3 hours ago
पहला दिन
धीरू के पास कुछ नहीं बचा था।
नौकरी चली गई — कंपनी ने बिना वजह काट दिया, एक महीने का वेतन भी रोक लिया। जमा दो महीने में खत्म हो गया। पहले किराया, फिर बिजली का बिल, फिर राशन। फिर राशन भी बंद, और दो हफ्ते दाल-चावल पर गुज़ारा। एक दिन श्वेता ने चीनी की डिब्बी खोली — सिर्फ चम्मच भर बची थी। उसने धीरू को बताया नहीं। बस चाय में आधी डाल दी।
अब जो बचा था, वो एक पुराने बैग में ठूंसा हुआ था।
मकान मालिक सीढ़ियों पर खड़ा था। मोटा आदमी, सफेद बनियान, और हर बार ऊपर आते हुए पहले श्वेता को देखता, फिर धीरू को।
"किराया नहीं है तो निकल जाओ। तीन दिन। तीन के बाद सामान बाहर।"
तीन दिन में धीरू ने अपने सारे नंबर छान मारे। कॉलेज के दोस्त — "देखते हैं भाई" — फोन काट दिया। रिश्तेदारों ने हाल पूछकर दुख जताया और कुछ नहीं किया। एक मौसेरे भाई ने कह दिया — "इस शहर में रहना ही क्यों है तुझे?"
तीसरे दिन शाम को धीरू बैठकर रोया।
रसोई की दीवार से टिका, घुटने सीने से लगाए, कंधे हिलते हुए। श्वेता उसके सामने फर्श पर बैठ गई और कुछ नहीं बोली। वो जानती थी, अब बोलने से कुछ नहीं होगा। आदमी जब टूटता है तो उसे एक ही चीज़ चाहिए — कोई जो चुपचाप बैठा रहे।
वो दस मिनट बैठी रही। रोना धीमा हुआ, फिर रुका। धीरू ने आस्तीन से नाक पोंछी और भैया को फोन किया।
सूर्या उसका सगा बड़ा भाई था। पांच साल बड़ा। बाप के मरने के बाद उसी ने धीरू को पढ़ाया — अपनी नौकरी से, अपने पैसे से, बिना एक बार शिकायत किए। उसी ने उसकी शादी करवाई। और फिर नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर चला गया।
अकेला रहता था। ठीक कंपनी, ठीक पैसा। शादी नहीं हुई — कभी नहीं हुई। किसी ने पूछा भी तो बस यही कहता — "देखेंगे।" इकतीस का था, और उसके पास एक अच्छा फ्लैट, एक गाड़ी, और बहुत सारी खाली शामें थीं।
"भैया।" धीरू की आवाज़ फोन पर टूट रही थी। "मेरा सब चला गया। तीन दिन में निकलना है।"
सूर्या एक पल चुप रहा। श्वेता ने वो चुप्पी सुनी और उसका पेट कस गया।
"आ जा।"
"भैया—"
"आ जा, धीरू। दो-चार महीने रुक। इंटरव्यू लगवा दूंगा।"
धीरू ने भरी आंखों से श्वेता की तरफ देखा। श्वेता बिस्तर के किनारे बैठी थी, हाथ गोद में। उसने बस सिर हिला दिया। हां।
श्वेता
शादी को तीन साल हो चुके थे और उसका शरीर उस तरह भरा हुआ था जैसे ब्याह के बाद औरत का शरीर भरता है — एक भी जगह ढीली नहीं, पर हर जगह पूरी। कमर पतली थी और कूल्हे उससे कहीं ज़्यादा चौड़े, और चूचियां इतनी भारी कि ब्लाउज़ हमेशा तना रहता और किनारों की त्वचा बाहर आ जाती।
उसका चेहरा गोल था। आंखें बड़ी, काजल के बिना भी गहरी, पलकें भारी। ऊपर का होंठ भरा हुआ — हमेशा थोड़ा खुला सा, जैसे सांस लेने में तकलीफ हो। माथे पर छोटी बिंदी, और बाल घने, काले, कमर तक।
