँह में ले लिया। उसकी जीभ और होंठ आरव को पागल कर रहे थे। आरव ने उसके बाल पकड़े और गति नियंत्रित की। कुछ ही क्षणों में उसने मीरा के मुँह में अपना वीर्य छोड़ दिया। मीरा ने सब निगल लिया, फिर उठी और आरव के कान में कहा—
“प्रिया कल फिर आएगी। तुम तय करना… उसे छूना है या नहीं। पर याद रखना—हर बार जब तुम किसी और को छुओगे, मैं और पास आऊँगी… और कुछ छुपा हुआ बताऊँगी।”
मीरा की आकृति फिर धुँधली पड़ने लगी। आरव अकेला रह गया। उसके मन में प्रिया की गोलाई, उसकी पतली कमर और मीरा का वादा एक साथ घूम रहे थे।
शाम अभी बाकी थी। और कल की मुलाकात का तनाव उसके शरीर में पहले से ही उतर चुका था।
दोपहर ढल चुकी थी। आसमान में बादल घिर आए थे। आरव बालकनी में खड़ा था। उसके हाथ में मीरा की डायरी थी, पर वह पन्ने नहीं पलट रहा था। मन प्रिया की सुबह की मुलाकात और मीरा के अंतिम शब्दों के बीच झूल रहा था।
तभी गेट की घंटी बजी।
आरव ने दरवाजा खोला। प्रिया फिर खड़ी थी। आज उसने गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी थी। साड़ी का कपड़ा पतला था। उसके स्तनों की गोलाई और निप्पलों की हल्की उभार साफ झलक रही थी। कमर इतनी पतली थी कि साड़ी की पल्लू की गाँठ वहाँ और निखर रही थी। कूल्हे चौड़े और गोल थे। जब वह चली तो घाघरे के नीचे जाँघों की लचक साफ महसूस होती थी। बाल आज बाँधे हुए थे, पर कुछ ज़ुल्फें माथे पर बिखरी थीं। गर्दन पर पसीने की एक पतली रेखा चमक रही थी।
“आरव जी, बिजली चली गई है मेरे घर में,” प्रिया ने कहा। आवाज़ में थकान थी। “पंखे बंद हैं। बहुत उमस हो रही है। अगर आपत्ति न हो तो थोड़ी देर यहाँ बैठ जाऊँ?”
आरव ने सिर हिलाया। प्रिया अंदर आई। सोफे पर बैठते हुए उसकी साड़ी का पल्लू एक बार फिर सरक गया। इस बार आधा स्तन लगभग उघड़ गया। उसने जल्दी से ठीक किया, पर आरव की निगाह वहाँ से हटने में देर लगाई।
कमरे में पंखा चल रहा था। प्रिया ने आँखें बंद कर लीं। कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा, “पति जब दूर होते हैं तो रातें बहुत लंबी लगती हैं। शरीर की जरूरतें… मन की जरूरतें… दोनों अधूरी रह जाती हैं।”
आरव चुप रहा। प्रिया की बातों में एक ईमानदारी थी जो उसे छू गई।
बारिश शुरू हो गई। बूँदें तेज़ी से गिरने लगीं। बिजली गिरी। कमरे की बत्ती एक क्षण के लिए मद्धम पड़ी। उसी क्षण आरव को मीरा की खुशबू महसूस हुई। वह कहीं पास थी।
प्रिया उठी और खिड़की के पास गई। बारिश देखती हुई बोली, “आज तो देर हो जाएगी। घर लौटना मुश्किल लगेगा।”
आरव उसके पास पहुँचा। दोनों खिड़की के किनारे खड़े थे। प्रिया का कंधा उसके बाजू से छू गया। त्वचा गर्म थी। प्रिया ने सिर घुमाया। उनकी आँखें मिलीं। उस एक निगाह में अकेलापन, चाहत और हिचकिचाहट तीनों थे।
आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया। प्रिया ने नहीं हटाया। बल्कि उसकी उँगलियाँ आरव की उँगलियों में फँस गईं।
“क्या हम गलत कर रहे हैं?” प्रिया की आवाज़ काँप रही थी।
आरव ने उत्तर के बजाय उसे अपनी ओर खींच लिया। होंठ होंठ से मिल गए। पहला चुंबन संकोच भरा था। दूसरा भूखा। प्रिया की साँस तेज़ हो गई। आरव का हाथ उसकी कमर पर था। उसने साड़ी का पल्लू हटाया। स्तन उसके हाथ में आ गए—नरम, भारी, और गर्म। निप्पल पहले से कठोर थे। आरव ने एक को मुँह में लिया। प्रिया की कमर अंदर की ओर मुड़ गई। उसकी उँगलियाँ आरव के बालों में घुस गईं।
“और… धीरे नहीं,” उसने फुसफुसाया।
आरव ने उसे सोफे पर लिटा दिया। साड़ी का घाघरा ऊपर उठाया। उसके अंदर कोई अंडरवियर नहीं था। योनि पहले से गीली थी। आरव ने उँगलियाँ अंदर डालीं। प्रिया की जाँघें काँप उठीं। उसने आरव के लंड को बाहर निकाला और अपने हाथ से सहलाया।
फिर आरव ने प्रवेश किया। प्रिया की आँखें बंद हो गईं। हर धक्के के साथ उसकी आवाज़ निकल रही थी—दबी हुई, पर साफ। आरव ने उसके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। गति तेज़ हो गई। प्रिया के स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। अचानक उसने आरव को कस लिया। शरीर अकड़ गया। वह चरम पर पहुँची। आरव भी उसके अंदर ही बिखर गया।
