*Update 9*
*भाई का दृष्टिकोण*
एक बात तो ये हुई कि दीदी ने अपना फोन चेंज कर लिया। यानी मेरी एप पुराने फोन के साथ चली गई। लेकिन मैने नए फोन में एप इंस्टॉल नहीं की। मुझे लगने लगा कि मैं दीदी की प्राइवेसी ब्रेक कर रहा हूं भले ही उनको पता न हो। दीदी की बातें इस तरह सुनना बहुत गलत लग रहा था। दीदी मुझे कितना प्यार करती है और मैं ऐसी हरकत कर रहा हूं ये सोचके और भी बुरा लग रहा था। इसलिए अब दीदी की रिस्पेक्ट और प्यार और कुछ नहीं। अब आगे......
सुबह आँख खुलते ही मुझे मेरी दीदी का ही ख्याल आया। मैं पूरी तरह अपनी बहन का दीवाना हो गया था। पता नहीं ऐसा क्यों हुआ था।
जब दीदी सुबह मुझे गले मिलीं तो मैंने उनके स्तनों को अच्छे से महसूस किया। अब दीदी भी मुझसे काफी खुल चुकी थीं। सुबह जब हम गले मिले, तब दीदी का हाथ मेरी गाँड़ पर था। मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी, लेकिन फिर भी मैंने भी अपना हाथ थोड़ा सा नीचे दीदी के पिछवाड़े पर रखा। क्या नरम-नरम और मुलायम पिछवाड़ा था मेरी बहन का!
जीजू अपनी नौकरी पर चले गए थे और मैं व दीदी घर में थे। दीदी ने कहा,
“चल हर्ष, आज फिर कपड़े लेने जाना है।”
मैंने कहा, “दीदी, अभी तो नए कपड़े थोड़े दिन पहले ही लेकर आए हैं।”
दीदी बोलीं, “नहीं भाई, यह फ्रॉक मुझे कंफर्टेबल नहीं है। हम जाकर स्कर्ट और टॉप लेकर आते हैं।”
फिर हम बाइक लेकर निकल पड़े। हम वही शोरूम पहुँच गए। वहाँ शोरूम का मालिक संजय बैठा था। वह दीदी को देखकर मुस्कुराया। दीदी भी मुस्कुराईं। संजय ने दीदी को अंदर केबिन में आकर बैठने को कहा, लेकिन दीदी ने मना कर दिया और कहा,
“आज हम जल्दी में हैं। अगली बार पक्का बैठेंगे।”
फिर हम ऊपर रीना के पास चले गए। मुझे रीना से बातें करनी थीं, इसलिए मैंने दीदी से कहा,
“दीदी, आप नीचे जाकर बैठो। मैं पसंद करके ले आता हूँ।”
दीदी भी मेरे सामने देखकर मुस्कुराईं और नीचे चली गईं।
मैंने रीना से कहा, “हमें स्कर्ट और टॉप लेना है।”
रीना ने पूछा, “कैसा स्कर्ट और टॉप चाहिए?”
मैंने कहा, “बस दीदी घर के अंदर पहन सकें।”
रीना बोली, “बाहर तो नहीं पहनना है ना?”
मैंने जल्दी से कहा, “नहीं-नहीं, घर के अंदर पहन सकें ऐसा ही चाहिए।”
फिर रीना मुझे स्कर्ट और टॉप दिखाने लगी और हम बातें करने लगे।
रीना ने पूछा, “और हर्ष, बताओ कैसा चल रहा है तुम्हारे और दीदी के बीच?”
मैंने कहा, “ठीक ही चल रहा है।”
रीना बोली, “देखो हर्ष, तुम्हारी दीदी बहुत खुलकर जीने वाली हैं, लेकिन तुम्हारे आने के बाद उन्होंने अपने आप को संयमित कर लिया है।”
मैंने कहा, “हाँ, क्या कर सकते हैं। अब भाई के सामने बहन कितना खुलकर रह सकती है।”
रीना ने कहा, “लेकिन यह तो गलत हुआ ना? हम अनजान लोगों के सामने तो खुलकर रहते हैं और अपने ही परिवार के सामने शर्माकर रहना पड़ता है।”
फिर मैंने पूछा, “तुम्हारे और तुम्हारे भाई के बीच कैसा चल रहा है?”
