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Adultery छुपी हुई हवस
#1

पहला दिन
धीरू के पास कुछ नहीं बचा था।
नौकरी चली गई — कंपनी ने बिना वजह काट दिया, एक महीने का वेतन भी रोक लिया। जमा दो महीने में खत्म हो गया। पहले किराया, फिर बिजली का बिल, फिर राशन। फिर राशन भी बंद, और दो हफ्ते दाल-चावल पर गुज़ारा। एक दिन श्वेता ने चीनी की डिब्बी खोली — सिर्फ चम्मच भर बची थी। उसने धीरू को बताया नहीं। बस चाय में आधी डाल दी।
अब जो बचा था, वो एक पुराने बैग में ठूंसा हुआ था।
मकान मालिक सीढ़ियों पर खड़ा था। मोटा आदमी, सफेद बनियान, और हर बार ऊपर आते हुए पहले श्वेता को देखता, फिर धीरू को।
"किराया नहीं है तो निकल जाओ। तीन दिन। तीन के बाद सामान बाहर।"
तीन दिन में धीरू ने अपने सारे नंबर छान मारे। कॉलेज के दोस्त — "देखते हैं भाई" — फोन काट दिया। रिश्तेदारों ने हाल पूछकर दुख जताया और कुछ नहीं किया। एक मौसेरे भाई ने कह दिया — "इस शहर में रहना ही क्यों है तुझे?"
तीसरे दिन शाम को धीरू बैठकर रोया।
रसोई की दीवार से टिका, घुटने सीने से लगाए, कंधे हिलते हुए। श्वेता उसके सामने फर्श पर बैठ गई और कुछ नहीं बोली। वो जानती थी, अब बोलने से कुछ नहीं होगा। आदमी जब टूटता है तो उसे एक ही चीज़ चाहिए — कोई जो चुपचाप बैठा रहे।
वो दस मिनट बैठी रही। रोना धीमा हुआ, फिर रुका। धीरू ने आस्तीन से नाक पोंछी और भैया को फोन किया।
सूर्या उसका सगा बड़ा भाई था। पांच साल बड़ा। बाप के मरने के बाद उसी ने धीरू को पढ़ाया — अपनी नौकरी से, अपने पैसे से, बिना एक बार शिकायत किए। उसी ने उसकी शादी करवाई। और फिर नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर चला गया।
अकेला रहता था। ठीक कंपनी, ठीक पैसा। शादी नहीं हुई — कभी नहीं हुई। किसी ने पूछा भी तो बस यही कहता — "देखेंगे।" इकतीस का था, और उसके पास एक अच्छा फ्लैट, एक गाड़ी, और बहुत सारी खाली शामें थीं।
"भैया।" धीरू की आवाज़ फोन पर टूट रही थी। "मेरा सब चला गया। तीन दिन में निकलना है।"
सूर्या एक पल चुप रहा। श्वेता ने वो चुप्पी सुनी और उसका पेट कस गया।
"आ जा।"
"भैया—"
"आ जा, धीरू। दो-चार महीने रुक। इंटरव्यू लगवा दूंगा।"
धीरू ने भरी आंखों से श्वेता की तरफ देखा। श्वेता बिस्तर के किनारे बैठी थी, हाथ गोद में। उसने बस सिर हिला दिया। हां।
श्वेता
शादी को तीन साल हो चुके थे और उसका शरीर उस तरह भरा हुआ था जैसे ब्याह के बाद औरत का शरीर भरता है — एक भी जगह ढीली नहीं, पर हर जगह पूरी। कमर पतली थी और कूल्हे उससे कहीं ज़्यादा चौड़े, और चूचियां इतनी भारी कि ब्लाउज़ हमेशा तना रहता और किनारों की त्वचा बाहर आ जाती।
उसका चेहरा गोल था। आंखें बड़ी, काजल के बिना भी गहरी, पलकें भारी। ऊपर का होंठ भरा हुआ — हमेशा थोड़ा खुला सा, जैसे सांस लेने में तकलीफ हो। माथे पर छोटी बिंदी, और बाल घने, काले, कमर तक।
वो चलती तो चूचियां हल्की सी झूलतीं और वो आदत से हाथ से उन्हें संभाल लेती — जैसे शर्म आ रही हो।
धीरू अच्छा आदमी था। भोला, मेहनती, बेहद बेपरवाह। कभी किसी से झगड़ा नहीं करता, कभी कुछ मांगता नहीं, अपनी चीज़ों से भी बेपरवाह — चश्मा कहीं रख देता और फिर ढूंढता रहता। शादी के तीन साल में उसने श्वेता को ठीक से देखा भी नहीं।
वो कभी नहीं जान पाया कि पत्नी के शरीर पर कहां क्या है। कहां छूने पर वो हंसती है, कहां सांस रोकती है, कहां उसकी कमर बिस्तर से उठ जाती है। रात को सब कुछ हो जाता था और वो करवट लेकर सो जाता था।
और श्वेता के अंदर एक पूरी दुनिया बंद पड़ी थी।
तीन साल
श्वेता पतिव्रता थी। सच्ची, बिना दिखावे के। उसे लगता था कि उसका शरीर सिर्फ धीरू का है और उसके बाद किसी को छूने का हक नहीं। तीन साल में किसी और आदमी को देखकर उसने कभी नहीं सोचा — "काश ये होता।"
पर उसका शरीर धीरू का नहीं था। उसका शरीर सिर्फ उसका था, और वो भूखा था।
धीरू महीने में एक या दो बार ही उसे चोदता था। वो भी बिना जल्दबाजी के नहीं — बल्कि बहुत जल्दी में। ऊपर आता, दो-तीन मिनट ठोकता, खत्म हो जाता। फिर उतरकर करवट ले लेता और दो मिनट में सो जाता।
वो कभी श्वेता की चूत नहीं चूमता। कभी उसकी चूचियों से नहीं खेलता — बस ऊपर से दबा देता और आगे बढ़ जाता। कभी गांड नहीं छूता। कभी कान में कुछ नहीं कहता। उसे पता ही नहीं था कि श्वेता को क्या चाहिए, और उसने कभी पूछने की ज़हमत भी नहीं की।
श्वेता हर बार आस लेकर लेटती। कि आज धीरे से होगा। आज वो उसे देखेगा। आज कुछ और करेगा। और हर बार दो मिनट में सब खत्म हो जाता और वो बिस्तर पर पड़ी छत देखती रह जाती।
उसका पेट कसा हुआ रहता। चूत में एक अधूरा सा भारीपन। और शरीर में एक खुजली जो मिटती ही नहीं।
कुछ रातों में वो हिम्मत करती — धीरू का हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रख देती। धीरू दो-चार बार उंगली चला देता, फिर उब जाता — "सो जाओ, सुबह जाना है।"
फिर श्वेता ने अपना हाथ पकड़ लिया।
अपना हाथ
धीरू के सो जाने के बाद, अंधेरे में, चादर के नीचे, वो अपनी पैंटी उतारती।
शर्माते हुए — जैसे कोई देख रहा हो। पैंटी घुटनों तक सरकती और वो उसे पैरों से निकालकर बगल में रख देती। फिर लेटी रहती, दो मिनट, सांस लेती हुई। जैसे खुद को तैयार कर रही हो।
फिर उसकी उंगली नीचे जाती। पहले धीरे, ऊपर से नीचे, चूत के होंठों पर। फिर अंदर।
वो हमेशा हल्की सी कराहती — बहुत धीमे, ताकि धीरू न जागे। और फिर उंगली चलाती। एक, फिर दो। और जब शरीर में कुछ कसने लगता तो दांतों में चादर का किनारा दबा लेती और तेज़ कर देती।
वो टूटती — बिना आवाज़ के। बस एक लंबी सांस, कांपता हुआ पेट, और फिर ढीला पड़ जाना।
और फिर उसे एक अजीब सी शर्म लगती। जैसे ये सब गलत कर रही हो। जैसे अच्छी बहू अपने हाथ से खुद को शांत नहीं करती।
एक बार उसने सोचा — अपने आप को देखती हुई। अंधेरे में, हाथ अपनी चूत पर, होंठ भींचे हुए, चादर मुंह में दबी हुई। और उसे लगा कि वो कोई और औरत है। कोई औरत जो बिस्तर पर अकेली है और भूखी है और अपने ही हाथों से खुद को शांत कर रही है।
उसने खुद को मन में एक नाम दिया — रंडी।
ये उसने किसी को नहीं बताया। पर अंदर ही अंदर वो जानती थी कि उसके शरीर में एक ऐसी औरत बैठी है जो शरीफ़ औरतों जैसी नहीं है — जिसे रोज़ चाहिए, जिसे ज़ोर चाहिए, जिसे छूना चाहिए, चूमना चाहिए, चोदना चाहिए। एक ऐसी औरत जो पति के दो मिनट से संतुष्ट नहीं होती।
वो बाहर से पतिव्रता थी और अंदर से रंडी। और यही उसका सबसे बड़ा दुख था।
घूंघट
श्वेता के लिए सूर्या सिर्फ पति का बड़ा भाई नहीं था।
वो उसका जेठ था — घर में ससुर के समान। रिश्ते में सास-ससुर के बाद सबसे ऊपर। श्वेता उसकी छोटी बहू थी, और जेठ के सामने बहू का एक अटल नियम था जो उसने ब्याह के पहले दिन से पाला था — घूंघट।
घर में जब भी सूर्या आता, श्वेता का पल्लू उसके चेहरे पर खिंच जाता। आँखें ढक जातीं, सिर्फ ठुड्डी और होंठों का किनारा दिखता। धीरू के रहते तो वो पूरे घूंघट में ही रहती — चलती, बोलती, खाना परोसती, सब घूंघट में। पल्लू सिर्फ धीरू के अकेले होने पर ही सरकता।
यही नियम अब नए शहर में भी आया था। और यही नियम उसे सबसे ज़्यादा गरम करता था — क्योंकि घूंघट के पीछे से सब कुछ देखा जा सकता था, पर खुद कोई नहीं देख सकता था। जेठ जी के सामने घूंघट ओढ़े रहना उसकी पतिव्रता का हिस्सा था… और अंदर बैठी रंडी के लिए ये घूंघट एक परदा बन गया था, जिसके पीछे वो अपनी हवस छुपा सकती थी।
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#2

सुबह
सुबह आठ बजे धीरू निकला। जल्दी में दो रोटियाँ खाईं, चाय का आधा कप पिया, और दरवाज़े पर जूते पहनते हुए बोला — "तीन बजे का इंटरव्यू है।"

दरवाज़ा बंद हुआ। श्वेता ने चटकनी की आवाज़ सुनी और एक पल वहीं खड़ी रही।

फिर उसने अपना पल्लू देखा। घूंघट पहले से सिर पर था। अब घर में सिर्फ सूर्या था। यानी घूंघट का अब कोई मतलब नहीं था। पर श्वेता ने पल्लू उतारा भी नहीं। उसने बस उसे थोड़ा ऊपर सरकाया — इतना कि आँखें दिखने लगें। बाकी चेहरा ढका रहा।

वो रसोई में गई। गैस जलाई। दो कप निकाले। चाय की पत्ती, चीनी, दूध। धीरे-धीरे उबाला।

वो जानती थी कि सूर्या बैठक में है। और वो जानती थी कि जब भी बैठक में जाएगी, सूर्या की नज़र उस पर जाएगी।

आज उसने साड़ी नहीं पहनी थी। एक ढीला, हल्के नीले रंग का कुर्ता था, और उसका गला गहरा कटा हुआ था — इतना गहरा कि झुकने पर कुछ भी छिपा नहीं रहता। ब्लाउज़ गहरी लाल थी, और उसकी फीते पतली थीं, बस सहारे भर की।

श्वेता ने एक बार खुद को रसोई के शीशे में देखा। फिर दोनों कप उठाए।

बैठक में आते वक्त उसके कदम धीमे थे। सूर्या मेज़ पर लैपटॉप खोलकर बैठा था। उसने सिर उठाया और फिर नीचे कर लिया — पर उसका हाथ की-बोर्ड पर रुक गया।

श्वेता कुर्सी के पास नहीं गई। वो सीधे उसकी टेबल के किनारे आई और उस पर बैठ गई — आधा कूल्हा टेबल पर, आधा हवा में।

"भैया जी, चाय पी लीजिए। ठंडी हो जाएगी।"

उसने कप उसके सामने रखा। उसकी कलाई मेज़ के किनारे से रगड़ खाई।

सूर्या ने कप उठाया। "शुक्रिया।"

"चीनी कितनी डालूँ?"

"अरे, तुमने डाल दी है ना?"