वो चलती तो चूचियां हल्की सी झूलतीं और वो आदत से हाथ से उन्हें संभाल लेती — जैसे शर्म आ रही हो।
धीरू अच्छा आदमी था। भोला, मेहनती, बेहद बेपरवाह। कभी किसी से झगड़ा नहीं करता, कभी कुछ मांगता नहीं, अपनी चीज़ों से भी बेपरवाह — चश्मा कहीं रख देता और फिर ढूंढता रहता। शादी के तीन साल में उसने श्वेता को ठीक से देखा भी नहीं।
वो कभी नहीं जान पाया कि पत्नी के शरीर पर कहां क्या है। कहां छूने पर वो हंसती है, कहां सांस रोकती है, कहां उसकी कमर बिस्तर से उठ जाती है। रात को सब कुछ हो जाता था और वो करवट लेकर सो जाता था।
और श्वेता के अंदर एक पूरी दुनिया बंद पड़ी थी।
तीन साल
श्वेता पतिव्रता थी। सच्ची, बिना दिखावे के। उसे लगता था कि उसका शरीर सिर्फ धीरू का है और उसके बाद किसी को छूने का हक नहीं। तीन साल में किसी और आदमी को देखकर उसने कभी नहीं सोचा — "काश ये होता।"
पर उसका शरीर धीरू का नहीं था। उसका शरीर सिर्फ उसका था, और वो भूखा था।
धीरू महीने में एक या दो बार ही उसे चोदता था। वो भी बिना जल्दबाजी के नहीं — बल्कि बहुत जल्दी में। ऊपर आता, दो-तीन मिनट ठोकता, खत्म हो जाता। फिर उतरकर करवट ले लेता और दो मिनट में सो जाता।
वो कभी श्वेता की चूत नहीं चूमता। कभी उसकी चूचियों से नहीं खेलता — बस ऊपर से दबा देता और आगे बढ़ जाता। कभी गांड नहीं छूता। कभी कान में कुछ नहीं कहता। उसे पता ही नहीं था कि श्वेता को क्या चाहिए, और उसने कभी पूछने की ज़हमत भी नहीं की।
श्वेता हर बार आस लेकर लेटती। कि आज धीरे से होगा। आज वो उसे देखेगा। आज कुछ और करेगा। और हर बार दो मिनट में सब खत्म हो जाता और वो बिस्तर पर पड़ी छत देखती रह जाती।
उसका पेट कसा हुआ रहता। चूत में एक अधूरा सा भारीपन। और शरीर में एक खुजली जो मिटती ही नहीं।
कुछ रातों में वो हिम्मत करती — धीरू का हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रख देती। धीरू दो-चार बार उंगली चला देता, फिर उब जाता — "सो जाओ, सुबह जाना है।"
फिर श्वेता ने अपना हाथ पकड़ लिया।
अपना हाथ
धीरू के सो जाने के बाद, अंधेरे में, चादर के नीचे, वो अपनी पैंटी उतारती।
शर्माते हुए — जैसे कोई देख रहा हो। पैंटी घुटनों तक सरकती और वो उसे पैरों से निकालकर बगल में रख देती। फिर लेटी रहती, दो मिनट, सांस लेती हुई। जैसे खुद को तैयार कर रही हो।
फिर उसकी उंगली नीचे जाती। पहले धीरे, ऊपर से नीचे, चूत के होंठों पर। फिर अंदर।
वो हमेशा हल्की सी कराहती — बहुत धीमे, ताकि धीरू न जागे। और फिर उंगली चलाती। एक, फिर दो। और जब शरीर में कुछ कसने लगता तो दांतों में चादर का किनारा दबा लेती और तेज़ कर देती।
वो टूटती — बिना आवाज़ के। बस एक लंबी सांस, कांपता हुआ पेट, और फिर ढीला पड़ जाना।