रीना ने कहा, “मैंने बताया था, मेरा भाई मुझे बड़ा सपोर्ट करता है और मैं उसके सामने भी बहुत खुलकर रहती हूँ। यहाँ तक कि जब भी मुझे चुदाई का मन होता है तो मेरा भाई समझ जाता है और मेरे बॉयफ्रेंड को बुला लेता है या फिर किसी न किसी तरह हमारा मिलन करवा देता है।”
मैंने कहा, “लेकिन मेरी बहन तो शादीशुदा है, तो उसे और क्या सपोर्ट करूँ?”
रीना बोली, “शादीशुदा होने का यह मतलब नहीं कि वह सिर्फ अपने पति से ही चुदाई करवाए। बहुत सारी औरतें शादीशुदा होने के बाद भी मज़ा करने के लिए बाहर भी चुदवाती हैं।”
मैंने कहा, “लेकिन मेरी बहन तो ऐसी नहीं है।”
रीना ने पूछा, “ऐसी नहीं है मतलब क्या? क्या बाहर चुदवाना गलत है?”
मैंने कहा, “हाँ, शायद शादी के बाद बाहर चुदवाना गलत ही है।”
रीना बोली, “लेकिन अगर पति को पता हो तो कुछ भी गलत नहीं। हाँ, पति अगर नाराज हो जाता है या मना करता है तो ही गलत है।”
मैंने कहा, “तो क्या इसका मतलब मेरी बहन भी बाहर चुदवाती है?”
रीना ने कहा, “मैं कुछ नहीं कहूँगी। वह तुम्हारी बहन है। तुम्हारी बहन के मन में क्या है, वह तुम्हें खुद पता लगाना होगा। लेकिन उसके लिए तुम्हें अपनी बहन के साथ खुलकर रहना होगा ताकि वह तुम्हारे सामने बिल्कुल न शर्माए। मैंने तुम्हारी बहन से फोन पर बात की थी। तुम्हारी बहन ने बताया कि उसे शर्म तो आती है, लेकिन तुम जितना अपनी बहन के साथ खुलकर रहोगे, तुम्हारी बहन भी उतना ही तुम्हारे साथ खुलकर रहेगी। अब यह तुम्हारे ऊपर डिपेंड करता है कि तुम कितना खुलकर अपनी बहन के साथ रहते हो।”
फिर मैंने रीना से कहा, “अच्छा, यह बताओ मैं बहन के लिए कैसे कपड़े पसंद करूँ? दीदी ने स्कर्ट और टॉप लेने को कहा है।”
रीना बोली, “फिक्र मत करो, मैं बहुत अच्छे कपड़े पसंद करके दूँगी।”
फिर रीना ने दीदी के लिए कपड़े पसंद किए। टॉप स्लीवलेस था और पेट से थोड़ा ऊपर था, यानी दीदी की नाभि पूरी खुलकर दिखेगी। स्कर्ट भी जाँघों तक पहुँच सकती थी।
मैंने पूछा, “क्या दीदी ये कपड़े पहनेंगी?”
रीना ने कहा, “तुम फिक्र मत करो। तुम जो भी लोगे, तुम्हारी दीदी पहनेंगी। अगर इससे छोटे कपड़े ले जाओगे तो भी तुम्हारी दीदी मना नहीं करेंगी।”
रीना ने आगे बताया, “अच्छा और एक बात सुनो। शॉर्ट्स जो हैं ना, वे चड्डी की जगह नहीं ले सकते। शॉर्ट्स जब भी पहनते हैं तो उनके ऊपर कुछ पहनना नहीं होता। उस दिन मैंने तुम्हारी दीदी को कंफर्टेबल करने के लिए ही फ्रॉक के नीचे शॉर्ट्स पहनने को कहा था। अगर तुम्हारी दीदी ने कहा हो तो दीदी के लिए कुछ अच्छी पैंटी भी ले लो।”
मैंने कहा, “नहीं-नहीं, दीदी ने पैंटी लेने को तो नहीं कहा है।”
रीना बोली, “कोई बात नहीं। थोड़े दिन बाद वह खुद कहेंगी। अभी उन्हें शॉर्ट्स ही पहनने दो।”
मैंने पूछा, “तुम्हें कैसे पता दीदी खुद कहेंगी?”