"नहीं।" श्वेता ने कप की तरफ देखा। "आपने पहले कहा था दो चम्मच। मैंने सोचा आज पूछ लूँ।"

सूर्या ने एक पल उसे देखा। फिर बोला — "दो।"

श्वेता ने चीनी डालनी शुरू की। वो झुकी — पूरी कमर से, टेबल के ऊपर — और उसका पूरा सीना सूर्या के चेहरे के सामने आ गया।

कुर्ते का गला उसके कंधों से खिसक गया। ब्लाउज़ का कपड़ा तन गया। दोनों चूचियाँ भरी हुई थीं, और गहरी झुकाव में ब्लाउज़ के किनारे से त्वचा बाहर आ गई — गोरी, चिकनी, और बीच का गड्ढा साफ।

सूर्या ने सीधे देखना शुरू नहीं किया। उसने चाय की भाप की तरफ देखा, फिर नीचे — और फिर झटके से ऊपर।

श्वेता ने उसे पकड़ लिया।

"क्या हुआ?" उसने पूछा, बिना सिर उठाए।

"कुछ नहीं।"

"आपकी नज़र नीचे जा रही है।"

सूर्या हँसा — थोड़ा हड़बड़ाया हुआ। "चाय में कुछ गिरा तो नहीं?"

"नहीं।" श्वेता ने चम्मच डालकर धीरे-धीरे घुमाया — बहुत धीरे, जैसे हिसाब लगा रही हो। "तो कहाँ देख रहे हैं?"

"तुम्हें।"

"कहाँ?"

सूर्या ने गला साफ किया। "यहाँ।" उसने सीने की तरफ इशारा किया।

श्वेता ने घुमाना रोका। फिर उसने चम्मच को होंठों पर लगाकर चाटा और बाहर निकाला — और अब उसकी आँखें सीधे सूर्या की आँखों में थीं।

"अच्छा," उसने कहा। "तो देखिए ना। कोई मना कर रहा है?"

"तुम बैठी हो यहाँ।"

"हाँ।"

"मतलब?"

"मतलब…" श्वेता ने कप उसकी तरफ सरकाया। "…कुछ नहीं। चाय पीजिए।"

सूर्या ने कप उठाया और एक घूँट लिया। श्वेता उसी तरह झुकी रही — हाथ टेबल पर, कमर झुकी हुई, और सीना ठीक उसकी नज़र की ऊँचाई पर।

"कैसी है?" उसने पूछा।

"अच्छी है।"

"बहुत बढ़िया बना रही हूँ?"

सूर्या ने एक बार उसे देखा। "हाँ।"

श्वेता मुस्कुराई। फिर वो थोड़ी और पास झुकी — और उसकी बाँह सूर्या के कंधे को छू गई। वो वहीं रुकी रही, बिना हटे।

"भैया जी," उसने धीमे से कहा, "एक बात पूछूँ?"

"हाँ।"

"आप घर पर भी इतना ही चुप रहते थे। मेरे सामने तो कभी दो बात नहीं की।"

"तुम्हारे सामने?"

"हाँ।" उसकी उंगलियाँ सूर्या के कंधे पर थीं — और अब हल्का दबाने लगी थीं, बिना वजह। "भूल गए?"

"नहीं।"

"तो फिर?"

सूर्या ने कप नीचे रख दिया। "श्वेता।"

"हाँ?"

"तुम सामने आ जाती हो तो मैं क्या बोलूँ?"

श्वेता एक पल रुकी। ये जवाब उसने नहीं सोचा था।

"कुछ भी बोलिए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। "चुप मत रहिए।"

वो उठ खड़ी हुई — पर पूरी नहीं। बस आधी, कमर से — और उसका सीना सूर्या के चेहरे के पास आ गया, इतना पास कि सूर्या को उसकी त्वचा से आती साबुन की खुशबू मिली।

सूर्या ने सिर थोड़ा ऊपर किया।

"क्या बोलूँ?" उसने पूछा।

"जो मन करे।"

सूर्या ने एक पल देखा — चूचियों पर, फिर उसके चेहरे पर। "तुमने आज अच्छा कुर्ता पहना है।"

श्वेता हँसी। खुलकर — और वो हँसी कमरे में फैल गई।

"बस?" उसने कहा।

"बस।"

"अच्छा।" उसने कमर घुमाई और टेबल पर ही बैठ गई — दोनों टाँगें लटकती हुईं। "तो ये कुर्ता पसंद आया?"

"हाँ।"

"क्यों?"

सूर्या ने जवाब दिया — "क्योंकि इसका गला गहरा है।"

श्वेता ने ठुड्डी उठाई। "और गहरा गला अच्छा लगता है आपको?"

"हाँ।"

"तो फिर देखते रहिए।" उसने कंधे हिलाए और गला एक इंच और खिसक गया। "कपड़ा तो पहना ही इसी लिए है।"

सूर्या ने कप उठाया और बिना आँख हटाए पिया।

श्वेता ने अपना कप उठाया — और जब वो झुकी, तो उसकी चूचियाँ ब्लाउज़ के किनारे से और बाहर आ गईं, और गहरी झुकाव में उनका भारीपन साफ हो गया। उसने एक घूँट लिया और फिर कप गोद में रख दिया।

"भैया जी," उसने धीमे से कहा, "आपको पता है — धीरू को ये कुर्ता पसंद नहीं है।"

"क्यों?"

"कहते हैं ज़्यादा खुला है।"

"और तुम?"

"मुझे पसंद है।" उसने सूर्या की आँखों में देखा। "पहनने में अच्छा लगता है।"

"तो पहनो।"

"पहनती हूँ।" वो थोड़ी आगे झुकी — कोहनी घुटने पर, और अब उसका सीना और भरकर आगे आ गया। "पर घर पर कोई देखता नहीं। धीरू को फर्क नहीं पड़ता।"

"अब देखता है।"

श्वेता ठिठकी। फिर उसकी आँखें मुलायम हो गईं।

"हाँ," उसने कहा। "अब देखता है।"

वो एक पल वैसे ही बैठी रही। फिर उसने अपना कप उठाकर सूर्या की तरफ बढ़ा दिया।

"एक घूँट लीजिए मेरे कप से।"

सूर्या ने देखा — वो उसी कप से पी चुका था जिसे धीरू ने छोड़ा था। फिर भी उसने हाथ बढ़ाया।

पर श्वेता ने कप नहीं छोड़ा।

"पकड़िए मत," उसने कहा। "ऐसे ही पीजिए।"

सूर्या को झुकना पड़ा। श्वेता ने कप उसके मुँह से लगाया और थोड़ा टेढ़ा किया — इतना कि चाय उसके होंठों तक आए और न गिरे।

सूर्या ने घूँट लिया।

श्वेता ने कप नहीं हटाया। वो देख रही थी — उसके होंठ, उसका गला, जो घूँट के साथ हिला।

"और?" उसने पूछा।

"और क्या?"

"और घूँट।"

सूर्या ने फिर पिया। इस बार श्वेता का हाथ कप पर थोड़ा काँपा और चाय की एक बूँद सूर्या की ठुड्डी पर गिर गई।

"ओह," श्वेता ने कहा, और उसकी आवाज़ में हल्की घबराहट थी। "गिर गई।"

उसने अपना अंगूठा उठाया और सूर्या की ठुड्डी से बूँद पोंछ दी। अंगूठा वहीं रुक गया — ठुड्डी के नीचे, गले के पास।

सूर्या ने साँस रोक ली।

श्वेता ने अंगूठा नहीं हटाया। उसकी आँखें सूर्या की आँखों में थीं और उसका अंगूठा उसकी ठुड्डी पर था, और बीच में सिर्फ कप था।

"श्वेता," सूर्या ने धीमे से कहा।

"हाँ।"

"तुम्हारा अंगूठा वहीं है।"

"पता है।" उसने हल्का सा दबाया। "हटा दूँ?"

"नहीं।"

श्वेता मुस्कुराई और धीरे-धीरे अंगूठा नीचे सरकाया — ठुड्डी से गले तक — और फिर हटा लिया। उसकी उंगली पर चाय की चिकनाई थी और उसने उसे अपने कुर्ते के गले पर पोंछ दिया — ठीक चूचियों के बीच।

सूर्या की नज़र उसकी उंगली के साथ गई और वहीं रुक गई।

श्वेता ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना कप उठाया, घूँट लिया, और टेबल पर वापस रख दिया।

"चाय ठंडी हो रही है," उसने कहा। "आपकी भी।"

सूर्या ने अपना कप उठाया और खत्म कर दिया।

"अब?" उसने पूछा।

"अब क्या?"

"अब क्या करूँ?"

श्वेता ने कंधा उचका और टेबल से उतर गई। उसके पैर फर्श पर पड़े और वो सूर्या के सामने खड़ी हो गई — बस एक कदम दूर।

"अब काम कीजिए," उसने कहा। "दोपहर में तीन बजे तक धीरू आएगा नहीं।"

वो मुड़ी और चलने लगी।

"श्वेता।"

वो रुकी — पर पलटी नहीं।

"हाँ?"

"तीन बजे तक?"

"हाँ।"

"इतना लंबा वक्त है।"

श्वेता मुस्कुराई — उसकी पीठ सूर्या की तरफ थी, इसलिए सूर्या ने वो मुस्कान नहीं देखी, पर उसकी आवाज़ में थी।

"है ना," उसने कहा। "देखिए क्या करते हैं आप।"

और वो रसोई में चली गई, और कप सिंक में रखकर पानी के नल की आवाज़ करने लगी — जैसे कुछ हुआ ही न हो।

सूर्या कुछ देर उसी जगह बैठा रहा, हाथ टेबल पर, और अपनी ठुड्डी को महसूस करता रहा जहाँ श्वेता का अंगूठा था।

लैपटॉप की स्क्रीन कब बंद हो गई, उसे पता ही नहीं चला।

रात का खाना
शाम सात बजे धीरू लौटा।

दरवाज़े की आवाज़ सुनकर श्वेता रसोई से निकली। पल्लू पहले से सिर पर था — पूरा घूंघट, चेहरा ढका हुआ, सिर्फ ठुड्डी का किनारा। जैसे ही धीरू अंदर आया, उसने पल्लू को और नीचे खींच लिया — आंखें भी ढक गईं।

"आ गए," उसने कहा।

"हां।" धीरू ने जूते उतारे, सोफ़े पर बैठ गया, और सिर पीछे टिका दिया। उसके चेहरे पर थकान और मायूसी थी। "कुछ नहीं हुआ आज भी।"

"इंटरव्यू?"

"बकवास। पूछा — 'आपने दो महीने क्या किया?'" धीरू हंसा — बिना मज़े का हंसी। "क्या बताता? कि रोया?"

श्वेता कुछ नहीं बोली। वो रसोई में लौट गई और खाना परोसने लगी।

रोटी बेली, सब्ज़ी में तड़का लगाया, दाल छानी, और एक थाली में सजाया। हर चीज़ सावधानी से।

फिर उसने सूर्या के कमरे की तरफ देखा। दरवाज़ा बंद था, पर अंदर से लैपटॉप की रोशनी दिख रही थी।

श्वेता ने थाली उठाई और बाहर आई।

"भैया जी," उसने सूर्या के दरवाज़े पर आवाज़ दी।

"हां, आ रहा हूं।"

वो आया। श्वेता ने उसे देखा — घूंघट के पीछे से — और फिर मुड़कर खाने की मेज़ की तरफ चली। सूर्या उसके पीछे आया।

तीनों बैठे। श्वेता ने पहले सूर्या की थाली लगाई — परोसने का क्रम यही था अब, धीरू को फर्क नहीं पड़ता था।

उसने सूर्या की थाली में रोटी रखी। दाल डाली। फिर सब्ज़ी की कटोरी उठाई और झुककर उसकी थाली में डालने लगी।

और वहीं, झुकते हुए, उसने अपना कोण बदला।

वो सीधे आगे से नहीं झुकी — वो सूर्या की तरफ से झुकी, कमर से मुड़कर। इससे उसका पूरा सीना सूर्या की आंखों के ठीक सामने आ गया। पल्लू के नीचे उसकी चोली का गोल घेरा तन गया — पूरा भरा हुआ, गोल, और गहरी झुकाव में भारीपन साफ हो गया। चोली के किनारे पर त्वचा बाहर निकल आई थी — एक मोटी गोल लकीर, जो झुकने के साथ और उभर आई।

सूर्या ने थाली की तरफ देखा। फिर उसकी नज़र फिसल गई — और वो एक सेकंड के लिए वहीं रुक गई।

श्वेता ने देखा — घूंघट के पीछे से — कि जेठ जी ने कहां देखा।

उसने सब्ज़ी डाली, और उठने से पहले दूसरी तरफ भी थोड़ी झुकी — जैसे कुछ छूट गया हो। अब दूसरी चोली भी सामने आ गई। दोनों।

"रोटी और लगा दूं?" उसने पूछा।

"ना, इतना काफी है," सूर्या ने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी भारी थी।

श्वेता उठी। फिर धीरू की थाली लगाई — इस बार सीधे झुकी, बिना कोण के। धीरू को देखना नहीं था।

"तू भी बैठ," धीरू ने कहा।

"पहले आप खा लीजिए।"

"बैठ ना।"