और फिर उसे एक अजीब सी शर्म लगती। जैसे ये सब गलत कर रही हो। जैसे अच्छी बहू अपने हाथ से खुद को शांत नहीं करती।
एक बार उसने सोचा — अपने आप को देखती हुई। अंधेरे में, हाथ अपनी चूत पर, होंठ भींचे हुए, चादर मुंह में दबी हुई। और उसे लगा कि वो कोई और औरत है। कोई औरत जो बिस्तर पर अकेली है और भूखी है और अपने ही हाथों से खुद को शांत कर रही है।
उसने खुद को मन में एक नाम दिया — रंडी।
ये उसने किसी को नहीं बताया। पर अंदर ही अंदर वो जानती थी कि उसके शरीर में एक ऐसी औरत बैठी है जो शरीफ़ औरतों जैसी नहीं है — जिसे रोज़ चाहिए, जिसे ज़ोर चाहिए, जिसे छूना चाहिए, चूमना चाहिए, चोदना चाहिए। एक ऐसी औरत जो पति के दो मिनट से संतुष्ट नहीं होती।
वो बाहर से पतिव्रता थी और अंदर से रंडी। और यही उसका सबसे बड़ा दुख था।
घूंघट
श्वेता के लिए सूर्या सिर्फ पति का बड़ा भाई नहीं था।
वो उसका जेठ था — घर में ससुर के समान। रिश्ते में सास-ससुर के बाद सबसे ऊपर। श्वेता उसकी छोटी बहू थी, और जेठ के सामने बहू का एक अटल नियम था जो उसने ब्याह के पहले दिन से पाला था — घूंघट।
घर में जब भी सूर्या आता, श्वेता का पल्लू उसके चेहरे पर खिंच जाता। आँखें ढक जातीं, सिर्फ ठुड्डी और होंठों का किनारा दिखता। धीरू के रहते तो वो पूरे घूंघट में ही रहती — चलती, बोलती, खाना परोसती, सब घूंघट में। पल्लू सिर्फ धीरू के अकेले होने पर ही सरकता।
यही नियम अब नए शहर में भी आया था। और यही नियम उसे सबसे ज़्यादा गरम करता था — क्योंकि घूंघट के पीछे से सब कुछ देखा जा सकता था, पर खुद कोई नहीं देख सकता था। जेठ जी के सामने घूंघट ओढ़े रहना उसकी पतिव्रता का हिस्सा था… और अंदर बैठी रंडी के लिए ये घूंघट एक परदा बन गया था, जिसके पीछे वो अपनी हवस छुपा सकती थी।
धीरू के पास कुछ नहीं बचा था।
नौकरी चली गई — कंपनी ने बिना वजह काट दिया, एक महीने का वेतन भी रोक लिया। जमा दो महीने में खत्म हो गया। पहले किराया, फिर बिजली का बिल, फिर राशन। फिर राशन भी बंद, और दो हफ्ते दाल-चावल पर गुज़ारा। एक दिन श्वेता ने चीनी की डिब्बी खोली — सिर्फ चम्मच भर बची थी। उसने धीरू को बताया नहीं। बस चाय में आधी डाल दी।
अब जो बचा था, वो एक पुराने बैग में ठूंसा हुआ था।
मकान मालिक सीढ़ियों पर खड़ा था। मोटा आदमी, सफेद बनियान, और हर बार ऊपर आते हुए पहले श्वेता को देखता, फिर धीरू को।
"किराया नहीं है तो निकल जाओ। तीन दिन। तीन के बाद सामान बाहर।"
तीन दिन में धीरू ने अपने सारे नंबर छान मारे। कॉलेज के दोस्त — "देखते हैं भाई" — फोन काट दिया। रिश्तेदारों ने हाल पूछकर दुख जताया और कुछ नहीं किया। एक मौसेरे भाई ने कह दिया — "इस शहर में रहना ही क्यों है तुझे?"