रीना ने कहा, “तुम्हारी दीदी को शॉर्ट्स पहनने की आदत नहीं।”
मैंने कहा, “ठीक है, जब दीदी कहेंगी तो ले जाएँगे।”
जब हम नीचे आए तो संजय और दीदी कुछ बातें कर रहे थे। हमें देखकर वे चुप हो गए। दीदी ने कपड़ों के पैसे के लिए बहुत कहा, लेकिन संजय ने बिल्कुल मना कर दिया। शायद दीदी और संजय के बीच बहुत अच्छी दोस्ती थी।
हम कपड़े लेकर घर आ गए। नए कपड़े वैसे ही थे, बस सिंगल पीस नहीं, टू-पीस थे।
दीदी अपने कमरे में गईं और मैं अपने कमरे में। कमरे में जाकर मैं मूठ मारने लगा। दीदी के पास जाकर तुरंत मेरा खड़ा हो जाता था, इसलिए सोचा कि मूठ मार के जाऊँ तो ठीक रहेगा। मूठ मारके एक घंटा आराम किया।
फिर दीदी का मैसेज आया। मैं आराम से दीदी के कमरे में गया। दीदी नए कपड़े पहनकर लेटी थीं। मैं जाकर दीदी के पास लेट गया। मुझे पता था कैसे लेटना है। आज तो दीदी के पेट पर सीधा हाथ लगाना था।
मूठ मारने के बाद भी लंड में हलचल होने लगी। ऊपर से दीदी की बगल।
दीदी ने कहा, “हाथ तो रखो।”
मैंने दीदी के पेट पर हाथ रखा। कितना मुलायम पेट था। मैं दीदी का पेट सहलाने लगा। दीदी का पेट मैंने ठीक से देखा तो नहीं था, लेकिन सहलाना कितना अच्छा लगता है। मैं पूरे पेट पर हाथ फिराने लगा। हाथ को कमर तक ले जाता।
दीदी ने मेरे तरफ वाला हाथ ऊपर कर लिया। दीदी की बगल मेरे सामने थी। आज दीदी की बगल बिल्कुल साफ थी। एक छोटा सा बाल भी नहीं था। शायद अभी-अभी दीदी ने बगल के बाल साफ किए थे। वैसे इतने बड़े भी नहीं हुए थे कि साफ करने पड़ें। एकदम चिकनी बगल थी।
दीदी की बगल देखकर लंड खड़ा होने लगा।
मैंने कहा, “दीदी, कौन सा साबुन है?”
दीदी बोलीं, “तुम ही बताओ।”
मुझे पता था कैसे पता लगाना है। मैं मुँह दीदी की बगल में ले गया। मैंने बगल को सूँघा। फिर होंठ बगल की नाजुक त्वचा पर लगा दिए।
दीदी के मुँह से सिसकारी निकल गई। मेरा लंड दीदी की जाँघ पर सटा हुआ था। मैं दीदी की बगल पर होंठ फिराने लगा। दीदी मचलने लगीं। दीदी को भी शायद अच्छा लग रहा था।
मुझे क्या सूझा, मैंने दीदी की बगल पर जीभ की नोक टच कराई। दीदी को जैसे करंट लगा हो, अचानक से दीदी स्थिर हो गईं। दीदी ने कुछ नहीं कहा।
मैंने फिर से जीभ से टच किया। दीदी की बगल को जीभ से टच करना बहुत अच्छा लग रहा था। दीदी को अच्छा लगा या बुरा, यह मैंने सोचा नहीं। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं बार-बार दीदी की बगल को जीभ से टच करने लगा।
थोड़ी देर बाद दीदी थोड़ी सी रिलैक्स हुईं।
दीदी बोलीं, “कौन सा साबुन है?”