श्वेता बैठ गई — सूर्या के बगल में, एक कुर्सी की दूरी पर। घूंघट में।

धीरू खाने लगा। सूर्या भी।

"आज इंटरव्यू में क्या पूछा?" श्वेता ने पूछा — बस बात बनाने के लिए।

धीरू ने मुंह भरकर बताया। वो बोलता रहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो हार से आती है। श्वेता सुनती रही और बीच-बीच में हां करती रही।

पर उसका ध्यान सूर्या पर था।

सूर्या ने रोटी तोड़ी और सब्ज़ी में डुबोई। रोटी का टुकड़ा सब्ज़ी से भीगा हुआ था, और जब उसने उठाया, उसमें से एक बूंद टपकी — थाली पर।

श्वेता ने देखा और उसने बिना सोचे हाथ बढ़ाया — थाली के किनारे पर कपड़ा रखा था, उसे उठाकर पोंछने के लिए झुकी।

और जब वो झुकी, उसकी कोहनी मेज़ के किनारे से टकराई।

कटोरी हिली।

सब्ज़ी की एक लकीर उछली और सीधे उसकी चोली पर गिरी — बाएं सीने के ऊपर, और कुछ नीचे पेट तक।

"अरे!" श्वेता उठ खड़ी हुई।

"लग गई?" धीरू ने पूछा, बिना ज़्यादा ध्यान दिए।

"हां…" श्वेता ने अपनी चोली देखी। गाढ़ी सब्ज़ी का धब्बा कपड़े पर फैल रहा था — गरम, चिकना, और साफ दिखता हुआ।

"जा, बदल ले," धीरू ने कहा। "खाना ठंडा हो जाएगा।"

"हां।" श्वेता ने एक पल सूर्या की तरफ देखा — घूंघट के पीछे से — और फिर मुड़कर अंदर चली गई।

कमरे में
श्वेता अपने कमरे में गई।

उसने दरवाज़ा खोला — और फिर उसे बंद नहीं किया। खुला छोड़ दिया, पूरा खुला। फिर वो अंदर गई और अलमारी के सामने खड़ी हो गई।

अलमारी में शीशा लगा था।

और शीशे के कोण से उसकी नज़र हॉल तक जाती थी। वो जानती थी कि दरवाज़े से क्या दिखता है। वो जानती थी कि दरवाज़े से उसकी पीठ दिखेगी।

वो जान-बूझकर अलमारी के सामने खड़ी हुई — दरवाज़े की तरफ पीठ करके, पर शीशे में सामने देखती हुई।

और उसने चोली के हुक खोले।

एक। दो। तीन।

गीला कपड़ा सीने से चिपका हुआ था और धब्बे के आसपास गाढ़ा था। हुक खुलते ही चोली ढीली पड़ी और फिर सरककर गिर गई।

श्वेता ने उसे हाथ में लिया और अलमारी के दराज़ पर रख दिया।

अब उसकी पीठ पूरी नंगी थी।

सूर्या की नज़र दरवाज़े पर गई।

वो एक सेकंड के लिए रुकी, फिर वहीं टिक गई।

श्वेता की पीठ — पूरी नंगी, गोरी, चिकनी। कंधे गोल। रीढ़ की सीधी लकीर जो बीच में गहरी होकर नीचे जाती थी। और कमर — पतली, और फिर कूल्हों पर फैलती हुई।

वो अलमारी के सामने खड़ी थी और कुछ ढूंढ रही थी — एक दराज़ खोली, फिर बंद की। उसकी पीठ के साथ-साथ मांसपेशियां हिल रही थीं। कंधे के ब्लेड उभर रहे थे और फिर गायब हो रहे थे।

सूर्या ने रोटी का टुकड़ा उठाया और भूल गया कि उसे खाना है।

धीरू कुछ बोल रहा था। सूर्या सुन नहीं रहा था।

"भैया?"

"हां?"

"सुन रहा है?"

"हां।"

धीरू फिर बोलने लगा।

श्वेता ने शीशे में देखा — दरवाज़े की तरफ।

सूर्या की नज़र वहीं थी।

उसके होंठों पर एक बारीक मुस्कान आई। उसने ढूंढना जारी रखा — जैसे कुछ नहीं हुआ — पर अब उसने धीरे-धीरे काम करना शुरू किया। एक दराज़ खोली, हाथ अंदर डाला, कुछ हिलाया, और बंद कर दिया। फिर अगली।

उसने एक ब्लाउज़ निकाला — गहरे हरे रंग की, और उसे खोलकर देखा।

फिर उसे वापस रख दिया।

फिर दूसरी निकाली — काली। देखी। वापस रख दी।

वो जानती थी कि सूर्या देख रहा है, और वो जानती थी कि उसे उतनी देर तक पीठ दिखानी है जितनी देर में सूर्या की नज़र पूरी हो जाए।

उसने एक ब्लाउज़ निकाला — गहरे लाल रंग की, और उसे अलमारी के दरवाज़े पर टांग दिया।

फिर वो मुड़ी।

वो पूरी नहीं मुड़ी। बस आधी — कमर से — और रुक गई।

उसका एक कंधा अब दरवाज़े की तरफ था और उसकी छाती का आधा हिस्सा भी।

और आधा मुड़ने से उसका एक स्तन पूरी तरह प्रोफ़ाइल में आ गया — किनारे से।

सूर्या ने सांस रोक ली।

वो भारी था और आधा गोल — ऊपर से नीचे तक एक साफ, भरे हुए आधे-चांद की लकीर। बिना चोली, बिना सहारे के, वो अपने भार से हल्का सा लटका हुआ था और उसका आकार साफ दिख रहा था — गोल, और नीचे की तरफ भारी।

निप्पल किनारे पर था — गहरा, और हवा से सख्त। उसके चारों तरफ की त्वचा सिकुड़ी हुई थी।

श्वेता ने देखा कि सूर्या की नज़र कहां है।

उसने कोई जल्दी नहीं की।

उसने ब्लाउज़ उठाया — वो लाल वाली — और उसे सामने लगाकर देखा, जैसे नाप रही हो। वो हाथ में लेकर घूमी, पर फिर भी आधी मुड़ी रही, इसलिए उसका स्तन पूरी तरह सामने आ गया — और वो पूरा गोल, भारी, ऊपर उठा हुआ दिखा।

सूर्या ने चम्मच नीचे रख दिया।

"भैया, खा," धीरू ने कहा।

"खा रहा हूं।"

"चम्मच रख दी।"

"हां।"

धीरू ने कुछ नहीं सोचा।

श्वेता ने ब्लाउज़ वापस टांग दिया और एक दूसरी निकाली — काली, और उसे सामने रखकर देखा।

फिर उसने उसे हाथ में लिया और आईने के सामने खड़ी हो गई।

वो पूरी मुड़ गई — और उसका पूरा सीना सामने आ गया।

सूर्या ने देखा — दोनों। भारी, गोल, और उसके पेट पर हल्की सी झुकी हुई। निप्पल गहरे और सख्त, और उन पर दिन भर की थकान की हल्की चमक।

श्वेता ने ब्लाउज़ पहनना शुरू किया। एक बांह डाली, फिर दूसरी। कपड़ा सीने पर चढ़ा और चूचियों को ढकने लगा।

पर उसने हुक नहीं लगाए।

वो शीशे के सामने खड़ी रही और अपने बाल देखने लगी — जो पल्लू के नीचे से आकर उसके कंधों पर गिर रहे थे।

और फिर उसने एक बात सोची।

उसने बालों की एक लट उठाई।

और उसने उसे अपने सीने पर लिटा दिया — बाएं स्तन के ऊपर, आड़ा। फिर दूसरी लट, फिर तीसरी। उसने एक-एक करके अपने बाल सीने पर बिखेर दिए — और धीरे-धीरे उन्हें ऐसे सजाया कि वो परदे की तरह लटकने लगे।

उसके घने काले बाल उसके सीने को ढकने लगे — कुछ जगह से, कुछ से नहीं। बालों के फासलों से त्वचा दिखती रही और छिपती रही, और बालों के नीचे उसका सीना और भारी लगने लगा।

वो शीशे में देखकर मुस्कुराई।

फिर उसने ब्लाउज़ के हुक लगाए — पर सिर्फ दो, नीचे के। ऊपर का गला खुला छोड़ दिया।

श्वेता ने अलमारी से एक और ब्लाउज़ निकाली।

गहरी नीली, और बहुत गहरे गले की। इतनी गहरी कि सीने का ऊपरी आधा हिस्सा ढकता ही नहीं। और कपड़ा पतला था — जिस पर शरीर की लकीरें दिख जाती थीं।

उसने पहले वाली ब्लाउज़ उतार दी और नीली पहन ली।

और उसने ब्रा नहीं पहनी।

क्योंकि ब्रा पहनने से गहरा गला बेकार हो जाता। बिना ब्रा में उसका सीना कपड़े के नीचे अपने भार से लटका और गोल दिखता रहा — और कपड़ा उन पर तना हुआ, दोनों जगह उभार बनाकर।

उसने हुक लगाए और कपड़ा सीने पर कस गया।

फिर उसने अपने बाल सामने से पीछे किया — और सीना फिर खुल गया, बिना बालों के परदे के। ब्लाउज़ के गहरे गले में सीने का ऊपरी हिस्सा, और नीचे दोनों उभारों की गोलाइयां साफ।

श्वेता ने शीशे में खुद को देखा। फिर वो मुड़ी और दरवाज़े की तरफ चली।

वो हॉल में आई।

धीरू ने देखा और बस इतना कहा — "अच्छा रंग है।"

"हां," श्वेता ने कहा।

सूर्या ने देखा और कुछ नहीं कहा।

श्वेता ने उसकी थाली में फिर से परोसना शुरू किया — और इस बार जब वो झुकी, तो उसने कोण नहीं बदला। सीधे झुकी, आगे से।

और गहरे गले वाली ब्लाउज़ में झुकते हुए उसका पूरा सीना सूर्या के सामने खुल गया — बिना ब्रा, बिना सहारे, और भार से नीचे की तरफ खिंचा हुआ। कपड़ा तन गया और उभार और गोल हो गए। ऊपर का हिस्सा गले से बाहर आ गया।

सूर्या ने कांटा पकड़ा और भूल गया कि उसे क्या करना है।

"रोटी?" श्वेता ने पूछा।

"हां… हां।"

उसने रोटी रखी। फिर दाल। फिर सब्ज़ी।

"और लगा दूं?"

"ना।" सूर्या ने एक पल रुककर कहा। "पर…"

"पर?"

"तुम बैठ जाओ।"

श्वेता बैठ गई। और अब उसने सूर्या के बगल वाली कुर्सी नहीं चुनी — वो सीधे उसके सामने बैठ गई, कुर्सी खींचकर, और घुटने उसकी तरफ किए।

घूंघट उसने ओढ़ लिया था — पर पल्लू पतला था, और गहरे गले वाली ब्लाउज़ का सीना घूंघट के नीचे से दिख रहा था, धुंधला सा।

"खा लीजिए," उसने कहा।

सूर्या खाने लगा। उसकी नज़र बार-बार उठ रही थी।

धीरू ने अपनी थाली खत्म की और उठ गया। "सोने जा रहा हूं," वो बोला। "थका हूं।"

"हां, जाओ," श्वेता ने कहा।

धीरू चला गया।

श्वेता वहीं बैठी रही — सूर्या के सामने — और उसने अपना पल्लू उतार दिया।

"अब घूंघट की ज़रूरत नहीं," उसने कहा। "वो सो गया।"

और वो सीधी होकर बैठ गई, दोनों हाथ गोद में, और सूर्या की आंखों में देखा।

"अब देखिए," उसने कहा। "जितना देखना है देख लीजिए।"
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#3

बाथरूम
सूर्या बाथरूम के दरवाज़े के पास खड़ा था। अंदर से पानी की आवाज़ आ रही थी — लगातार, धीमी, और किसी अजीब कारण से उसके कानों में गूँज रही थी। भाप दरवाज़े की छोटी-छोटी दरारों से बाहर रिस रही थी। वह कुछ देर वहीं रुका रहा। मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। श्वेता उसकी छोटी भाभी थी। धीरू की बीवी। शादी को अभी बस कुछ महीने ही हुए थे। घर में जब भी वह पास से गुज़रती, सूर्या की नज़रें अनजाने में उसकी ओर चली जातीं — उसकी हल्की मुस्कान, साड़ी में बंधी पतली कमर, या फिर जब वह बाल खुले रखकर घर में घूमती थी।

लेकिन आज यह अहसास और तीव्र था।

अंदर से अचानक आवाज़ आई। नरम, थोड़ी हिचकती हुई।

"भैया जी… मैं नहा रही हूँ।"

सूर्या ने तुरंत जवाब दिया। आवाज़ को सामान्य रखने की कोशिश करते हुए, "हाँ-हाँ, नहा लो। मैं बाहर ही हूँ।"

वह वहीं खड़ा रहा। दीवार के सहारे। दस मिनट बीत गए। पानी की आवाज़ जारी थी। कभी-कभी साबुन की डिश हिलने की हल्की आवाज़ आ जाती। सूर्या का गला सूखा-सूखा लग रहा था। वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देखता और फिर नज़रें फेर लेता।

फिर धीमी, थोड़ी काँपती हुई आवाज़ आई—

"भैया जी…?"