तीसरे दिन शाम को धीरू बैठकर रोया।
रसोई की दीवार से टिका, घुटने सीने से लगाए, कंधे हिलते हुए। श्वेता उसके सामने फर्श पर बैठ गई और कुछ नहीं बोली। वो जानती थी, अब बोलने से कुछ नहीं होगा। आदमी जब टूटता है तो उसे एक ही चीज़ चाहिए — कोई जो चुपचाप बैठा रहे।
वो दस मिनट बैठी रही। रोना धीमा हुआ, फिर रुका। धीरू ने आस्तीन से नाक पोंछी और भैया को फोन किया।
सूर्या उसका सगा बड़ा भाई था। पांच साल बड़ा। बाप के मरने के बाद उसी ने धीरू को पढ़ाया — अपनी नौकरी से, अपने पैसे से, बिना एक बार शिकायत किए। उसी ने उसकी शादी करवाई। और फिर नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर चला गया।
अकेला रहता था। ठीक कंपनी, ठीक पैसा। शादी नहीं हुई — कभी नहीं हुई। किसी ने पूछा भी तो बस यही कहता — "देखेंगे।" इकतीस का था, और उसके पास एक अच्छा फ्लैट, एक गाड़ी, और बहुत सारी खाली शामें थीं।
"भैया।" धीरू की आवाज़ फोन पर टूट रही थी। "मेरा सब चला गया। तीन दिन में निकलना है।"
सूर्या एक पल चुप रहा। श्वेता ने वो चुप्पी सुनी और उसका पेट कस गया।
"आ जा।"
"भैया—"
"आ जा, धीरू। दो-चार महीने रुक। इंटरव्यू लगवा दूंगा।"
धीरू ने भरी आंखों से श्वेता की तरफ देखा। श्वेता बिस्तर के किनारे बैठी थी, हाथ गोद में। उसने बस सिर हिला दिया। हां।
श्वेता
शादी को तीन साल हो चुके थे और उसका शरीर उस तरह भरा हुआ था जैसे ब्याह के बाद औरत का शरीर भरता है — एक भी जगह ढीली नहीं, पर हर जगह पूरी। कमर पतली थी और कूल्हे उससे कहीं ज़्यादा चौड़े, और चूचियां इतनी भारी कि ब्लाउज़ हमेशा तना रहता और किनारों की त्वचा बाहर आ जाती।
उसका चेहरा गोल था। आंखें बड़ी, काजल के बिना भी गहरी, पलकें भारी। ऊपर का होंठ भरा हुआ — हमेशा थोड़ा खुला सा, जैसे सांस लेने में तकलीफ हो। माथे पर छोटी बिंदी, और बाल घने, काले, कमर तक।
वो चलती तो चूचियां हल्की सी झूलतीं और वो आदत से हाथ से उन्हें संभाल लेती — जैसे शर्म आ रही हो।
धीरू अच्छा आदमी था। भोला, मेहनती, बेहद बेपरवाह। कभी किसी से झगड़ा नहीं करता, कभी कुछ मांगता नहीं, अपनी चीज़ों से भी बेपरवाह — चश्मा कहीं रख देता और फिर ढूंढता रहता। शादी के तीन साल में उसने श्वेता को ठीक से देखा भी नहीं।
वो कभी नहीं जान पाया कि पत्नी के शरीर पर कहां क्या है। कहां छूने पर वो हंसती है, कहां सांस रोकती है, कहां उसकी कमर बिस्तर से उठ जाती है। रात को सब कुछ हो जाता था और वो करवट लेकर सो जाता था।
और श्वेता के अंदर एक पूरी दुनिया बंद पड़ी थी।
तीन साल
श्वेता पतिव्रता थी। सच्ची, बिना दिखावे के। उसे लगता था कि उसका शरीर सिर्फ धीरू का है और उसके बाद किसी को छूने का हक नहीं। तीन साल में किसी और आदमी को देखकर उसने कभी नहीं सोचा — "काश ये होता।"
पर उसका शरीर धीरू का नहीं था। उसका शरीर सिर्फ उसका था, और वो भूखा था।
धीरू महीने में एक या दो बार ही उसे चोदता था। वो भी बिना जल्दबाजी के नहीं — बल्कि बहुत जल्दी में। ऊपर आता, दो-तीन मिनट ठोकता, खत्म हो जाता। फिर उतरकर करवट ले लेता और दो मिनट में सो जाता।