मैंने कहा, “पता नहीं चल रहा।”
मैं फिर से जीभ से टच करने लगा। थोड़ी देर बाद मैंने एक साबुन का नाम लिया, लेकिन दीदी ने हाँ या ना नहीं कहा। थोड़ी देर बाद दीदी ने “ना” कहा।
मैंने फिर से दीदी की बगल में मुँह लगा दिया। इस बार मैं खुलकर दीदी की बगल में जीभ फिराने लगा। दीदी भी मचलने लगीं। मैंने काफी देर चूमा और जीभ फिराई। मैं दीदी की नाभि में उंगली भी कर रहा था और दीदी की जाँघ पर लंड भी रगड़ रहा था। मूठ मारने के बाद भी लंड पूरा खड़ा था। हाँ, आज जाने की जल्दी नहीं थी। अगर मूठ न मारी होती तो शायद पानी निकल जाता। वैसे लंड आगे से गीला तो हो गया था। प्री-कम निकलने लगा था। आज तो दीदी की जाँघें भी सहलानी थीं।
बहुत देर हो गई थी लेकिन दीदी ने साबुन का नाम नहीं पूछा था। आखिर मैंने ही एक साबुन का नाम लिया। दीदी ने फौरन “नहीं” कहा। दीदी की आवाज मदहोश करने वाली थी।
मैं फिर से दीदी की बगल चाटने लगा। इस बार और खुलके चाटने लगा। पूरी जीभ बाहर निकालके चाटने लगा। कुछ ज्यादा ही हो गया था, लेकिन इस वक्त मैं कुछ सोचने की स्थिति में नहीं था। दीदी की हालत पता नहीं थी, लेकिन जब भी मैं चाटता, दीदी के मुँह से सिसकारी निकलती। अब मैं लगातार चाटने लगा। दीदी के मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं।
मैं अपनी सगी बहन की बगल ऐसे चाटने लगा जैसे मेरी गर्लफ्रेंड हो। शायद मैं गर्लफ्रेंड की बगल भी ऐसे न चाटूँ। कभी सोचा नहीं था मैं किसी की बगल चाटूंगा और वो भी सगी बहन की। मैं दिमाग की बजाय लंड से सोचने लगा था। दीदी की बगल को पूरा गीला कर दिया था।
मुझे लगा अब ज्यादा किया तो जाँघें सहलाने तक रुक नहीं पाऊँगा। दीदी भी बेड पर मचल रही थीं। क्या पता बगल को चाटना दीदी को अच्छा न भी लगा हो। बगल सूँघना और चूमना अलग है, लेकिन चाटना अलग है। और मैं तो बगल को मलाई समझकर चाट रहा था, जैसे आइसक्रीम चाट रहा हूँ। दीदी भी सोच रही होंगी मैं कितना गंदा हूँ जो बगल चाटता हूँ। फिर भी मैं चाटता रहा। बगल चाटने से मन नहीं भर रहा था। दीदी की सिसकारियाँ जारी थीं।
अचानक दीदी ने हल्का सा “बस” कहा। इतना धीरे था कि मैंने भी ठीक से नहीं सुना। शायद मुझे नहीं कहा था, बस ऐसे ही मुँह से निकल गया होगा। या फिर मैं चाटने में इतना मगन था कि मुझे कम सुनाई दिया हो। लेकिन अब शायद मुझे रुकना चाहिए।
मैंने कुछ नहीं कहा, बस ऐसे ही रुक गया। अब मुझे जाँघें भी सहलानी थीं। मैं बैठ गया और दीदी की ओर देखा। दीदी की आँखें बंद थीं और चेहरा लाल हो गया था।
मैंने कहा, “दीदी, पैर दबा दूँ?”
दीदी ने आँखें खोले बिना धीरे से “नहीं” कहा।
मेरा बहुत मन था जाँघों को सहलाने का। मैंने फिर से पूछा, “दीदी, थोड़ी देर…?”