"हाँ?"

"एक मिनट के लिए… आइए ना…"

सूर्या का दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसने एक कदम बढ़ाया। "क्या हुआ? सब ठीक है न?"

"हाँ… बस… आइए ना। ज़रा एक काम है।"

वह अंदर गया। दरवाज़ा पीछे से हल्का सा बंद हो गया। बाथरूम भाप से पूरी तरह भरा हुआ था। गर्म पानी की भाप से सब कुछ धुँधला और सपने जैसा लग रहा था। श्वेता का सिर दरवाज़े की तरफ निकला हुआ था — बाल पूरी तरह गीले, माथे और गालों पर पानी की बूँदें चिपकी हुईं, और आँखों में साफ़ शर्म। वह उसकी आँखों में सीधे नहीं देख पा रही थी। नज़रें बार-बार झुक जा रही थीं।

"मेरी पीठ का… हिस्सा है," उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। आवाज़ में शर्म इस कदर घुली हुई थी कि शब्द लगभग फुसफुसाहट बन गए थे। "हाथ नहीं पहुँच रहा। बहुत दिनों से दर्द हो रहा है वहाँ। ज़रा… मल देंगे क्या?"

सूर्या का गला एकदम सूख गया। वह कुछ पल बस देखता रहा। श्वेता ने अपनी पीठ उसकी तरफ कर ली थी। पानी उसकी गर्दन से नीचे बह रहा था — गर्दन की हल्की रेखा से लेकर कंधों तक, फिर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ कमर तक। गीली पीठ चमक रही थी। कंधे गोल और चिकने। कमर पतली और थोड़ी अंदर को धँसी हुई। और उससे नीचे भरे हुए कूल्हे — पानी की धार के साथ और भी उभरे और गोल लग रहे थे। कोई कपड़ा नहीं था। सिर्फ गीला, चमकता शरीर। भाप में वह और भी अवास्तविक लग रही थी।

"हाँ… हाँ," सूर्या की आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी। "अंदर… आ जाऊँ?"

"आइए ना…" श्वेता की आवाज़ में शर्म के साथ एक अजीब-सी नर्वस हल्की हँसी भी थी। "दरवाज़ा बंद कर लीजिए… भाप बाहर चली जाएगी।"

सूर्या अंदर चला गया। शॉवर चल रहा था। पानी की धार श्वेता की पीठ पर गिर रही थी और फिर नीचे की तरफ बह रही थी। उसने साबुन उठाया। हाथ काँप रहे थे। साबुन को पानी में गीला किया। झाग बनने लगा। फिर बहुत धीरे से, जैसे छूने में भी संकोच हो, श्वेता की पीठ पर रखा।

जैसे ही उसका हाथ लगा, श्वेता की साँस एकदम रुक गई। उसके कंधे थोड़े सिकुड़ गए। उसने आँखें बंद कर लीं। माथा दीवार की तरफ झुका लिया।

सूर्य ने धीरे-धीरे साबुन को कंधों पर फेरना शुरू किया। गोलाकार गति में। बहुत धीमे। जैसे वह जल्दी में न हो। झाग बनने लगा — सफ़ेद, गाढ़ा। उसकी हथेली श्वेता की गीली त्वचा पर फिसल रही थी। वह ऊपर से नीचे — कंधे से रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ साबुन लगा रहा था। हर बार जब उसका हाथ थोड़ा नीचे जाता, श्वेता की कमर हल्की-सी सिकुड़ जाती। कभी-कभी उसकी साँस काँप जाती।

"यहाँ…" श्वेता ने कंधे के नीचे उँगली रखी। उँगली भी काँप रही थी। "बहुत नीचे नहीं… बस यहीं। रात भर दर्द हो रहा था।"

सूर्य ने उसी जगह साबुन को और देर तक फेरा। उसकी उँगलियाँ अब धीरे-धीरे किनारों की तरफ फैल रही थीं। पीठ के दोनों तरफ। जहाँ से शरीर की गोलाई शुरू होती थी। पानी और झाग के नीचे वह नरम, गोल हिस्सा साफ़ महसूस हो रहा था — साइड बूब्स की शुरुआत। सूर्या का हाथ एक बार अनजाने में थोड़ा और साइड में चला गया। उँगलियाँ उस नरम मांस को हल्के से दबा गईं।

श्वेता की साँस अटक गई। उसने कुछ नहीं कहा। सिर्फ सिर थोड़ा और झुका लिया। गर्दन तक लाल हो गई थी। लेकिन उसने सूर्या का हाथ नहीं हटाया।

सूर्य ने हाथ वापस बीच में ले लिया। लेकिन मन नहीं माना। फिर से साबुन लगाया — इस बार और धीरे। कंधे से शुरू करके रीढ़ के साथ नीचे। कमर की गहरी खाई तक। उसकी उँगलियाँ अब कमर के गड्ढे में घूम रही थीं। झाग वहाँ जमा हो रहा था। सफ़ेद रेखा बन गई थी। फिर हाथ और नीचे सरक गया — ठीक उस जगह जहाँ पीठ खत्म होकर कूल्हों की गोलाई शुरू होती थी। साबुन की परत अंस क्रैक के ऊपरी हिस्से तक पहुँच गई।

श्वेता की कमर एकदम तन गई। उसने बहुत हल्की सी आवाज़ में कहा, "भैया जी… बहुत नीचे हो गया…"

आवाज़ में शिकायत कम, और शर्म ज्यादा थी।

"सॉरी…" सूर्या की आवाज़ सूखी निकली। लेकिन हाथ पूरी तरह हटाया नहीं। वह फिर से ऊपर की तरफ साबुन लगाने लगा। इस बार और ज्यादा देर तक कंधों और पीठ के ऊपरी हिस्से पर रुक-रुक कर। उसकी हथेली बार-बार साइड की तरफ फिसल जाती। हर बार श्वेता की साइड बूब्स की नरम गोलाई उसकी उँगलियों के नीचे आ जाती। वह जानबूझकर नहीं कर रहा था… या शायद कर रहा था। हर बार श्वेता की साँस थोड़ी भारी हो जाती।

"आपके हाथ… बहुत गरम हैं," श्वेता ने बहुत धीमे से कहा। आवाज़ में शर्म के साथ एक अजीब-सी नमी थी। "और… भारी भी।"

"मज़ाक कर रही हो…"

"नहीं। सच में।" उसने कंधे पर से थोड़ा पीछे मुड़कर देखा। आँखें गीली थीं — पानी से या किसी और चीज़ से। गाल पूरी तरह लाल। "बहुत अच्छा लग रहा है। किसी ने इतने दिनों से… पीठ नहीं दबाई थी।"

सूर्य चुपचाप साबुन लगाता रहा। उसकी नज़र बार-बार श्वेता की गीली पीठ, चमकती कमर और पानी की धार के साथ बहते झाग पर जा रही थी। साइड से उसकी छाती की गोलाई साफ़ झलक रही थी। ब्रा या कोई कपड़ा नहीं था। सिर्फ गीली त्वचा। पानी की बूँदें वहाँ से फिसलकर नीचे जा रही थीं। सूर्या की उँगलियाँ अनजाने में फिर से उस गोलाई की तरफ बढ़ गईं। इस बार थोड़ा और अंदर तक। श्वेता ने आँखें बंद कर लीं। होंठ भींच लिए। लेकिन मना नहीं किया।

थोड़ी देर और बीती। सूर्या के हाथ अब और आराम से, और देर तक उसके शरीर पर घूम रहे थे। कभी कंधे पर रुक जाते, कभी कमर की हड्डी पर। कभी साइड की नरम गोलाई को हल्के से दबाते। श्वेता हर बार हल्की-सी काँप जाती। उसकी साँसें अब पहली से ज्यादा भारी थीं। कभी-कभी वह अपना वजन एक पैर से दूसरे पैर पर डाल लेती — जैसे खड़ी रहना भी मुश्किल हो रहा हो।

"भैया जी…" उसने बहुत देर बाद आवाज़ दी। आवाज़ में शर्म और थकान दोनों थे। "अब… अब काफी है शायद।"

सूर्या के हाथ रुक गए। लेकिन हटाए नहीं। वे अभी भी उसकी कमर पर थे। झाग के नीचे।

"हाँ…" उसने धीरे से कहा। "काफी है।"

दोनों कुछ पल वैसे ही रहे। पानी गिरता रहा। भाप घूमती रही। श्वेता की पीठ अभी भी उसकी तरफ थी। सूर्या के हाथ अभी भी उसकी त्वचा पर थे। कोई नहीं हिला। कोई नहीं बोला। बस दोनों की साँसें एक-दूसरे को महसूस कर रही थीं।

आखिर में सूर्या ने धीरे से हाथ हटाए। साबुन को वापस रख दिया। उसकी उँगलियाँ अभी भी गीली और चिकनी थीं। श्वेता की खुशबू उनमें समाई हुई थी।

"मैं… निकल जाऊँ?" उसने पूछा। आवाज़ में एक अजीब-सा अटकाव था।

श्वेता ने सिर हल्का-सा हिलाया। अभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। "हाँ… जाइए। मैं… मैं अभी आती हूँ।"

सूर्या ने दरवाज़ा खोला। बाहर की ठंडी हवा ने उसके गरम शरीर को छूआ। वह बाहर आया और दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया। पीछे बाथरूम में पानी की आवाज़ जारी रही।

वह दीवार के सहारे खड़ा रहा। आँखें बंद कीं। हाथ अभी भी काँप रहे थे। उँगलियों पर श्वेता की गीली त्वचा का अहसास बाकी था। और वह जानता था कि अब वह अहसास आसानी से जाने वाला नहीं था।

अंदर श्वेता अभी भी उसी पोजीशन में खड़ी थी। माथा दीवार से सटाए हुए। साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। लेकिन शरीर में एक अजीब-सी गर्मी बाकी थी — वहाँ जहाँ सूर्या के हाथ रुके थे। उसने आँखें खोलीं और नीचे देखा। अपनी ही त्वचा पर बचे झाग को। फिर धीरे से पानी के नीचे सिर डाल लिया। जैसे शर्म को धो देना चाहती हो।

लेकिन शर्म धुलने वाली नहीं थी।
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#4

रात
रात गहर चुकी थी।

घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। धीरू थककर सो चुका था। पाँच मिनट में ही सब खत्म करके वह गहरी नींद में चला गया था। श्वेता उसके बगल में लेटी रही। आँखें खुली हुईं। शरीर में एक अजीब-सी बेचैनी फैली हुई थी।

पूरा दिन बाथरूम वाला अहसास उसके शरीर में घूमा रहा था। सूर्या के हाथों का गर्म स्पर्श, साबुन की चिकनाहट, जब उसकी उँगलियाँ अनजाने में साइड की गोलाई तक पहुँच गई थीं… वह सब बार-बार याद आ रहा था। धीरू के जल्दी सो जाने के बाद वह बेचैनी और बढ़ गई थी। जाँघों के बीच हल्की गर्मी थी, जो शर्म के बावजूद शांत नहीं हो रही थी।

वह उठ बैठी। धीरू की साँसें भारी और समान थीं। वह गहरी नींद में था। श्वेता ने धीरे से चादर हटाई और पैरों में चप्पल लिए बिना बाहर निकली। गलियारा अँधेरा था। सूर्या के कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।

वह रूक गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मन में आवाज़ आ रही थी — "वापस चली जा… ये गलत है…" लेकिन पैर बढ़ते चले गए।

कमरे में हल्की रोशनी थी। सूर्या बिस्तर पर लेटा था। सिर्फ लुंगी पहने हुए। ऊपर का पूरा शरीर नंगा था। छाती धीरे-धीरे उठ-गिर रही थी। नशे की वजह से उसकी नींद गहरी लग रही थी। लुंगी कमर पर हल्की-सी बैठी थी। और उसके नीचे… स्पष्ट उभार दिख रहा था।

श्वेता का गला सूख गया। वह दरवाज़े के पास खड़ी रही। कुछ पल सिर्फ देखती रही। फिर धीरे से अंदर गई। पैरों के नीचे फर्श ठंडा था। वह बिस्तर के किनारे तक पहुँची। सूर्या की साँसें सुन रही थी — भारी, समान। लग रहा था वह पूरी तरह सोया हुआ है।

हाथ काँप रहे थे। उसने बहुत देर तक हिम्मत जुटाई। फिर धीरे से लुंगी का किनारा उठाया।

सूर्या का लिंग बाहर आ गया। लंबा, मोटा, और आधा सख्त। श्वेता की आँखें फैल गईं। उसने पहली बार इतने करीब से किसी पुरुष को इस तरह देखा था। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे खुद को सुनाई दे रहा था। वह एक पल के लिए रुक गई। मन में फिर वही आवाज़ — "छोड़कर चली जा…"