दोनों कुछ देर वैसे ही पड़े रहे। साँसें भारी थीं।
तभी कमरे के कोने में मीरा दिखाई दी। उसकी आँखों में नाराज़गी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसने केवल इतना कहा—
“अब तुमने उसे छू लिया। इसलिए मैं और पास आ गई हूँ। कल रात… तुम्हें वह सच बताऊँगी जो डायरी में कभी लिखा ही नहीं गया। वह सच… प्रिया से भी जुड़ा है।”
मीरा की आकृति गायब हो गई।
प्रिया अभी भी आरव की छाती पर सिर रखे लेटी थी। उसे कुछ पता नहीं था। पर आरव की धड़कन तेज़ हो चुकी थी।
बारिश अभी थमी नहीं थी। और कल की रात अब पहले से कहीं अधिक भारी लग रही थी।
रात गहर चुकी थी। बारिश थम चुकी थी, पर हवा में नमी बाकी थी। प्रिया जा चुकी थी। उसके जाने के बाद कमरे में चुप्पी फैल गई थी। आरव बिस्तर पर बैठा था। शरीर पर प्रिया का स्पर्श अभी भी महसूस हो रहा था, पर मन मीरा के अंतिम वाक्य पर अटका हुआ था—“वह सच… प्रिया से भी जुड़ा है।”
दीपक की लौ एक बार फिर हिली। चमेली की खुशबू फैली। मीरा बिस्तर के किनारे खड़ी थी। इस बार उसकी साड़ी सफेद नहीं, हल्के लाल रंग की थी। कपड़ा पतला था। उसके स्तनों की गोलाई और निप्पलों की कठोरता साफ झलक रही थी। कमर पतली, कूल्हे गोल और जाँघें चिकनी। बाल खुले थे, जो उसकी पीठ तक बह रहे थे।
“तुमने उसे छू लिया,” मीरा ने धीरे से कहा। आवाज़ में न कोई आरोप था, न जलन। केवल एक गहराई थी। “अब मैं तुम्हारे और पास हूँ। इसलिए वह बात बता सकती हूँ जो डायरी में कभी नहीं लिखी।”
आरव ने सिर उठाया। उसकी निगाहें मीरा के चेहरे पर टिकी थीं।
मीरा पास आई। बिस्तर पर बैठ गई। उसकी जाँघ आरव की जाँघ से छू गई। त्वचा गर्म थी। उसने आरव का हाथ अपने घुटने पर रखा और बोली—
“प्रिया… केवल पड़ोसन नहीं है। तीन वर्ष पहले, जब मेरी दुर्घटना हुई थी, उस रात प्रिया भी वहाँ मौजूद थी। वह मेरी सहेली थी। कॉलेज के दिनों से। हम दोनों ने कई रातें एक साथ बिताई थीं—तुम्हारे आने से पहले। उसके शरीर का हर कोना मुझे पता था, और मेरा उसे।”
आरव की साँस थम गई। उसने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने आगे कहा, “दुर्घटना के समय प्रिया मेरे साथ कार में थी। वह बच गई। मैं नहीं बची। पर उसने तुम्हें कभी नहीं बताया। डर थी कि तुम उसे दोष दोगे। इसलिए वह चुप रही। और अब… जब तुम अकेले हो, वह तुम्हारे पास इसलिए आ रही है क्योंकि उसे भी वही अकेलापन है जो मुझे तुम्हारे बिना था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। आरव की उँगलियाँ मीरा की जाँघ पर दब गईं। मीरा ने उसका हाथ अपने स्तन तक ले गई। निप्पल कठोर था।
“अब तुम जान गए हो,” मीरा ने फुसफुसाया। “प्रिया के अंदर मेरी यादें भी बसती हैं। जब तुम उसे छूते हो, तो कुछ अंश मुझ तक भी पहुँचता है। इसलिए… कल जब वह फिर आए, तो उसे पूरी तरह अपना लो। मैं पास रहूँगी।”
आरव ने मीरा को अपनी ओर खींच लिया। इस बार संभोग में जल्दबाजी नहीं थी। उसने मीरा को धीरे-धीरे नंगा किया। उसके स्तनों को चूसा, पेट पर होंठ फिराए, फिर जाँघों के बीच जीभ ले गया। मीरा की कमर उठी। उसकी उँगलियाँ चादर को जकड़ रही थीं। जब आरव ने प्रवेश किया, तो दोनों की आँखें मिलीं। हर धक्का गहरा था, पर जल्दबाजी से खाली। मीरा ने आरव के कान में केवल इतना कहा—
“प्रिया को बताना… कि मैंने सब कह दिया। फिर देखना, वह क्या करती है।”
चरमावस्था के बाद मीरा की आकृति फिर धुँधली पड़ने लगी। गायब होने से पहले उसने एक अंतिम बात कही—
“कल सुबह प्रिया खुद आएगी। और इस बार वह अकेली नहीं होगी। उसके साथ… एक और औरत होगी। वह औरत… तुम्हारी जिंदगी का अगला मोड़ है।”
आरव अकेला रह गया। खिड़की के बाहर रात अभी बाकी थी। पर उसके मन में अब दो चेहरे घूम रहे थे—प्रिया का, और वह अज्ञात चेहरा जो कल आने वाला था।
सुबह की पहली किरण अभी दूर थी। और उसके साथ एक नया रहस्य भी।
Fuckuguy
albertprince547;

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