दीदी की आवाज थोड़ी ऊँची हुई, “ना… कहा ना।”
शायद मेरा बगल चाटना दीदी को अच्छा नहीं लगा था। मैं उदास होकर अपने कमरे में आ गया।
दीदी के पैर दबाने से मना करने के बाद मैं अपने कमरे में आया। वैसे दीदी ने ठीक ही किया, ऐसा मुझे लगता है। आज मैंने कुछ ज्यादा ही दीदी को परेशान किया।
जिस तरह से मैंने दीदी की बगल के साथ किया और जिस तरह मैंने मेरा लंड दीदी की जांघों पे रगड़ा, कोई और बहन होती तो अपने भाई को लात मार कर भगा देती, लेकिन दीदी ने कुछ नहीं कहा, उल्टा मेरा सपोर्ट करती रही शायद। मुझे दीदी के लिए थोड़ा बुरा लग रहा था।
और ऐसा नहीं कि दीदी कंवारी है, वो शादीशुदा है और मुझसे सात साल बड़ी है। ये शायद दीदी का मेरे लिए प्यार है जो शायद मुझे सपोर्ट करती है। उन्हें क्या जरूरत है मेरे साथ ऐसा कुछ भी करने की? उनके पास तो जीजू है और उनकी सेक्स लाइफ भी बहुत शानदार है। वे दोनों रोल प्ले भी करते हैं और ना जाने और भी क्या-क्या करते होंगे।
मैंने कमरे का दरवाजा बंद किया और लोअर को नीचे किया। लंड पूरा चिकने पानी से भीगा था और अंडरवीयर भी। मैं दीदी की मुलायम चिकनी बगल को याद करने लगा और मेरे लंड की दीदी की जांघों पे रगड़।
दीदी को भी मेरे लंड का अहसास अपनी जांघों पे हुआ होगा फिर भी कुछ नहीं कहा, ये सोच के मैं और उत्तेजित हो गया। इसका मतलब दीदी को मेरे लंड की रगड़ से कोई ऐतराज नहीं था। दीदी का जिस्म कितना भरा-भरा और मुलायम है और दीदी के दोनों बड़े-बड़े स्तन। दीदी के स्तनों का कोई मुकाबला नहीं। दीदी का पूरा बदन एकदम सेक्सी है। जो भी देखे दीवाना हो जाए और दीदी को चोदने के अलावा कुछ ना सोचे।
बस ऐसे ही सोचते-सोचते मेरे लंड ने पानी छोड़ दिया। मैं बाथरूम में गया। फ्रेश होकर दरवाजे की कुंडी खोली और वापस बेड पे आके लेट गया। मूठ मारने के बाद नींद अच्छी आती है। मुझे भी नींद आ गई।
तभी अचानक दीदी की एकदम पास से आवाज आई: “उठ छोटे, कितना सोएगा।”
मुझे सच में नींद आ रही थी। मैंने बस इतना कहा: “सोने दो ना दीदी।”
लेकिन दीदी ने मुझे उठा ही दिया। दीदी अकेली बोर हो रही थी और उन्हें मेरी कंपनी चाहिए थी।
दीदी ने जिस तरह से बात की, मुझे नहीं लगा दीदी मुझे जरा सा भी नाराज है। मुझे लगा था दीदी आज पक्का नाराज हो जाएंगी। और मैंने जिस तरह पैर दबवाने को दबाव किया उस वक्त तो दीदी थोड़ी गुस्सा भी हो गई थी शायद।
आखिर कौन बहन अपने सगे भाई से इस तरह ओपन होती है? मेरी दीदी सच में बहुत अच्छी है जो मुझे इतनी छूट दी है। मैं किस्मतवाला हूँ जो ऐसी बहन मुझे मिली है।
मैंने कहा: “ठीक है, आता हूँ।” दीदी शायद किचन में गई। मैं उठा और फ्रेश हुआ। दरवाजा खुला था। जैसे ही मैं किचन तक पहुँचा और मैंने देखा दीदी एक डिब्बा उठाने के लिए झुक रही थी। पता नहीं वो डिब्बा जमीन पर क्या कर रहा था।