लेकिन शरीर नहीं माना।

उसने काँपती उँगलियों से उसे छू लिया। गर्म था। छूते ही उसकी उँगलियाँ सिहर गईं। वह धीरे-धीरे सहलाने लगी — ऊपर से नीचे, फिर नीचे से ऊपर। बहुत हल्के हाथों से। जैसे डर रही हो कि वह जाग जाएगा। लिंग उसके हाथों में धीरे-धीरे और सख्त होने लगा। लंबाई अब और साफ महसूस हो रही थी। लगभग आठ इंच। श्वेता की साँसें तेज़ हो गईं।

दूसरे हाथ से उसने अपनी साड़ी का पल्लू सरकाया और पैंटी के अंदर उँगली डाल दी। वह खुद भीगी हुई थी। उँगली घुमाते ही उसकी कमर हल्की-सी काँप गई। आँखें बंद हो गईं। एक हाथ से सूर्या को सहला रही थी, दूसरे से खुद को। मुँह से हल्की-हल्की साँसें निकल रही थीं जिन्हें वह दबाने की कोशिश कर रही थी।

थोड़ी देर बाद वह और झुक गई। बाल उसके चेहरे पर गिर रहे थे। उसने सूर्या के लिंग को अपने होंठों के करीब लाया। बहुत देर तक बस साँसें लेती रही। फिर धीरे से जीभ निकाली और सिरे पर लगाई। नमकीन और गर्म। वह सिहर गई। फिर धीरे-धीरे मुँह में लिया। पहली बार। गला भर आया, लेकिन उसने रुककर फिर से कोशिश की। होंठों से घेर लिया और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगी।

इसी पल सूर्या की आँखें खुल गईं।

नशा अभी भी दिमाग में था, लेकिन होश आ चुका था। उसने अँधेरे में श्वेता को अपने ऊपर झुका हुआ देखा। उसके गीले बाल, आधी खुली आँखें, और उसके लिंग पर उसके होंठ। सूर्या की साँस एक पल के लिए रुक गई। वह कुछ कहने वाला था… लेकिन रुक गया।

श्वेता को लग रहा था वह सोया हुआ है। उसकी हरकतें अभी भी सावधान और डरी हुई थीं। जैसे कोई गलती पकड़ी जा रही हो। सूर्या ने आँखें लगभग बंद रखीं। सिर्फ पलकें हल्की-सी खुलीं। वह चुपचाप लेटा रहा। शरीर में उठ रही गर्मी को महसूस करता रहा। श्वेता के होंठों की गर्माहट, उसकी जीभ की हलकी हरकत, और उसके हाथ का काँपना — सब कुछ।

श्वेता और ज़्यादा साहस के साथ मुँह में लेने लगी। कभी सिरे को चूसती, कभी जीभ से नीचे की तरफ लीक करती। दूसरा हाथ अभी भी अपनी पैंटी के अंदर था। उँगली तेज़ी से हिल रही थी। उसकी कमर हल्की-हल्की हिलने लगी थी। कभी-कभी उसकी गर्दन से हल्की आवाज़ निकल जाती, जिसे वह तुरंत दबा लेती।

सूर्या पूरी तरह जाग चुका था। लेकिन वह हिला नहीं। बोला नहीं। बस अँधेरे में लेटा रहा। श्वेता की शर्म और भूख दोनों को महसूस करता रहा। उसका लिंग अब पूरी तरह सख्त था। श्वेता के मुँह में भारी और गर्म। वह जानबूझकर अपनी साँसों को समान रखे हुए था, ताकि उसे लगे कि वह अभी भी सोया है।

श्वेता ने थोड़ी देर और जारी रखा। फिर अचानक उसकी हरकतें तेज़ हो गईं। शरीर तन गया। उसने सूर्या के लिंग को मुँह से छोड़ा और माथे को उसकी जाँघ पर टिका लिया। अपनी उँगली के साथ ही वह काँपने लगी। बहुत हल्की आवाज़ में कराह निकली। शरीर में सिहरन दौड़ गई। फिर वह ढीली पड़ गई।

कमरे में सिर्फ दोनों की साँसें चल रही थीं।

श्वेता कुछ देर वैसे ही झुकी रही। फिर धीरे से उठी। लुंगी को वापस ठीक किया। सूर्या की तरफ एक बार देखा — उसकी आँखें बंद थीं, साँसें नियमित। उसे अब भी लग रहा था कि वह सोया हुआ है। शर्म से उसका चेहरा जल रहा था। वह जल्दी से कमरे से बाहर निकल गई। गलियारे में आकर दीवार का सहारा लिया। दिल अभी भी जोर-जोर से धड़क रहा था।

पीछे कमरे में सूर्या ने आँखें खोलीं। अँधेरे में छत की तरफ ताकता रहा। शरीर अभी भी गरम था। लुंगी के नीचे उसका लिंग अभी भी सख्त था। उसने कोई आवाज़ नहीं की। बस लेटा रहा।

और दोनों जानते थे कि इस रात के बाद अब पहले जैसा कुछ नहीं रह जाएगा।
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#5

सुबह
सुबह की रोशनी पर्दे की दरार से आई और दीवार पर सरकती हुई बिस्तर तक पहुँची।

श्वेता की आँखें खुल गईं।

शरीर में थकान थी और नींद पूरी नहीं हुई थी। कमरे में वो गंध अभी भी बैठी थी जो रात से रह गई थी — पसीना, साबुन, और कुछ और जिसका नाम उसे नहीं पता था। चादर बिस्तर से खिसकी हुई थी। तकिया उसके सीने से चिपका हुआ था।

आँख बंद करते ही सब वापस आ जाता।

अँधेरा कमरा। सूर्या की लुंगी का किनारा। उसका काँपता हाथ। और वो पल जब उसने पहली बार किसी आदमी को अपने मुँह में लिया था — गर्म, भारी, और उसके गले तक।

उसने चेहरा तकिये में दबा दिया। जाँघों के बीच अभी भी हल्की चिपचिपाहट थी और एक सनसनाहट, जो सोने से नहीं गई थी। पेट के निचले हिस्से में एक अजीब खालीपन — जैसे कुछ अधूरा रह गया हो।

वो धीरू की तरफ मुड़ी।

वो पीठ करके सो रहा था, चादर कमर तक, मुँह खुला, साँस भारी और बराबर। उसकी एक बाँह बिस्तर से लटक रही थी। उसे कुछ पता नहीं था। उसे कभी कुछ पता नहीं चलता था।

श्वेता उठी।

पैरों में बल नहीं था। चप्पल ठीक से नहीं पहनी, बस पहन ली। बाथरूम तक जाते हुए उसे लगा कि कमरे का फर्श उसके पैरों के नीचे से खिसक रहा है।

नल खोला। ठंडा पानी। चेहरा धोया।

फिर शीशे में देखा।

आँखें सूजी हुईं। होंठों का रंग गहरा, जैसे किसी ने काट लिए हों। गालों पर लाली, और वो लाली देखते ही और बढ़ गई। बाल एक तरफ चिपके हुए। गर्दन पर एक हल्का निशान — या शायद वो सिर्फ उसकी कल्पना थी।

उसने मुँह फेर लिया। शीशे में खुद को देखना अभी मुश्किल था।

नहाते हुए उसने जल्दी की। साबुन पीठ पर लगाते वक्त हाथ रुक गया। कल का साबुन याद आया — कोई और हाथ, कोई और हथेली, ठीक उसी जगह, उसी तरह घूमती हुई। उसने आँखें बंद करके पानी के नीचे सिर हिलाया, जैसे खुद को झाड़ रही हो। फिर भी कुछ नहीं झड़ा।

बाहर आकर उसने सादी साड़ी पहनी — वो जो रोज़ पहनती थी, जिसमें कुछ भी दिखता नहीं। दुपट्टा सीने पर कसकर लपेटा, दो बार। बाल गीले ही छोड़ दिए, पोंछने की ज़हमत नहीं की।

रसोई में गैस जलाते वक्त हाथ काँप रहे थे। चीनी की डिब्बी खोली और चम्मच भरते हुए आधी नीचे गिर गई। उसने झाड़ू लगाने के लिए झुकना चाहा, फिर छोड़ दिया। चाय की पत्ती डाली। दूध डाला। चम्मच दो बार पतीली से फिसलकर गिरा। दूसरी बार उसने चम्मच उठाया और खुद से बड़बड़ाई — "क्या हो गया है तुझे।"

तभी पीछे सूर्या का दरवाज़ा खुला।

वो बाहर आया। बाल बिखरे हुए, आँखें नींद और नशे के अवशेष से भारी, आधी बंद। सिर्फ लुंगी पहने हुए — कमर पर ढीली गाँठ, और उसके ऊपर पूरा नंगा शरीर। छाती पर हल्के बाल। कंधों पर सोने की लाल लकीरें, जो तकिये से पड़ी थीं।

श्वेता की नज़र अनजाने में उसकी कमर पर गई — लुंगी की गाँठ पर, और उसके नीचे। फिर जल्दी से हट गई। उसने सिर झुका लिया और पतीली में देखने लगी, जैसे उसमें कुछ ढूंढ रही हो।

सूर्या ने उसे देखा।

एक पल उसकी नज़र श्वेता की पीठ पर रुकी — गीले बाल, गर्दन की नमी, साड़ी में बंधी कमर, और पल्लू के नीचे छिपी हुई वो गर्दन जहाँ कल उसका हाथ था। रात का पूरा अहसास एक साथ लौट आया, जैसे किसी ने अंदर से दरवाज़ा खोल दिया हो।

उसने गला साफ किया।

"सुबह हो गई…"

आवाज़ भारी थी, और सुबह की सोई हुई।

"हाँ…" श्वेता ने बिना मुड़े जवाब दिया। "चाय बना रही हूँ।"

आवाज़ अपनी ही नहीं लगी। बहुत हल्की, और कसी हुई, जैसे गले से निकलने से पहले किसी ने दबा दी हो।

सूर्या पास के सोफे पर बैठ गया। श्वेता ने अलमारी से दो कप निकाले — एक सूर्या का, एक अपना। फिर तीसरा, धीरू का। तीसरा निकालते वक्त उसके हाथ रुके।

जब वो कप लेकर मुड़ी, दोनों की नज़रें एक साथ मिल गईं।

एक पल के लिए सब रुक गया। गैस की आँच पर चाय उबल रही थी और उसकी आवाज़ कमरे में सबसे तेज़ चीज़ थी।

श्वेता की आँखों में शर्म थी और उसके नीचे कुछ और — रात की याद, साफ और बेशर्म। सूर्या की आँखों में भी वही था। दोनों ने एक साथ नज़रें झुका लीं, जैसे तय कर लिया हो कि अभी नहीं।

श्वेता ने कप उसकी तरफ बढ़ाया।

हाथ मिलाते वक्त उँगलियाँ छू गईं।

इस बार दोनों ने जानबूझकर नहीं हटाया। एक सेकंड। दो सेकंड। उँगलियाँ सटी रहीं, और दोनों जानते थे कि वो सिर्फ कप पकड़ने का बहाना है।

फिर श्वेता ने हाथ खींच लिया। कप टेबल पर रखकर उल्टी तरफ पीठ करके खड़ी हो गई, और अपने कप में चीनी डालने लगी — बहुत धीरे, बहुत ज़्यादा देर तक।

सूर्या चाय पीने लगा। नज़र बार-बार उठ जाती।

श्वेता सोफे पर पड़े तकिये ठीक कर रही थी। झुकते हुए पल्लू थोड़ा सरक गया और कमर की हल्की रेखा झलक गई — वो कमर जिसे उसने एक रात पहले अँधेरे में, झाग के नीचे, अपनी हथेली में लिया था।

सूर्या ने घूँट लिया। गला गर्म हो गया और गर्मी वहीं नहीं रुकी।

श्वेता को पता था कि वो देख रहा है। गर्दन से गर्मी चढ़कर कान तक गई। वो दुपट्टा और कस रही थी, पर जब भी झुकती, साड़ी की किनारी से गर्दन का ऊपरी हिस्सा और कंधे की हड्डी झलक जाती। कल सूर्या के हाथ ठीक वहीं रुके थे — उसी हड्डी पर, उसी नरम जगह पर।

याद आते ही उँगलियाँ काँप गईं।

चम्मच फिर गिरा।

"क्या हुआ?" सूर्या ने पूछा। आवाज़ में जानबूझकर सामान्य बनने की कोशिश थी, और वो कोशिश साफ सुनाई दे रही थी।

"कुछ नहीं…" श्वेता जल्दी बोली। "हाथ फिसल गया।"

वो चम्मच उठाने के लिए झुकी।

सूर्या की नज़र उसकी झुकी हुई पीठ पर चली गई और वहीं रह गई। साड़ी पीठ पर तनी हुई थी। एक कंधा दुपट्टे से बाहर आ गया था। श्वेता उठते वक्त उसकी तरफ देख गई और नज़रें फिर मिल गईं — इस बार टकराकर।

उसकी आँखों में साफ शर्म थी। उसने मुँह फेर लिया।

तभी धीरू का दरवाज़ा खुला।

वो ऊँघता हुआ बाहर आया, बाल एक तरफ चिपके, आँखें आधी बंद। "चाय बनी?"