वो कभी श्वेता की चूत नहीं चूमता। कभी उसकी चूचियों से नहीं खेलता — बस ऊपर से दबा देता और आगे बढ़ जाता। कभी गांड नहीं छूता। कभी कान में कुछ नहीं कहता। उसे पता ही नहीं था कि श्वेता को क्या चाहिए, और उसने कभी पूछने की ज़हमत भी नहीं की।
श्वेता हर बार आस लेकर लेटती। कि आज धीरे से होगा। आज वो उसे देखेगा। आज कुछ और करेगा। और हर बार दो मिनट में सब खत्म हो जाता और वो बिस्तर पर पड़ी छत देखती रह जाती।
उसका पेट कसा हुआ रहता। चूत में एक अधूरा सा भारीपन। और शरीर में एक खुजली जो मिटती ही नहीं।
कुछ रातों में वो हिम्मत करती — धीरू का हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रख देती। धीरू दो-चार बार उंगली चला देता, फिर उब जाता — "सो जाओ, सुबह जाना है।"
फिर श्वेता ने अपना हाथ पकड़ लिया।
अपना हाथ
धीरू के सो जाने के बाद, अंधेरे में, चादर के नीचे, वो अपनी पैंटी उतारती।
शर्माते हुए — जैसे कोई देख रहा हो। पैंटी घुटनों तक सरकती और वो उसे पैरों से निकालकर बगल में रख देती। फिर लेटी रहती, दो मिनट, सांस लेती हुई। जैसे खुद को तैयार कर रही हो।
फिर उसकी उंगली नीचे जाती। पहले धीरे, ऊपर से नीचे, चूत के होंठों पर। फिर अंदर।
वो हमेशा हल्की सी कराहती — बहुत धीमे, ताकि धीरू न जागे। और फिर उंगली चलाती। एक, फिर दो। और जब शरीर में कुछ कसने लगता तो दांतों में चादर का किनारा दबा लेती और तेज़ कर देती।
वो टूटती — बिना आवाज़ के। बस एक लंबी सांस, कांपता हुआ पेट, और फिर ढीला पड़ जाना।
और फिर उसे एक अजीब सी शर्म लगती। जैसे ये सब गलत कर रही हो। जैसे अच्छी बहू अपने हाथ से खुद को शांत नहीं करती।
एक बार उसने सोचा — अपने आप को देखती हुई। अंधेरे में, हाथ अपनी चूत पर, होंठ भींचे हुए, चादर मुंह में दबी हुई। और उसे लगा कि वो कोई और औरत है। कोई औरत जो बिस्तर पर अकेली है और भूखी है और अपने ही हाथों से खुद को शांत कर रही है।
उसने खुद को मन में एक नाम दिया — रंडी।
ये उसने किसी को नहीं बताया। पर अंदर ही अंदर वो जानती थी कि उसके शरीर में एक ऐसी औरत बैठी है जो शरीफ़ औरतों जैसी नहीं है — जिसे रोज़ चाहिए, जिसे ज़ोर चाहिए, जिसे छूना चाहिए, चूमना चाहिए, चोदना चाहिए। एक ऐसी औरत जो पति के दो मिनट से संतुष्ट नहीं होती।
वो बाहर से पतिव्रता थी और अंदर से रंडी। और यही उसका सबसे बड़ा दुख था।
घूंघट
श्वेता के लिए सूर्या सिर्फ पति का बड़ा भाई नहीं था।
वो उसका जेठ था — घर में ससुर के समान। रिश्ते में सास-ससुर के बाद सबसे ऊपर। श्वेता उसकी छोटी बहू थी, और जेठ के सामने बहू का एक अटल नियम था जो उसने ब्याह के पहले दिन से पाला था — घूंघट।
घर में जब भी सूर्या आता, श्वेता का पल्लू उसके चेहरे पर खिंच जाता। आँखें ढक जातीं, सिर्फ ठुड्डी और होंठों का किनारा दिखता। धीरू के रहते तो वो पूरे घूंघट में ही रहती — चलती, बोलती, खाना परोसती, सब घूंघट में। पल्लू सिर्फ धीरू के अकेले होने पर ही सरकता।
यही नियम अब नए शहर में भी आया था। और यही नियम उसे सबसे ज़्यादा गरम करता था — क्योंकि घूंघट के पीछे से सब कुछ देखा जा सकता था, पर खुद कोई नहीं देख सकता था। जेठ जी के सामने घूंघट ओढ़े रहना उसकी पतिव्रता का हिस्सा था… और अंदर बैठी रंडी के लिए ये घूंघट एक परदा बन गया था, जिसके पीछे वो अपनी हवस छुपा सकती थी।