जैसे ही दीदी झुकी, उनकी स्कर्ट जैसे पूरी ऊपर चढ़ गई। दीदी ने अंदर शॉर्ट्स पहनी थी लेकिन शॉर्ट्स पूरी तरह दीदी की भरावदार गांड से चिपकी हुई थी और दीदी की गांड मेरी तरफ थी। मैं वहीं रुक गया। थोड़ी देर पहले ही मूठ मारी थी लेकिन ये दृश्य देखके लंड फिर से अकड़ गया। क्या गांड थी। गांड इतनी बड़ी थी कि शॉर्ट्स भी चड्डी लग रही थी।
अगर दीदी चड्डी पहने होती तो क्या होता? अच्छा किया दीदी ने अंदर चड्डी की बजाय शॉर्ट्स पहना था। आज मन हुआ कि दीदी की शॉर्ट्स नीचे सरका दूँ और मेरा लंड नंगी गांड पे रगड़ दूँ। फिर याद आया कि दीदी मुझसे कितना प्यार करती है। कितना यकीन होगा मुझ पर तब जाके इस तरह मेरे साथ रह सकती है।
अगले ही पल विचार बदल गया। क्या एक भाई का अपनी सगी बहन की नंगी गांड पे लंड रगड़ना इतना गलत है? क्या होता अगर हमने कपड़े ईजाद न किए होते? उस वक्त गांड पे क्या चूत पे भी लंड रगड़ खाता और बुरा न समझा जाता।
फिर दीदी सीधी हो गई। मैं भी जाके दीदी के पास खड़ा हो गया। दीदी की गांड ने मेरी बोलती बंद कर दी थी। दीदी जितना पूछती मैं उतना जवाब देता। अचानक दीदी की पीठ पे खुजली शुरू हो गई। दीदी ने मुझसे मदद मांगी। मैं दीदी की पीठ को सहलाने लगा।
थोड़ी देर बाद मैंने पूछा कि अब ठीक है दीदी। लेकिन दीदी को और ज्यादा खुजली शुरू हो गई। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। फिर दीदी ने ही कहा कि अंदर हाथ डाल के करो।
आज पता नहीं क्या हो रहा था मेरे साथ। दीदी बिल्कुल नॉर्मल थी और मेरा लंड बैठने का नाम नहीं ले रहा था। आखिरकार मैंने टॉप के नीचे से अंदर हाथ डाला। क्या मुलायम पीठ थी। मैं दीदी के पीछे था। दीदी के कहे अनुसार मैं हाथ ऊपर करता गया और दीदी का टॉप भी ऊपर होता गया।
दीदी की ब्रा की पट्टी मेरे सामने थी। जहां दीदी ने बताया वो ब्रा की पट्टी के आसपास था। मैं हाथ ऊपर-नीचे करने लगा। ब्रा की पट्टी बार-बार मेरे हाथ से टकराती। जब मैं हाथ पट्टी के ऊपर ले जाता तो पट्टी भी हाथ के साथ ऊपर खींचती और नीचे ले जाता तो नीचे। दीदी की पीठ भी एकदम गोरी थी। साइड से ब्रा में कैद दीदी के स्तन भी नजर आ रहे थे।
लंड को बैठाने के लिए बार-बार याद करता रहा कि मेरी सगी बड़ी बहन है और मुझसे सात साल बड़ी है। लेकिन लंड के ऊपर इसका कोई असर नहीं था। उल्टा सगी बहन है ये सोचके और टाइट हो रहा था शायद।
अचानक दीदी ने कहा: “रुक एक मिनट मैं आती हूँ।” और दीदी अपने कमरे में चली गई। मुझे लगा मैंने कोई गलती तो नहीं कर दी। लेकिन जब दीदी वापस आई मुझे यकीन नहीं हुआ, दीदी ने अपनी ब्रा निकाल दी थी। दीदी के दोनों स्तन चलते वक्त थिरक रहे थे। मुझे यकीन नहीं हुआ।