"हाँ…" श्वेता ने कहा और उसकी आवाज़ में राहत थी। जैसे तीसरे आदमी के आने से कुछ छूट गया हो।

धीरू मेज़ पर बैठ गया और कप अपनी तरफ खींच लिया। श्वेता ने उसके सामने रोटी रखी।

"आज भी दो जगह जाना है," धीरू बोला, मुँह में रोटी डालते हुए। "एक कंपनी बहुत दूर है — फ़रीदाबाद। बस में दो घंटे।"

"कब जाना है?"

"दस बजे।"

तीनों बैठे। धीरू बड़बड़ाता रहा — कितनी बसें बदलनी पड़ेंगी, कितना किराया लगेगा, कल वाला आदमी कितना बकवास था। श्वेता और सूर्या चुप।

कभी-कभी उनकी नज़रें मिलतीं और दोनों तुरंत हटा लेते। एक बार मिलीं और दोनों एक ही पल हटे — तो श्वेता को हँसी आ गई और उसने कप से मुँह छिपा लिया।

"क्या हुआ?" धीरू ने पूछा।

"कुछ नहीं। चाय गरम है।"

एक बार श्वेता ने कप उठाया तो उसके हाथ में कंपकंपी थी। सूर्या ने देख लिया। उसकी नज़र धीरे से श्वेता के होंठों पर गई — वही होंठ, जो रात को उसके शरीर पर थे, जो खुले थे, जो भरे हुए थे।

श्वेता ने महसूस किया। वो इतनी शरमाई कि उसने दुपट्टे का सिरा मुँह तक उठा लिया — जैसे छुपना चाहती हो। और दुपट्टे के पीछे से उसने सूर्या को देखा।

सूर्या ने चाय का घूँट लिया और अपनी मुस्कान कप में छिपा दी।

"तू ठीक है?" धीरू ने पूछा, बिना उसकी तरफ देखे। "चेहरा लाल है।"

"गैस की गर्मी है।"

"अच्छा।"

धीरू ने कुछ पूछा — कि उसकी ब्लू शर्ट कहाँ है। श्वेता हड़बड़ाकर बोली कि इस्तरी कर दी है, अलमारी में टंगी है। आवाज़ में अटकाव था। धीरू को कुछ पता नहीं चला। वो अपनी बातों में लौट गया।

सूर्या चुप बैठा रहा। उसने अपना कप खत्म किया और कप सिंक में रखने के लिए उठा।

श्वेता सिंक के पास खड़ी थी।

वो पास आया। श्वेता ने कप लेने के लिए हाथ बढ़ाया। सूर्या ने छोड़ा नहीं।

"मैं रख देता हूँ।"

"रहने दीजिए।"

दोनों के हाथ कप पर थे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। धीरू दो कदम दूर बैठा रोटी खा रहा था।

"रात को…" सूर्या ने बहुत धीमे कहा, इतना धीमे कि श्वेता को होंठ हिलते देखने पड़े। "…बहुत ठंड थी।"

श्वेता के हाथ रुक गए।

"हाँ…" उसकी आवाज़ भी उतनी ही धीमी थी। "ठंड थी।"

धीरू ने कुर्सी पीछे सरकाई। दोनों अलग हो गए।

नाश्ता खत्म करके धीरू तैयार होने चला गया। दरवाज़े पर आते वक्त वो रुका — "तीन-चार बजे तक लौटूँगा। देर हो जाए तो फोन कर दूँगा।"

"हाँ।"

दरवाज़ा बंद हुआ।

कमरे में फिर दो लोग रह गए, और सन्नाटा पहले से भारी हो गया — जैसे किसी ने कमरे की हवा तक निकाल दिया हो।

श्वेता बर्तन समेटने लगी। सूर्या सोफे पर बैठा रहा, आगे झुका, कोहनी घुटनों पर।

दोनों जानते थे कि बोलने की ज़रूरत नहीं है। और दोनों जानते थे कि अगर बोलेंगे तो क्या बोलेंगे।

श्वेता जब भी उसके पास से गुज़रती, साड़ी का किनारा कभी-कभी उसके पैर से छू जाता। हर बार दोनों की साँस एक पल के लिए रुक जाती।

एक बार वो बहुत करीब से गुज़री। सूर्या ने बिना देखे हाथ बढ़ाया — सिर्फ उँगलियों से साड़ी का किनारा छुआ। श्वेता रुक गई, फिर चल दी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

वो कमरे में गई और दरवाज़ा बंद कर लिया।

दीवार से टिक गई। आँखें बंद। दिल जोर से धड़क रहा था, और जाँघों के बीच वो सनसनाहट लौट आई थी।

बाहर सूर्या बैठा रहा, ठंडे होते कप को उँगली से घुमाता हुआ। आँखों के सामने वही अँधेरा कमरा घूम रहा था। श्वेता की काँपती उँगलियाँ। उसकी गीली साँस।

गमछा
श्वेता ने कपड़े बदलने के लिए अलमारी खोली, फिर बंद कर दी।

उसने सोचा था कि नहाकर साड़ी पहनेगी और सब सामान्य हो जाएगा। पर बर्तन धोते-धोते पीठ पर ब्लाउज़ चिपकने लगा, और कल का साबुन फिर याद आ गया — और साथ में ये भी कि सूर्या बाहर बैठा है और उसने उसे छुआ था।

उसने साड़ी उतार दी।

दूसरी बार नहाया। इस बार गमछे से बदन पोंछा और वहीं लपेट लिया — एक सफेद, पतला सूती गमछा। पुराना। जिसका कपड़ा इतना पतला था कि सूखने पर भी शरीर की लकीरें दिखती थीं।

सोचा, दो मिनट में कपड़े पहन लेगी।

पर पूजा का वक्त हो चुका था।

माँ की आदत थी — नहाते ही पहले पूजा। श्वेता बचपन से यही करती आई थी। शादी के बाद भी नहीं छोड़ा। घर में कोई देखता है या नहीं, पूजा पहले।

वो उसी गमछे में बाहर निकली।

पानी की नमी अभी भी त्वचा पर बाकी थी। गमछा शरीर से इस तरह चिपका था मानो कपड़ा न होकर दूसरी त्वचा बन गया हो। गोल और भारी चूचियों की आकृति पूरी तरह उभर आई थी। निप्पल ठंडे पानी से सख्त होकर गमछे के पार गहरे घेरे की तरह साफ दिख रहे थे, और हर साँस के साथ हल्के-हल्के उठते-गिरते थे। पतली कमर की रेखा, नाभि के चारों तरफ जमा पानी की बूँदें, और जाँघों के ऊपरी हिस्से की मुलायम गोलाई — सब कुछ गीले कपड़े के नीचे छिपने के बजाय और निखर गया था।

गीले बाल कंधों पर बिखरे थे। गर्दन पर पानी की बूँदें चमक रही थीं और उतरती जा रही थीं।

सूर्या हॉल में खड़ा था।

उसकी नज़र पड़ते ही वो जड़ हो गया।

रात अँधेरे की थी, और उसमें भी सिर्फ भाप। अब दिन था। सीधी रोशनी। और दिन के उजाले में सब कुछ और साफ था — हर लकीर, हर गोलाई, हर नमी।

सूर्या का गला सूख गया। वो कुछ बोल नहीं पाया। बस देखता रहा, और ये भूल गया कि देखना भी छिपाना पड़ता है।

श्वेता ने नज़र महसूस की। शर्म से पूरा चेहरा और गर्दन लाल हो गए। उसने जल्दी से गमछे को कस लिया — पर गीला कपड़ा और चिपक गया, और चूचियों पर और तन गया।

वो बिना नज़र मिलाए पूजा की तरफ चली गई।

थाली उठाई। घंटी बजाई। दीया जलाया। माचिस की तीली हाथ में काँप रही थी और उसे तीन बार बुझानी पड़ी।

माथे पर कुमकुम लगाते वक्त बिंदी टेढ़ी बन गई।

"अगरबत्ती…" उसने धीमे से कहा, बिना पलटे। "ऊपर वाली आलमारी में हैं। रख दीजिए ना, भैया जी। मुझे ऊँचाई नहीं पहुँचेगी।"

सूर्या आया।

पास आया, और उसकी चप्पल की आवाज़ फर्श पर रुक गई। अगरबत्ती की डिब्बी उतारी, दीया के पास रख दी, और माचिस से जलाकर स्टैंड में लगा दिया।

वो दो कदम पीछे नहीं हटा।

श्वेता को उसकी गर्मी पीठ पर महसूस हुई — गीली पीठ पर, गमछे के ऊपर, ठीक कमर के पास। उसने घंटी उठाई और बजाई। ज़ोर से। जैसे हाथ की कंपकंपी छिपानी हो।

घंटी की आवाज़ में उसने आँखें बंद कर लीं।

सूर्या पीछे खड़ा रहा। उसकी नज़र श्वेता की गीली गर्दन पर थी, और उसके नीचे — गमछे के किनारे पर जहाँ कपड़ा कमर पर बैठा हुआ था।

जब श्वेता झुकी, गमछे का ऊपरी किनारा ढीला पड़ा और सीने का ऊपरी हिस्सा बाहर आ गया।

सूर्या ने साँस रोक ली।

श्वेता ने दीया के आगे हाथ जोड़े। आँखें बंद। होंठ हिल रहे थे, पर मन में कोई शब्द नहीं था — बस एक ही बात घूम रही थी कि वो पीछे खड़ा है, और देख रहा है, और उसने कुछ नहीं कहा।

अगरबत्ती की खुशबू फैल गई। घंटी रुक गई।

श्वेता उठी। पलटी।

सूर्या वहीं था। बहुत करीब।

"भैया जी…" उसने कहा, और आवाज़ बीच में ही रुक गई।

"हाँ।"

"आप… आप नहा लीजिए।" उसने गमछे को सीने पर दबा लिया। "मैं नाश्ता लगा देती हूँ।"

सूर्या ने सिर हिलाया और मुड़ा।

श्वेता ने उसकी पीठ देखी — लुंगी, नंगी पीठ, कंधे। और तभी उसे एहसास हुआ कि उसका दुपट्टा भीतर कमरे में पड़ा है और वो उसी गीले गमछे में खड़ी है, और सूर्या वो देख चुका है।

शेव
सूर्या नहाने चला गया।

श्वेता ने राहत की साँस ली और साथ ही महसूस किया कि राहत में भी कुछ अधूरा है। मन शांत नहीं था। शरीर में वही गर्मी थी, और अब वो पूरी तरह जाग चुकी थी।

उसने रोटियाँ बनाईं। आटा गूंथते वक्त हथेलियाँ गर्म थीं।

सूर्या बाथरूम में देर तक रहा।

पहले पानी की आवाज़ आई। फिर बंद हुई। फिर शेव का ब्रश खटखटाने की आवाज़। फिर नाखून काटने की कट-कट, धीमी और लगातार।

श्वेता ने दो बार घड़ी देखी।

फिर पानी फिर चला — गर्म पानी, भाप बाहर रिसने लगी। तेल की बोतल खुलने की आवाज़ आई। और फिर लंबा, धीमा सन्नाटा, जिसमें सिर्फ हथेली के त्वचा पर फिसलने की आवाज़ आ रही थी।

तीस मिनट से ऊपर हो गए।

श्वेता बाहर बैठी रही और हर आवाज़ सुनी। रोटी ठंडी हो गई और उसने ऊपर कपड़ा डाल दिया।

आखिर में उसने शॉवर चालू किया और बालों में शैंपू लगाया।

तभी श्वेता उठी।

उसने अपने कपड़ों की तरफ देखा — धुले कपड़े अंदर ही सूखने के लिए टंगे थे, बाथरूम की खिड़की के पास, रस्सी पर।

उसने एक पल हिम्मत जुटाई। फिर दरवाज़े तक गई और हल्की नॉक की।

"भैया जी… मेरे धुले कपड़े अंदर रखे हैं। सुखाने थे। निकाल लूँ?"