दीदी वापस मेरी ओर पीठ करके खड़ी हो गई। दीदी ने कुछ कहा नहीं लेकिन मुझे समझ आ गया कि क्या करना है। मैंने वापस अपना हाथ अंदर घुसा दिया। अब ब्रा की पट्टी नहीं थी। मैं आराम से पीठ पे हाथ फिराने लगा।
चाय बन चुकी थी। दीदी ने कहा अभी चाय पी लेते हैं, बाद में तू पाउडर लगा देना। मुझे लगा ऐसे ही खड़े-खड़े पाउडर लगाना होगा। हम हॉल में बैठकर चाय पीने लगे। मेरी नजर बार-बार दीदी के स्तनों पर जा रही थी। टॉप के ऊपर से दीदी के निप्पल साफ-साफ नजर आ रहे थे शायद दीदी को पता नहीं था।
चाय खत्म की और दीदी मुझे उनके कमरे में ले गई। कमरे में जाते ही दीदी उल्टी लेट गई और टॉप को भी काफी ऊपर कर लिया। दीदी के स्तन साइड से ओपन हो गए थे। दीदी आराम से लेती थी और मेरा लंड खड़ा था। मैंने मुश्किल से पूछा: “दीदी कहां पाउडर लगाऊँ?”
मुझे जगह दिखाने के लिए दीदी अपना दायां हाथ पीछे पीठ पर मोड़कर लाई। ऐसा करने के लिए दीदी को थोड़ा ऊपर उठना पड़ा और जैसे ही दीदी ऊपर हुई और हाथ मोड़कर पीछे लाई, दीदी के दाएं स्तन का बड़ा हिस्सा एक पल के लिए मुझे दिख गया।
दीदी ने जहां बताया था वहां मैंने पाउडर डाला और सहलाने लगा। मेरा मन हो रहा था कि दीदी के स्तनों को थोड़ा टच करूँ। हालांकि ये मुमकिन नहीं था और सही भी नहीं था। हां अगर दीदी खुद से कहे तो बात अलग है लेकिन मैं अपनी दीदी के स्तनों को देख के बहक जाऊँ ये ठीक नहीं। मैं बस पीठ यानी कि दोनों स्तनों के लाइन में सहलाने लगा। लेकिन स्तनों को छूने की कोशिश नहीं की।
अचानक दीदी ने कहा: “भाई थोड़ा और साइड में भी ....”
मुझे अपने नसीब पे यकीन नहीं हुआ। जो मैं सोच रहा था वही हुआ। दीदी ने खुद कहा। लेकिन मैं अपने आप को दीदी के स्तनों के लिए बेताब नहीं दिखाना चाहता था। मैं शुरुआत में आराम-आराम से स्तनों को छूने लगा। दीदी के स्तनों का स्पर्श मेरे लिए कुछ ज्यादा ही था। सीधा स्पर्श पहली बार था और वो भी हाथों से।
धीरे-धीरे मैंने स्तनों को हल्का-हल्का दबाना शुरू किया। अब मेरा पूरा ध्यान स्तनों पर था। मैं जल्दी से हाथ पीठ से स्तन पे ले जाता और आराम से स्तन को दबाता। फिर वही क्रिया दूसरे स्तन के साथ। मैं दोनों हाथों का उपयोग कर सकता था लेकिन एक हाथ मेरे लंड पे था। उसे भी दबाना जरूरी था। कभी सोचा नहीं था एक हाथ से लंड और दूसरे हाथ से दीदी के स्तन सहलाऊँगा।
थोड़ी देर बाद मुझे लगा कि अब ज्यादा बर्दास्त नहीं कर पाऊँगा। ज्यादा देर की तो लंड पानी छोड़ देगा। मैंने दीदी से बस इतना कहा कि दीदी हो गया। दीदी ने कहा ठीक है भाई। मैं खड़ा हुआ और दीदी की ओर देखे बिना बाहर निकल गया। अपने कमरे में आके जैसे ही लंड को थोड़ा सा हिलाया, लंड ने पिचकारियां छोड़ दी।