पानी थोड़ा कम हुआ। फिर उसकी आवाज़ — "हाँ… खोल देता हूँ।"

दरवाज़ा खुला।

और श्वेता एक पल के लिए रुक गई।

शरीर पर सिर्फ काली वी-शेप अंडरवियर। पानी की बूँदें चौड़े कंधों से, छाती से, पेट की रेखाओं से फिसल रही थीं और नीचे गिर रही थीं। पहलवानी शरीर गीला चमक रहा था — कंधे, बाजू, छाती, और पेट की तीन हल्की लकीरें जो साँस के साथ उभरती और धँसती थीं।

बालों से शैंपू का झाग टपक रहा था।

श्वेता अंदर आई और रुक गई। उसकी नज़र अनजाने में उसके शरीर पर ठहर गई — छाती पर, पेट पर, और फिर अंडरवियर के नीचे के उभार पर। उसने जल्दी से नज़रें झुका लीं। पर एक पल के लिए देख चुकी थी और वो पल पर्याप्त था।

गाल जलने लगे।

वो कपड़े निकालने झुकी। अंदर ही अंदर शुक्र मना रही थी कि गमछा सूखा है, वरना…

कपड़े हाथ में लिए वो खड़ी हुई।

सूर्या शॉवर के नीचे बाल धो रहा था। पीठ की मांसपेशियाँ पानी के नीचे चमक रही थीं। कमर पर पानी गिरता और फिर नीचे बह जाता। कूल्हों पर झाग का एक टुकड़ा चिपका हुआ था।

श्वेता का गला सूखा। कपड़े हाथ में लिए वो वैसे ही खड़ी रह गई — जाने के लिए मुड़ी ही नहीं।

फिर धीमी, हिचकती आवाज़ में बोली — "भैया जी… कल आपने मेरी पीठ पर साबुन लगाया था। मैं भी… लगा दूँ?"

सूर्या ने पानी में से मुँह निकाला। "नहीं… ज़रूरत नहीं। मैं कर लूँगा।"

"लगने दीजिए न…" आवाज़ में जिद के साथ शर्म भी थी, और वो शर्म ही जिद को सच्चा बना रही थी। "कल आपने लगाया था तो… आज मैं लगा दूँ। बस पीठ पर।"

सूर्या कुछ पल चुप रहा। पानी उसके चेहरे पर गिरता रहा। फिर धीरे से सिर हिलाया।

"ठीक है।"

वो शॉवर की तरफ पीठ करके खड़ा हो गया।

पीठ
श्वेता ने साबुन उठाया। हाथ काँप रहे थे।

उसने साबुन को पानी में गीला किया और उँगलियों में लिया। झाग बनने लगा।

गमछा अभी भी वही सफेद वाला था — आधा सूखा, आधा गीला, और कमर पर ढीली गाँठ।

वो करीब आई।

सूर्या के शरीर से गर्मी आ रही थी। पानी की छींटें उसके हाथों पर, बाँहों पर पड़ रही थीं। भाप दोनों के बीच खड़ी थी।

उसने काँपती उँगलियों से साबुन उसकी पीठ पर रखा।

जैसे ही हाथ लगा, दोनों की साँसें बदल गईं।

श्वेता ने धीरे-धीरे साबुन फेरना शुरू किया। कंधों पर। फिर रीढ़ के साथ नीचे।

सूर्या का शरीर कठोर और गर्म था। मांसपेशियाँ उसकी हथेली के नीचे सख्त महसूस हो रही थीं — कंधे के ब्लेड, रीढ़ के दोनों तरफ की गोलाई, कमर के ऊपर की मोटी मांसपेशी। उसकी त्वचा पर एक छोटा सा निशान था, बाएं कंधे के नीचे, और श्वेता की उँगली वहाँ दो बार घूमी।

जितना साबुन लगाती, उतना उसका मन बहकता।

हाथ बार-बार कमर की हड्डी तक पहुँच जाते। झाग सफेद और गाढ़ा बन गया था और पानी उसे बहा ले जाता। उँगलियाँ कभी-कभी अंडरवियर की इलास्टिक को छू जातीं — और हर बार छूते ही श्वेता की उँगलियाँ अपने आप सिकुड़ जातीं।

सूर्या ने सिर थोड़ा नीचे किया। उसकी साँस धीमी और भारी थी, और श्वेता सुन रही थी।

"यहाँ…" उसने कहा, और खुद नहीं जानती थी कि क्यों कहा। "यहाँ कड़ा है।"

उसने कमर के ऊपर के हिस्से पर हथेली से दबाव दिया।

सूर्या की साँस में एक छोटा सा फँसाव आया।

श्वेता ने दबाना जारी रखा — अंगूठे से, गोल घुमाते हुए। उसे पता नहीं था कि वो मालिश कर रही है या कुछ और।

धीरे-धीरे वो खुद को भूलने लगी।

साबुन की चिकनाहट, सूर्या के शरीर की गर्मी, और मांसपेशियों का सख्त अहसास — सब मिलकर उसकी शर्म को धुँधला करने लगा। उसके हाथ अब सिर्फ पीठ पर नहीं रह रहे थे। वे कमर तक जाते, फिर वापस कंधों तक आते। और उसका शरीर भी अनजाने में आगे झुकता जा रहा था।

गीला गमछा सूर्या की पीठ से सट गया। फिर और सट गया।

उसकी सख्त चूचियाँ अब सूर्या की पीठ से रगड़ खा रही थीं।

पहले हल्का स्पर्श। फिर पूरा दबाव। गोल, भारी, और सख्त निप्पल वाली चूचियाँ सूर्या की गीली पीठ की मांसपेशियों पर दब रही थीं। हर साँस के साथ वे ऊपर-नीचे रगड़ खातीं। श्वेता को खुद अहसास होने में देर लगी। जब अहसास हुआ तो वो घबरा गई, लेकिन शरीर हटा नहीं पाई। बल्कि और चिपक गई।

साबुन लगाते-लगाते वो जैसे खो गई। आँखें आधी बंद। साँसें भारी।

दोनों चूचियाँ अब पूरी तरह सूर्या की पीठ पर दबी हुई थीं — बायाँ और दायाँ, दोनों। सूर्या को साफ महसूस हो रहा था — उनका वजन, उनकी गर्माहट, और हर साँस के साथ होने वाली वो हल्की रगड़।

सूर्या की साँस भारी हो गई। अंडरवियर के अंदर उसका लिंग तेज़ी से सख्त होने लगा। कपड़े का उभार अब स्पष्ट और तना हुआ दिख रहा था। वो हर धड़कन के साथ और सख्त होता जा रहा था, जैसे श्वेता की चूचियों का दबाव और उसके हाथों की गर्माहट सह न पा रहा हो।

श्वेता अभी भी खोई हुई थी।

उसके हाथ कमर से और नीचे सरक चुके थे। उँगलियाँ अंडरवियर की इलास्टिक पार कर चुकी थीं।

जब उसका हाथ सूर्या के पूरी तरह सख्त, गर्म और भारी लिंग से टकराया, तो वो जैसे नींद से जागी।

लेकिन हाथ हटाया नहीं।

साबुन की चिकनाहट में उसकी उँगलियाँ अनजाने में ही उस पर फेरने लगीं।

सूर्या की पीठ और तन गई। लिंग अब इतना अकड़ चुका था कि अंडरवियर के अंदर रहना मुश्किल हो रहा था। वो बाहर आने को धक्का मार रहा था।

श्वेता के दिमाग में एक साथ कई आवाज़ें गूँज रही थीं —

"क्या कर रही हूँ मैं…"

"ये मेरे जेठ हैं…"

"धीरू का शरीर तो इतना… और ये…"

"हट जा… अभी हट जा…"

लेकिन शरीर उन आवाज़ों को नहीं सुन रहा था। उसकी चूचियाँ अभी भी सूर्या की पीठ पर दबी थीं। निप्पल रगड़ खा रहे थे। और उसका हाथ साबुन की चिकनाहट के साथ धीरे-धीरे चल रहा था।

तभी सूर्या अचानक मुड़ गया।

मुड़ना
श्वेता का हाथ अभी भी उसके लिंग पर था।

दोनों की आँखें एक साथ मिलीं। पानी की तेज़ धार दोनों पर गिर रही थी। श्वेता का सफेद गमछा अब पूरी तरह भीगकर शरीर से चिपक चुका था — भारी चूचियाँ, सख्त निप्पल, पतली कमर और जाँघों की गोलाई, सब कुछ गीले कपड़े के पार साफ। पानी की बूँदें उसके गालों से होकर गर्दन तक आतीं और चूचियों की दरार में समा जातीं।

सूर्या की आँखों में एक अजीब गंभीरता थी। नशा नहीं। गुस्सा नहीं। कुछ और। कुछ भारी।

उसने धीरे से श्वेता का हाथ अपने लिंग पर दबाए रखा। आवाज़ कम और गहरी निकली।

"कल रात जैसे सहलाया था… वैसे ही सहला।"

इतना कहकर उसने अंडरवियर नीचे सरका दी।

लिंग बाहर आ गया।

दिन के पूरे उजाले में। पानी की बूँदें उस पर से फिसल रही थीं। लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ, पूरी तरह अकड़ा हुआ। सिरे पर हल्की चमक थी। गहरा रंग, भारी वजन, और इतना मोटा कि श्वेता की उँगलियाँ उसे पूरी तरह घेर ही नहीं पा रही थीं। हर धड़कन के साथ वो हल्का-हल्का धड़क रहा था।

श्वेता की आँखें फैल गईं।

शरीर में जैसे कोई तेज़ करंट दौड़ा। वो काँप उठी। नज़र हटाने की कोशिश की, हट न सकी।

और फिर उसके दिमाग में धीरू आ गया।

बिना बुलाए। बिना चाहे। बस आ गया — पतला, छोटा, दो मिनट में ढीला पड़ जाने वाला। जिसे उसने तीन साल में कभी ठीक से देखा भी नहीं था, क्योंकि देखने का मौका ही नहीं मिलता था — अँधेरा, चादर, और जल्दबाजी।

और ये… इतना बड़ा, इतना भारी, इतना ज़िंदा कि सिर्फ देखने से जाँघों के बीच एक शर्मनाक गर्मी फैल गई।

तुलना इतनी साफ और क्रूर थी कि उसके गले में कुछ अटक गया। आँखें भर आईं।

"भैया जी…" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं… मैं नहीं… बहुत शर्म आ रही है…"

वो पीछे हटने की कोशिश करने लगी।

सूर्या ने उसका हाथ नहीं छोड़ा। बल्कि हल्के से और दबा दिया। श्वेता की उँगलियाँ उसके गर्म, सख्त लिंग पर फैली हुई थीं, और पानी और साबुन की चिकनाहट में वो और फिसलन भरा लग रहा था।

शर्म से नज़र मिलाने की हिम्मत नहीं हुई। वो घुटनों के बल बैठ गई, दोनों हाथों से अपना मुँह छुपा लिया। बाल चेहरे पर बिखर गए। सिर्फ काँपते कंधे और गीले बाल दिख रहे थे।

"मैं… मैं नहीं देख सकती…"

पानी गिरता रहा। सूर्या उसके ऊपर खड़ा रहा। श्वेता घुटनों पर बैठी, मुँह छुपाए, काँपती हुई।

उजाला
सूर्या ने कुछ नहीं कहा।

वो बस खड़ा रहा और इंतज़ार करता रहा। पानी उसके शरीर पर गिरता रहा। उसने श्वेता को मजबूर नहीं किया — न झुका, न हाथ बढ़ाया।

इंतज़ार ने श्वेता को और तोड़ा।

वो उँगलियों के बीच से झाँका। एक बार। फिर नज़र हटा ली। फिर फिर झाँका। हाथ धीरे-धीरे नीचे सरके — मुँह से, ठुड्डी से, और गले पर आकर रुके। आँखें अब भी नीचे थीं। उसने होंठ भीतर से दाँतों से दबा लिए।

"देखो मत नीचे," सूर्या ने धीरे से कहा। "बस हाथ चलाओ।"

श्वेता की साँसें तेज़ हो गईं।

वो सूर्या की आँखों में नहीं देख पा रही थी। नज़र झुकाए, काँपते हाथों से धीरे-धीरे सहलाने लगी। ऊपर से नीचे। फिर नीचे से ऊपर। हर हरकत के साथ उसका अपना शरीर भी काँप रहा था। गमछे के नीचे उसकी चूचियाँ तेज़ी से उठ-गिर रही थीं। निप्पल इतने सख्त हो चुके थे कि कपड़े के पार दर्द करने लगे थे।

मन में एक तूफान चल रहा था।

"ये मेरे जेठ हैं… धीरू के भाई हैं… मैं क्या कर रही हूँ…"

"कल रात भी तो किया था… अँधेरे में…"

"लेकिन अब उजाला है… सब कुछ दिख रहा है…"

"इतना बड़ा कैसे हो सकता है… धीरू तो… नहीं। तुलना मत कर। तुलना मत कर।"

लेकिन हाथ रुक नहीं रहे थे।

सूर्या का लिंग उसके हाथों में और सख्त होता जा रहा था। नसें उभरी हुईं। सिरे से हल्का तरल रिस रहा था जो पानी में घुल जाता। श्वेता की उँगलियाँ जब भी उस सिरे पर फिरतीं, सूर्या की साँस भारी हो जाती — और वो भारीपन श्वेता के पेट तक पहुँचता।

उसका खुद का शरीर भी धोखा दे रहा था।

जाँघों के बीच नमी बढ़ती जा रही थी। गमछा वहाँ भी भीगकर चिपक गया था। वो जानती थी — अगर सूर्या एक बार नीचे देख ले, तो सब साफ झलक जाएगा। पानी से भीगा कपड़ा किसी को नहीं बचाता।

शर्म से उसका पूरा शरीर जल रहा था। और रुक भी नहीं पा रही थी।

दिमाग कह रहा था — "हट जा। बस, इतना काफी है। अब हट जा।"

हाथ नहीं हट रहा था।

सूर्या ने अचानक उसका चेहरा उठाया। दोनों हाथों से, ठुड्डी के नीचे उँगलियाँ रखकर।

आँखों में आँसू थे। गाल लाल। होंठ काँप रहे थे।

"तुम डर रही हो," सूर्या ने बहुत धीमे से कहा। "या कुछ और?"

श्वेता ने जवाब नहीं दिया।

आँसू बह निकले — दोनों आँखों से, एक साथ, बिना आवाज़। वो सिर हिलाना चाहती थी। न हाँ, न ना।

सूर्या का लिंग अभी भी उसके एक हाथ में था। दूसरा हाथ उसने अनजाने में अपनी जाँघ के अंदर रख लिया था — गमछे के ऊपर से ही सही, बस दबाकर।

कमरे में सिर्फ पानी की आवाज़ और दोनों की भारी साँसें थीं।

श्वेता की उँगलियाँ अब थोड़ा और साहस से हिल रही थीं। वो खुद को कोस रही थी — "रंडी। सच में रंडी। जेठ के हाथ में…" — लेकिन शरीर एक अलग भाषा बोल रहा था।

सूर्या का लिंग इतना गर्म और धड़कता हुआ था कि वो अपना हाथ हटाना ही नहीं चाहती थी।

दिमाग में धीरू की तस्वीर बार-बार आ रही थी। और हर बार शर्म के साथ एक अजीब तृप्ति भी मिल रही थी — कि वो तुलना कर रही है, और तुलना में कोई हार रहा है।

सूर्या ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर श्वेता के गमछे का किनारा पकड़ा।

खींचा नहीं। बस उँगलियाँ वहाँ रखी रहीं। जैसे इंतज़ार कर रहा हो।

श्वेता की आँखें उसके हाथ पर गईं। फिर उसकी आँखों में। आँसू अभी भी बह रहे थे।

"भैया जी…" उसने बहुत हल्की आवाज़ में कहा, आवाज़ टूट रही थी। "मैं… मैं खड़ी नहीं रह पा रही… शर्म से…"

उसके घुटने काँप रहे थे।

गमछे के नीचे उसकी चूचियाँ अभी भी तेज़ी से उठ-गिर रही थीं। उसका हाथ अभी भी सूर्या के लिंग पर था — काँपता हुआ, पर रुका हुआ नहीं।
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#6

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#7

घंटी
घंटी बजी।

एक बार। फिर दूसरी बार।

श्वेता के घुटने ज़मीन पर थे और पूरा शरीर एक झटके में सीधा हो गया।

"श्वेता…" बाहर से धीरू की आवाज़। धीमी। कोई जल्दी नहीं। "श्वेता…"

दोनों जम गए। पानी गिरता रहा।

"श्वेता…?" फिर वही आवाज़, उतनी ही शांत। "सो गईं क्या? …"

श्वेता ने सूर्या की तरफ देखा। आँखें फैली हुईं, होंठ खुले, चेहरे पर पानी और आँसू। नीचे गमछा, ऊपर नंगी चूचियाँ।

"भैया जी…" वो फुसफुसाई। आवाज़ काँप रही थी। "भैया जी, मैं… मैं कैसे…"

"चुप।"

सूर्या ने एक पल भी नहीं लिया। उसने दरवाज़े की तरफ मुँह किया और आवाज़ सामान्य करके बोला —

"दो मिनट! नहा रहा हूँ!"

बाहर सन्नाटा। फिर धीरू की आवाज़, थोड़ी ढीली पड़ी — "अरे, भैया आप अंदर हैं? तो श्वेता कहाँ हैं?"

सूर्या ने श्वेता की तरफ देखा।

"उठ," उसने फुसफुसाकर कहा। "जल्दी।"

दो मिनट
उसने दरवाज़ा खोला — बस इतना कि वो निकल सके — और पीछे से बंद कर दिया।

श्वेता अंदर, घुटनों के बल, दोनों हाथ ज़मीन पर, साँस रोके।

सूर्या कमरे में गया। बिस्तर पर श्वेता के बाहर के कपड़े पड़े थे — सलवार सूट, दुपट्टा, और नीचे पड़ी उसकी पतली काली पैंटी। उसने सब उठाया, तीन बार मोड़ा, और गद्दे के नीचे ठूंस दिया। एक कोना बाहर झाँक रहा था — उसे भी अंदर धकेल दिया।

फिर उसने एक नज़र कमरे पर फेरी।

कुछ नहीं। साफ।

और दरवाज़ा खोल दिया।

धीरू बाहर खड़ा था — शर्ट पसीने से भीगी, बाल माथे पर चिपके, एक हाथ में मरा हुआ मोबाइल, कंधे ढीले।

"सॉरी भैया," उसने अंदर आते हुए कहा। "पता नहीं चलता कि आप अंदर हैं। बस बजाता रहा।"

"कोई बात नहीं।" सूर्या ने कमर पर तौलिया लपेट लिया। "पानी की आवाज़ में सुनाई नहीं देता।"

धीरू सोफे पर बैठ गया, और बैठते हुए ही लंबी साँस छोड़ी। "फ़रीदाबाद वाला भी नहीं हुआ। बस में बैटरी मर गई। चार्जर लेकर नहीं गया था, इसलिए उतर आया।" उसने इधर-उधर देखा। "श्वेता कहाँ हैं?"

"मंदिर गई हैं।" सूर्या की आवाज़ में कुछ नहीं था। "पूजा के लिए।"

"अभी?"

"सुबह से।"

"अच्छा।" धीरू ने कमरे में नज़र घुमाई, फिर मोबाइल दीवार के पास प्लग में लगा दिया। "श्वेता देर तक रुकेंगी?"

"पता नहीं।" सूर्या मुड़ा। "मैं नहा लूँ, फिर देखते हैं।"

"हाँ, आप नहा लीजिए।" धीरू ने आँखें बंद कर लीं और सोफे पर सिर पीछे टिका दिया। "मैं यहीं बैठा हूँ।"

सूर्या बाथरूम में घुसा और दरवाज़ा बंद कर दिया।

अंदर
श्वेता वैसी ही बैठी थी — घुटने सीने से लगाए, दोनों हाथ उन्हें पकड़े हुए, माथा घुटनों पर।

गमछा भीगकर शरीर से चिपका हुआ था और पानी लगातार गिर रहा था। वो काँप रही थी — ठंड से नहीं।

"अब?" उसने फुसफुसाया। आवाज़ गले से नहीं निकल रही थी। "भैया जी, अब क्या… मैं क्या करूँ… बाहर कैसे जाऊँगी… मेरे कपड़े…"

"कपड़े गद्दे के नीचे हैं।"

"और मैं?" उसने सिर उठाया। आँखें लाल। "इस हालत में? धीरू बाहर बैठा है।"

सूर्या उसके सामने बैठ गया। एक घुटना ज़मीन पर, दूसरा खड़ा। पानी उसकी पीठ पर गिर रहा था और वो परवाह नहीं कर रहा था।

"सुनो।"

श्वेता ने उसकी तरफ देखा।

"कुछ नहीं हुआ है," सूर्या ने धीमे से कहा। "समझो — कुछ नहीं हुआ।"

"कुछ नहीं?"

"तुम मंदिर गई थीं। पूजा के लिए। बारह बजे लौटीं। बस इतना।"

श्वेता ने निगलने की कोशिश की। गला सूखा था।

"और ये?" उसने गमछे की तरफ देखा।

"ये तुम्हारा है। तुम्हारा ही रहेगा।"

"और हम दोनों…?" उसकी आवाज़ टूट गई। "ये सब…"

सूर्या ने एक पल उसे देखा।

"ये सब बाद में।" उसने हाथ बढ़ाया। "पहले खड़ी हो।"

श्वेता ने उसका हाथ नहीं पकड़ा। वो अभी भी बैठी रही, घुटने पकड़े हुए, जैसे छोड़ने से सब बिखर जाएगा।

"श्वेता।"

"मैं डर रही हूँ।"

"पता है।" उसने उसका कंधा पकड़ा। "इसीलिए तो कह रहा हूँ — खड़ी हो।"

और उसने उसे उठा दिया।

खड़ी
श्वेता काँपते हुए खड़ी हुई। घुटने पहले मुड़े, फिर सीधे हुए। सूर्या का हाथ उसके कंधे पर था और वो उसे सहारा दे रहा था — नीचे नहीं, बस पकड़े हुए।

गमछा उतर गया।

नहीं — उतरा नहीं। गीला गमछा इतना भारी हो गया था कि सरककर कूल्हों पर आ गया और लगभग गायब हो गया। अब सिर्फ उसकी लाल किनारी दिख रही थी — पतली लाल लकीर, जाँघों पर, और उसके नीचे कुछ नहीं।

पूरा शरीर खुला। गीला। चमकता।

ऊपर की चूचियाँ नंगी, भारी, और ठंडे पानी से सख्त। पेट पर पानी की बूँदें। और नीचे, जाँघों के बीच, घना काला, जो पानी से चिपका हुआ था।

श्वेता ने हाथों से खुद को ढँकने की कोशिश की — नीचे से नहीं, ऊपर से। दोनों हाथ चूचियों पर रख दिए।

तभी बाहर से धीरू की आवाज़ आई। धीमी, सुस्त, सोफे से।

"भैया…"

श्वेता के हाथ कस गए।

"…नहाने के बाद आप चाय पिएंगे?"

सूर्या ने दरवाज़े की तरफ मुँह किया। आवाज़ बिल्कुल सामान्य।

"नहीं।"

"तो?"

"दूध पीना है।"

और जब उसने ये कहा, तब उसकी नज़र श्वेता की तरफ नहीं थी — उसके हाथों पर थी। जो उसकी चूचियाँ ढँके हुए थे।

श्वेता ने सुना। पहले कुछ समझ नहीं आया। फिर आया — और उसने नीचे अपनी छाती देखी।

उसके हाथों के नीचे, उँगलियों के बीच से, चूचियाँ इतनी तनी हुई बाहर निकली थीं कि साफ दिख रहा था। भारी। कसे हुए। जैसे अंदर से भरे हुए।

और सूर्या उन्हीं को देख रहा था।

श्वेता शरमा गई। हाथ हटाना चाहा, पर हटाए तो सब दिखेगा — और रखे तो और उभरेंगी।

बाहर से धीरू फिर बोला, बिना ज्यादा ध्यान दिए — "दूध फ्रिज में रखा है भैया।"

"फ्रिज का नहीं," सूर्या ने कहा।

श्वेता ने उसकी तरफ देखा।

सूर्या ने हाथ बढ़ाया और उसके हाथों को चूचियों से हटा दिया। फिर अपनी हथेली उन पर रखी।

श्वेता की साँस अटक गई। दीवार का सहारा लेने के लिए उसने पीछे हाथ टिका दिया।

"दूध की ताकत होती है," सूर्या ने दरवाज़े की तरफ देखते हुए कहा। आवाज़ बिल्कुल बातचीत वाली। "हड्डी के लिए। दिमाग के लिए।"

उसका हाथ धीरे-धीरे चला — नीचे से ऊपर, भार उठाकर, फिर छोड़कर।

श्वेता के होंठ खुले रह गए। उसने मुँह में हवा रोक ली, ताकि कोई आवाज़ न निकले।

"और ताज़ा दूध?" सूर्या ने कहा। "ताज़ा दूध तो और ज्यादा फायदेमंद होता है।"

"हाँ?" धीरू ने सुस्ती से कहा। उसकी आवाज़ में हैरानी थी, बस।

"हाँ।" सूर्या ने श्वेता की एक चूची पूरी हथेली में भर ली। अंगूठा निप्पल पर रखकर धीरे घुमाया। "जब मैं कुश्ती करता था, तब गाय के थन से सीधा दूध पीता था। बिल्कुल सीधा। कोई बर्तन नहीं, कोई उबालना नहीं।"

श्वेता का माथा पीछे जा लगा। दीवार ठंडी थी।

उसकी आँखें बंद हो गईं।

"उससे ज्यादा ताकत किसी चीज़ से नहीं आती," सूर्या ने कहा।

"हम्म।" धीरू ने सोफे पर करवट बदली। "तो गाय का ही ले आता हूँ कल से।"

सूर्या ने श्वेता की तरफ देखा — पूरा नंगा, गीला, काँपता शरीर, दीवार से टिका, होंठ भींचे हुए, और उसकी हथेली में भरी हुई चूची।

उसके होंठों पर एक बारीक मुस्कान आई।

"हाँ," उसने कहा। "ले आना।"

बाहर धीरू चार्जिंग का तार ठीक कर रहा था, बिना जल्दी, बिना किसी शिकायत के। और अंदर, बंद दरवाज़े के पीछे, सूर्या का हाथ श्वेता की छाती पर था, और श्वेता दाँतों से अपना निचला होंठ दबाए, एक भी आवाज़ न करने की कोशिश कर रही थी।
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